पीएमओ में भूचाल: सत्ता, नियंत्रण और ‘मौन’ की दरारें

इन दिनों दिल्ली के सत्ता गलियारों में तीन नाम असामान्य गति से घूम रहे हैं—हिरण जोशी, हितेश जैन और नवनीत सहगल। यह कोई सामान्य चर्चा नहीं है। यह उस व्यवस्था की परतें उघाड़ती है, जिसे अब तक अभेद्य, अनुशासित और पूरी तरह नियंत्रित माना जाता था।

हिरण जोशी प्रधानमंत्री कार्यालय में मीडिया प्रबंधन और हेडलाइन-कंट्रोल के केंद्रीय व्यक्तियों में गिने जाते थे। माना जाता है कि मीडिया किस मुद्दे पर बोलेगा, कैसे बोलेगा, और कब चुप रहेगा — यह उन्हीं जैसे व्यक्तियों की रणनीति से तय होता था।

लेकिन दो महीने पहले उनका अचानक पीएमओ से हटना और फिर 9 नवंबर को पूरी तरह बाहर कर देना, सिर्फ प्रशासनिक बदलाव नहीं था — यह संकेत था कि कुछ बिगड़ा है।

इसी कड़ी में हितेश जैन, जो विधि आयोग से जुड़े थे, 13 नवंबर को हटा दिए गए। और अब इस्तीफा देने वाले नवनीत सहगल, जिन पर सीधे आरोप नहीं हैं, फिर भी उन्हें ‘कोलेटरल डैमेज’ के रूप में देखा जा रहा है।

सबसे बड़ा सवाल: यह लीक कैसे हुई?

मोदी सरकार का इतिहास बताता है कि सूचना का प्रवाह कभी भी स्वाभाविक नहीं होता — वह नियंत्रित, कैलिब्रेटेड और राजनीतिक उद्देश्ययुक्त होता है।

लेकिन इस बार मामला उलट दिखा।

कौन और क्यों लीक कर रहा है?

यह सवाल सरकार से ज़्यादा सिस्टम के भीतर असहमति और शक्ति संघर्ष की ओर इशारा करता है।

सूत्रों के मुताबिक, साउथ ब्लॉक में अब इसका “फोरेंसिक-स्टाइल” ऑडिट हो रहा है — कॉल लॉग्स, चैट्स, मेल, और मीडिया लिंकज की जांच। कई लोग जिनकी रोज़-मर्रा की राजनीति “ऑफ-रिकॉर्ड” संदेशों पर टिकती थी, अब अचानक चुप हैं।

आरोपों की प्रकृति: सिर्फ कर्तव्य-लापरवाही नहीं, उससे कहीं गंभीर

सेक्स, ड्रग्स, बेटिंग ऐप — यह शब्द मीडिया को उत्तेजित करने के लिए काफी हैं। लेकिन वास्तविक कहानी कुछ और प्रतीत होती है।

हिरण जोशी जैसे व्यक्ति, जो मीडिया इकोसिस्टम को माइक्रो-लेवल पर समझते हों, उनसे इतने हल्के और भोले अपराध की उम्मीद करना कठिन है।

ज़्यादा संभव है कि यह मामला प्रभाव, पहुंच और पैसों के नेटवर्क से जुड़ा हो — एक ऐसा नेटवर्क जिसे राजनीति में “पैरेलल पावर-स्ट्रक्चर” कहा जाता है।

विश्वसनीय संकेत हैं कि:

• कुछ पत्रकारों और अधिकारियों के बीच पैसों के लेन-देन के रिकॉर्ड

• डिजिटल ट्रेल

• और चैट्स मौजूद हैं

और यही सामग्री गृह मंत्री अमित शाह तक पहुंची — जिसके बाद यह मामला पीएमओ तक लुढ़का।

क्या यह सिर्फ सफाई अभियान है या शक्ति संतुलन का रीसेट?

पीएमओ अपनी छवि को किसी भी प्रकार के दाग से बचाना चाहता है — यह स्पष्ट है।

लेकिन यह घटना अकेला प्रशासनिक निर्णय नहीं लगती।

यह तीन चीज़ें संकेत देती है:

1. मीडिया कंट्रोल की पुरानी मशीनरी अब भरोसेमंद नहीं रही।

2. सूचना का प्रवाह पहले जितना केंद्रीकृत था, अब नहीं है।

3. भीतर-ही-भीतर एक बड़ा सत्ता संघर्ष चल रहा है।

जोशी का काम अब सीधे अश्विनी वैष्णव और मोदी के नज़दीकी माने जाने वाले डॉ. नीरव शाह संभाल रहे हैं — यह बदलाव बताता है कि सरकार मीडिया मैनेजमेंट मॉडल को री-शेप कर रही है।

क्या इससे सरकार पर खतरा है?

तत्काल नहीं।

लेकिन यह घटना सवाल उठाती है कि इतने संवेदनशील और प्रभावशाली पदों पर ऐसे लोग कैसे पहुंचे — और वर्षों तक वहां बने कैसे रहे।

यह सिर्फ व्यक्तियों का मामला नहीं है — यह सिस्टम की नियुक्ति-प्रक्रिया, निगरानी संरचना और सत्ता में प्रवेश करने वाले नेटवर्क्स पर सवाल है।

और जब ऐसी व्यवस्था से दरार पैदा होती है — उसकी सूचना, आवाज़ और गंध बाहर आने लगती है।

निष्कर्ष: यह कहानी अभी खत्म नहीं हुई

जो हो रहा है, वह सिर्फ किसी स्कैंडल का अंत नहीं — बल्कि उस चुप्पी का टूटना है जो एक दशक तक तंत्र का सबसे बड़ा हथियार रही।

आने वाले दिनों में:

• और इस्तीफे

• और लीक

• और राजनीतिक संदेश

देखे जा सकते हैं।

क्योंकि यह सिर्फ पदों की कुर्सियों की सफाई नहीं — बल्कि नैरेटिव और नियंत्रण के युद्ध का नया अध्याय है।

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