बहुजन समाज की जड़ता और परिवर्तन की दिशा

भारत के लोकतंत्र के अंतःकरण में “बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय” का आदर्श निहित है। परंतु विडंबना यह है कि जिस समाज को यह वाक्यांश अपने अस्तित्व और स्वाभिमान का आधार देना था, वही समाज आज जड़ता और निष्क्रियता की गिरफ्त में है।

बहुजन समाज की एक बड़ी आबादी आज भी वैचारिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक स्तर पर ऐसी स्थिति में है, जहाँ जीवन केवल जीविका तक सीमित होकर रह गया है।

सुबह उठना, काम पर जाना, शाम को लौटना, टीवी देखना और सो जाना — यह जीवनचर्या अब एक यांत्रिक दिनचर्या बन चुकी है। यह सवाल उठता है कि क्या ऐसे समाज से किसी व्यापक सामाजिक परिवर्तन की उम्मीद की जा सकती है?

1. जड़ता की ऐतिहासिक जड़ें

बहुजन समाज की यह निष्क्रियता आकस्मिक नहीं है; यह सदियों की सामाजिक दासता और मानसिक गुलामी का परिणाम है।

मनुस्मृति जैसी व्यवस्था ने न केवल आर्थिक अवसर छीने बल्कि मानसिक आत्मविश्वास को भी कुचल दिया।

पीढ़ियों तक जब किसी समुदाय को नीचा समझाया जाता है, तो वह विरोध के बजाय समर्पण को सुरक्षा समझने लगता है।

यह दास मानसिकता आज भी बहुजन समाज की चेतना में किसी अदृश्य दीवार की तरह मौजूद है। व्यक्ति की प्राथमिकता “सुरक्षित जीवन” बन जाती है, “स्वाभिमानी जीवन” नहीं।

2. आधुनिकता के नाम पर सतही बदलाव

पिछले कुछ दशकों में बहुजन समाज में शिक्षा, आरक्षण और शहरी अवसरों के माध्यम से कुछ परिवर्तन हुए हैं, पर यह परिवर्तन संरचनात्मक नहीं, सतही हैं।

बहुत से लोग डिग्रियाँ लेकर नौकरियाँ तो पा गए, लेकिन शिक्षा ने उनमें प्रश्न पूछने की शक्ति नहीं जगाई। उन्होंने सिर्फ अवसर का लाभ लिया, विचार का विकास नहीं किया।

यही कारण है कि आज शिक्षित बहुजन भी जाति, धर्म और अंधविश्वास के जाल से मुक्त नहीं हो पा रहा है। उसके लिए मंदिर, जातीय पहचान, और धार्मिक कर्मकांड अभी भी सामाजिक मान्यता का प्रतीक हैं, न कि पराधीनता के औजार।

3. नेतृत्व का संकट और प्रतीकवाद की राजनीति

बहुजन आंदोलन की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि इसका नेतृत्व अब वैचारिक आंदोलन के बजाय प्रतीकात्मक राजनीति में फँस गया है।

फुले, पेरियार और अंबेडकर का जो आंदोलन आत्मसम्मान, तर्क और संगठन पर आधारित था, वह अब जयंती, माल्यार्पण और नारों तक सीमित हो गया है।

नेतृत्व अब सत्ता की सीढ़ियों में उलझा है, समाज की जड़ों में नहीं। इससे जनता में यह संदेश गया कि बदलाव केवल “राजनीतिक प्रतिनिधित्व” से आएगा, जबकि वास्तविक परिवर्तन चेतना के पुनर्निर्माण से आता है।

4. शिक्षा और चेतना का अंतर

आज का शिक्षित बहुजन एक खतरनाक भ्रम में जी रहा है — उसे लगता है कि डिग्री प्राप्त कर लेना ही मुक्ति है।

पर शिक्षा तभी सार्थक होती है जब वह व्यक्ति को संदेह करने, सोचने और असहमति व्यक्त करने की शक्ति दे।

वर्तमान में शिक्षा प्रणाली व्यक्ति को नौकरीयोग्य तो बना रही है, पर विचारयोग्य नहीं।

बहुजन समाज के भीतर स्वाध्याय संस्कृति लगभग समाप्त है — किताबें, बहसें, आत्मविश्लेषण और वैचारिक संवाद जैसी परंपराएँ लुप्त हो गई हैं। परिणामस्वरूप शिक्षा चेतना नहीं जगाती, केवल सुविधा देती है।

5. सांस्कृतिक कब्जा और मनोरंजन की जकड़न

मीडिया और मनोरंजन ने आज बहुजन चेतना को अपने कब्जे में ले लिया है।

जहाँ कभी गाँव की चौपालें सामाजिक संवाद का माध्यम होती थीं, वहाँ अब मोबाइल स्क्रीनें हैं जो मनोरंजन, धर्म और राजनीति का एक मिश्रित भ्रम रचती हैं।

यह संस्कृति बहुजन समाज को विरोध से विमुख करती है। वह सवाल पूछने के बजाय “लाइक” और “फॉलो” में संतुष्ट हो जाता है।

इससे समाज की ऊर्जा वास्तविक मुद्दों से हटकर भ्रमित प्रतीकों में खो जाती है।

6. परिवर्तन की गति क्यों धीमी है

बदलाव की गति इसलिए धीमी है क्योंकि यह समाज अभी भी सामूहिक असंतोष को संगठित विचार में नहीं बदल पाया है।

जहाँ असंतोष बिखरा हुआ हो, वहाँ आंदोलन जन्म नहीं लेते।

अंबेडकर का आंदोलन इसलिए सफल हुआ क्योंकि उन्होंने असंतोष को दिशा दी, उसे संगठन, शिक्षा और संघर्ष से जोड़ा।

आज वही दिशा पुनः खोजने की आवश्यकता है।

7. परिवर्तन की दिशा — क्या किया जा सकता है

(क) वैचारिक पुनर्स्थापना:

बहुजन विचारधारा को फिर से जन-जीवन में उतारना होगा।

अंबेडकर, फुले, कबीर, पेरियार, बुद्ध आदि के विचारों को स्कूलों, सामाजिक कार्यक्रमों, और सोशल मीडिया अभियानों में लोकप्रिय भाषा में पहुँचाया जाए।

(ख) युवाओं में विवेक प्रशिक्षण:

बहुजन युवाओं को अंधविश्वास, जाति, और धर्म के भ्रम से मुक्त करने के लिए रैशनल थिंकिंग पर केंद्रित कार्यशालाएँ और समूह बनाए जाएँ।

सोशल मीडिया को “मनोरंजन” से “चेतना” में बदलने का जरिया बनाया जाए।

(ग) सांस्कृतिक पुनर्जागरण:

मंदिर, मूर्ति और कर्मकांड की जगह अपने प्रगतिशील प्रतीक गढ़े जाएँ — जैसे किताब, संवाद, औरज्ञान को पूजा का रूप दिया जाए।

लोक-संस्कृति, कविता, नाटक और गीतों के माध्यम से सामाजिक न्याय के विचार को जनसुलभ बनाया जा सकता है।

(घ) आर्थिक आत्मनिर्भरता और वैचारिक मुक्ति:

बहुजन समाज को सिर्फ आरक्षण की लड़ाई तक सीमित नहीं रहना चाहिए।

उद्यमिता, सहकारी संस्थाएँ, वैकल्पिक शिक्षा संस्थान और अपने मीडिया प्लेटफ़ॉर्म बनाने की दिशा में काम करना होगा।

(ङ) माइक्रो-लेवल आंदोलन:

प्रत्येक कस्बे और मोहल्ले में अध्ययन मंडल, रीडिंग सर्किल, महिला स्वाध्याय समूह जैसे छोटे आंदोलन शुरू किए जाएँ।

यहीं से सामूहिक चेतना की लौ फिर से प्रज्वलित हो सकती है।

8. निष्कर्ष — बदलाव का सूत्र

बहुजन समाज को अब यह समझना होगा कि परिवर्तन किसी मसीहा या पार्टी से नहीं आएगा;

वह तभी आएगा जब व्यक्ति अपने भीतर यह सवाल जगाए —

“मैं क्यों नहीं बदलता?”

“मैं अपनी स्थिति पर प्रश्न क्यों नहीं करता?”

हर व्यक्ति जब अपने भीतर यह प्रश्न जगाता है, तभी समाज में गति आती है।

बदलाव किसी क्रांति से नहीं, विचार की निरंतरता से आता है।

आज आवश्यकता इस बात की है कि बहुजन समाज अपने अतीत की पीड़ा को इतिहास की घटना नहीं, चेतना की प्रेरणा में बदले।

यही वह क्षण होगा जब जड़ता पिघलेगी, और परिवर्तन अपनी सही दिशा पाएगा।

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