जेल में न्याय की प्रतीक्षा: उमर खालिद और लोकतंत्र की परीक्षा
— VicharVani संपादकीय
प्रस्तावना: जब मौन न्याय पर हावी हो जाए
कल फिर वही हुआ — उमर खालिद, शफीउर रहमान बरकत अली (शाहजेल इमाम) और अन्य युवाओं की जमानत याचिका खारिज कर दी गई। अदालत की चुप्पी और सरकार की संतुष्टि, दोनों ही इस बात के प्रतीक हैं कि इन युवाओं को जेल में रखना अब न्यायिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि एक राजनीतिक संदेश बन चुका है।
यह संदेश स्पष्ट है — असहमति, चाहे कितनी भी शांतिपूर्ण क्यों न हो, अब एक अपराध है।
न्यायिक प्रक्रिया में देरी और राज्यसत्ता का दबाव
भारतीय संविधान ने राज्य की तीन प्रमुख शाखाएं — विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका — परस्पर स्वतंत्र रखी हैं ताकि कोई भी शाखा निरंकुश न बन सके। पर आज तस्वीर उलट चुकी है।
विधायिका पहले ही सत्ता की कठपुतली बन चुकी है, कार्यपालिका का रिमोट पूरी तरह सरकार के हाथ में है, और अब न्यायपालिका पर भी दबाव बढ़ता जा रहा है।
जब भी कोई नया मुख्य न्यायाधीश पदभार संभालता है, जनता उम्मीद करती है कि न्याय का सूरज फिर उगेगा। लेकिन समय के साथ यह उम्मीद फिर ढल जाती है। पूर्व मुख्य न्यायाधीश एन. वी. रमना के उदाहरण से देखा जा सकता है कि न्यायपालिका की प्राथमिकताएँ अक्सर जनहित से हटकर व्यक्तिगत सुविधाओं की ओर झुक जाती हैं — और यह जनता के विश्वास पर आघात है।
उमर खालिद का मामला: सुनियोजित देरी का दस्तावेज़
वकील कपिल सिब्बल द्वारा सुप्रीम कोर्ट में रखे गए आंकड़े यह दर्शाते हैं कि उमर खालिद की जमानत याचिका सुनवाई के नाम पर कानूनी जाल में फँसा दी गई है।
- 55 बार तारीख इसलिए बढ़ी क्योंकि न्यायिक अधिकारी अनुपस्थित थे।
- 11 बार स्टाफ की कमी का हवाला दिया गया।
- 26 बार अदालत ने कार्यभार का बहाना बनाया।
- 59 बार जांच अधिकारी की अनुपलब्धता बताई गई।
- 4 बार वकीलों की हड़ताल हुई।
यह सब केवल जमानत याचिका के लिए हुआ — मुकदमे की सुनवाई तो अभी शुरू भी नहीं हुई है। न्याय में यह देरी अब प्रक्रिया नहीं, एक रणनीति बन चुकी है।
राज्य का असली उद्देश्य: एक संदेश देना
यह स्पष्ट होता जा रहा है कि इन युवाओं को जेल में रखना सरकार की नीतिगत रणनीति का हिस्सा है।
इन पर हत्या या हिंसा जैसे गंभीर आरोप नहीं हैं, फिर भी उन्हें बिना मुकदमे के वर्षों तक कैद में रखा गया है। सरकार चाहती है कि यह मामला दूसरों के लिए “उदाहरण” बने — एक भय का उदाहरण।
जो भी सत्ता के खिलाफ बोलने की हिम्मत करेगा, उसका भविष्य उमर खालिद की कोठरी में देखा जा सकता है। यह राज्य की शक्ति का प्रदर्शन है, न्याय का नहीं।
कानून का उलट तर्क: जब जेल नियम बन जाए
भारतीय न्यायशास्त्र कहता है — “Bail is the rule, jail is the exception.”
परंतु आज स्थिति उलट गई है — “जेल नियम है, जमानत अपवाद।”
बिना सजा के पाँच वर्षों तक किसी को बंद रखना न केवल संविधान का उल्लंघन है, बल्कि कानून के उस नैतिक तर्क का भी, जो “निर्दोषता की धारणा” पर आधारित है।
इसके विपरीत, नफरत फैलाने वाले भाषणों या भीड़ हिंसा के आरोपी, महज राजनीतिक झुकाव के कारण, सहजता से जमानत पा जाते हैं। यह चयनात्मक न्याय (Selective Justice) और कानून के समक्ष असमानता का जीवंत उदाहरण है।
मुस्लिम पहचान और न्याय की असमानता
यह एक असहज परंतु अनदेखा नहीं किया जा सकने वाला सत्य है कि इन मामलों में मुस्लिम पहचान एक निर्णायक भूमिका निभाती प्रतीत होती है।
देश के माहौल में ऐसा दबाव बनाया गया है कि मुस्लिम नागरिकों को अपनी “देशभक्ति” बार-बार सिद्ध करनी पड़ती है। पुलिस से लेकर अदालत तक, उनके साथ व्यवहार में पूर्वाग्रह झलकता है।
यह प्रवृत्ति न केवल संविधान के धर्मनिरपेक्षता सिद्धांत के खिलाफ है, बल्कि सामाजिक ताने-बाने के लिए भी विषैली है।
न्यायपालिका की विश्वसनीयता पर साया
“न्याय केवल होना ही नहीं चाहिए, बल्कि होता हुआ दिखना भी चाहिए।”
यह कथन आज भारतीय न्यायपालिका के लिए एक कसौटी बन गया है।
जब अर्नब गोस्वामी जैसे मामलों में तत्काल राहत मिलती है, जबकि उमर खालिद जैसे मामले वर्षों खिंचते रहते हैं, तब जनता के मन में यह प्रश्न उठता है — क्या न्याय सबके लिए समान है?
न्यायपालिका की आंतरिक पारदर्शिता, नियुक्तियों की प्रक्रिया और न्यायिक नैतिकता — तीनों ही प्रश्नों के घेरे में हैं।
यह केवल अदालत की दीवारों तक सीमित चिंता नहीं है; यह जनता के विश्वास की नींव को हिला देने वाली स्थिति है।
सत्याग्रह और असहमति पर हमला
उमर खालिद का मामला केवल एक व्यक्ति का नहीं है; यह भारत में असहमति की संस्कृति पर किया गया प्रहार है।
महात्मा गांधी के सत्याग्रह का मूल भाव था — “असहमति को अहिंसा से व्यक्त करना।”
लेकिन आज, शांतिपूर्ण विरोध या असहमति जताना ही “राजद्रोह” या “षड्यंत्र” की श्रेणी में डाल दिया गया है।
यह लोकतंत्र के सबसे बुनियादी मूल्य — जनभागीदारी और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता — पर सीधा हमला है।
निष्कर्ष: लोकतंत्र की असली परीक्षा
उमर खालिद और उनके साथियों का मामला किसी अदालत की दीवारों तक सीमित नहीं है।
यह भारतीय लोकतंत्र, न्यायपालिका और संविधान की नैतिक परीक्षा है।
यदि हम नागरिक के रूप में इस चुप्पी के अभ्यस्त हो गए, तो यह चुप्पी ही हमारे लोकतंत्र की सबसे बड़ी हार होगी।
लोकतंत्र केवल चुनावों से नहीं, बल्कि न्याय, असहमति और करुणा से जीवित रहता है।
आज आवश्यकता है कि नागरिक जागें, प्रश्न करें, और अन्याय के विरुद्ध आवाज़ उठाएँ — क्योंकि गांधी के विचार अब भी इस देश की रगों में बहते हैं, और जब तक वे बहते रहेंगे, लोकतंत्र को पुनर्जीवित करने की संभावना बनी रहेगी।
— VicharVani संपादकीय टीम

