मानव विचार की चार दिशाएँ: आस्तिक, नास्तिक, अज्ञेयवादी और यथार्थवादी
कोई भी व्यक्ति जब तक होश संभालता है, उसके पहले ही उसे किसी न किसी धर्म के रंग में रंग दिया जाता है। मेरे ख्याल से इसी लिए धार्मिक लोगों की संख्या गैर-धार्मिक लोगों से अधिक है। कोई व्यक्ति किस धर्म को मानता है या नहीं मानता है, यह वर्गीकरण करने का तरीका ही ग़लत है। “अ” धर्म को मानने वाले माता-पिता के बच्चों को “अ” धर्म का मान लिया जाता है, इस तरह धर्म का लेवेल लगा देना ग़लत और मनमाना तरीका है। बालक/ बालिका को वयस्क होने के बाद अपना धर्म चुनने की या नास्तिक रहने की स्वतंत्रता होनी चाहिये।
मानव सभ्यता के विकास के साथ सबसे प्राचीन और अनवरत प्रश्न यही रहा है — “क्या ईश्वर है?”
इस प्रश्न ने दर्शन, धर्म, विज्ञान और समाज — सबकी दिशा तय की है।
यही प्रश्न चार मूल दृष्टिकोणों को जन्म देता है: आस्तिक, नास्तिक, अज्ञेयवादी, और यथार्थवादी।
ये चारों दृष्टिकोण केवल ईश्वर के प्रति रुख नहीं, बल्कि मनुष्य के सोचने के तरीके का प्रतिनिधित्व करते हैं।
1. आस्तिक: विश्वास की परिधि में जीने वाला
आस्तिक वह है जो मानता है कि ईश्वर या कोई सर्वोच्च सत्ता इस ब्रह्मांड को संचालित कर रही है।
यह दृष्टिकोण विश्वास, श्रद्धा और धार्मिक परंपरा पर आधारित होता है।
आस्तिक मनुष्य का जीवन नैतिकता, भक्ति और नियति के विचारों के इर्द-गिर्द घूमता है।
उसके लिए संसार की हर घटना के पीछे किसी अदृश्य शक्ति की योजना होती है।
यह दृष्टिकोण सांत्वना और नैतिक अनुशासन देता है, लेकिन कई बार अंधविश्वास और भाग्यवाद का आधार भी बन जाता है।
दार्शनिक दृष्टि से, आस्तिकता मानव की अज्ञात के प्रति जिज्ञासा और भय दोनों का परिणाम है।
जब मनुष्य प्रकृति को समझ नहीं पाया, उसने उसे “ईश्वर” कहा।
2. नास्तिक: तर्क और स्वतंत्रता का घोषक
नास्तिक वह है जो ईश्वर के अस्तित्व का खंडन करता है।
वह कहता है कि ब्रह्मांड का कोई अदृश्य संचालक नहीं — सब कुछ भौतिक कारणों और प्राकृतिक नियमों का परिणाम है।
नास्तिकता केवल ईश्वर का निषेध नहीं, बल्कि मानव स्वतंत्रता की उद्घोषणा है।
जब मनुष्य कहता है “कोई ऊपर वाला नहीं,” तब वह अपने विवेक को सर्वोच्च मान्यता देता है।
चार्वाक, बुद्ध, एपिक्यूरस, स्पिनोज़ा, मार्क्स — सबने किसी न किसी रूप में इसी स्वतंत्रता का समर्थन किया।
लेकिन नास्तिकता का खतरा तब उत्पन्न होता है जब यह निरर्थकता या नकारात्मकता में बदल जाती है।
यदि ईश्वर नहीं है, तो क्या कोई नैतिक मूल्य भी नहीं?
यह प्रश्न नास्तिकता की नैतिक परीक्षा बन जाता है।
3. अज्ञेयवादी: जानने की सीमाओं को स्वीकार करने वाला
अज्ञेयवादी (Agnostic) न तो ईश्वर को स्वीकार करता है, न अस्वीकार।
वह कहता है —
“हम यह नहीं कह सकते कि ईश्वर है या नहीं, क्योंकि हमारे ज्ञान की सीमाएँ हैं।”
अज्ञेयवाद, एक प्रकार का दार्शनिक विनम्रता है।
यह न तो अंध-विश्वास में पड़ता है, न दंभी नकार में।
वह प्रश्न को खुला रखता है — खोज जारी रखता है।
दार्शनिक थॉमस हक्सले ने ‘Agnostic’ शब्द का प्रयोग करते हुए कहा था —
“मैं केवल उसी पर विश्वास करता हूँ जो प्रमाण से सिद्ध हो सके।”
इस दृष्टिकोण की खूबी यह है कि यह विचार की स्वतंत्रता और सत्य की निरंतर खोज को प्रोत्साहित करता है।
लेकिन इसका दोष यह है कि यह कर्महीनता या निष्क्रिय संदेहवाद में बदल सकता है।
4. यथार्थवादी (वास्तविक): अनुभव और तर्क का साधक
यथार्थवादी या “वास्तविक” व्यक्ति कहता है —
“मुझे ईश्वर के होने या न होने से नहीं, बल्कि यथार्थ से मतलब है।
मैं वही मानता हूँ जो अनुभव, प्रमाण और तर्क से समझा जा सके।”
यह दृष्टिकोण दार्शनिक यथार्थवाद (Realism) और अनुभववाद (Empiricism) दोनों से जुड़ा है।
यह व्यक्ति न विश्वास में जीता है, न संशय में — बल्कि साक्ष्य और अनुभव में जीता है।
वह मानता है कि सत्य वही है जो अनुभूत या प्रमाणित किया जा सके।
ऐसे लोग समाज में वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानवीय मूल्यों और विवेकशीलता को बढ़ावा देते हैं।
उनकी दृष्टि धरातल पर रहती है — वे न आकाश में ईश्वर खोजते हैं, न ग्रंथों में उद्धार।
उनके लिए सत्य कोई परलोकिक वस्तु नहीं, बल्कि यथार्थ जगत का अनुभव है।
5. चारों दृष्टिकोणों का तुलनात्मक सार
दृष्टिकोण मुख्य विश्वास आधार संभावित खतरा प्रतिनिधि विचारक
आस्तिक ईश्वर है आस्था, धर्म अंधविश्वास, भाग्यवाद रामानुज, संत तुलसीदास
नास्तिक ईश्वर नहीं है तर्क, विज्ञान नैतिक शून्यता चार्वाक, बुद्ध, मार्क्स
अज्ञेयवादी नहीं जानते कि ईश्वर है या नहीं संशय, तर्कशीलता निष्क्रियता थॉमस हक्सले
यथार्थवादी केवल प्रमाण और अनुभव को मानता है तर्क, अनुभव संवेदनहीनता या कठोर भौतिकता अरस्तु, डेविड ह्यूम, अम्बेडकर
6. निष्कर्ष: मुक्ति विचार में है, मत में नहीं
इन चारों दृष्टिकोणों की सार्थकता इसी में है कि ये हमें सोचने के लिए प्रेरित करते हैं।
कौन-सा दृष्टिकोण “सही” है, इसका निर्णय किसी ग्रंथ या देवता से नहीं, बल्कि हमारे विवेक और अनुभव से होगा।
मनुष्य का विकास तभी संभव है जब वह विश्वास और संशय दोनों की सीमाओं से परे जाकर विचार की स्वतंत्रता को अपनाए।
अंततः —
“आस्तिक, नास्तिक, अज्ञेयवादी या यथार्थवादी होना कोई पहचान नहीं,
बल्कि यह इस बात का सूचक है कि मनुष्य अपने सत्य की खोज कहाँ तक करता है।”

