मोदी का रिटायरमेंट प्लान: क्या राष्ट्रपति भवन में खत्म होगी राजनीतिक यात्रा?
भूमिका: 2025 का संक्रमणकाल और सत्ता की अगली मंज़िल
14 नवंबर के बाद भारत की राजनीति में कुछ बड़ा घटित होने की आहट सुनाई दे रही है।
नीतीश कुमार और नरेंद्र मोदी के बीच बढ़ती दूरी, बिहार में अनंत सिंह की गिरफ्तारी, और केंद्र–राज्य के टकराव इस बात के संकेत हैं कि अब सत्ता-समीकरण एक नए दौर में प्रवेश कर रहे हैं।
सवाल उठता है — क्या नरेंद्र मोदी सक्रिय राजनीति से “रिटायर” होने जा रहे हैं, या यह रिटायरमेंट भी सत्ता में बने रहने की किसी नई रणनीति का हिस्सा है?
इतिहास का आईना: हिटलर से पुतिन तक सत्ता का मोह
सत्ता का मोह केवल भारतीय राजनीति की समस्या नहीं है।
द्वितीय विश्व युद्ध में हिटलर ने जब सच्चाई से मुंह मोड़ा, तो पूरा जर्मनी झूठ के भ्रम में डूब गया।
“24 घंटे में रूस जीत लेंगे” जैसे नारों के बीच अंततः बर्लिन पर मित्र देशों की सेना चढ़ आई और हिटलर ने आत्महत्या कर ली।
रूस में व्लादिमीर पुतिन ने संविधान बदलकर खुद को आजीवन शासक बना लिया।
चीन में शी जिनपिंग ने भी वही रास्ता अपनाया।
अब भारत में भी एक व्यक्ति के चारों ओर सत्ता का केंद्रीकरण उसी दिशा में बढ़ता दिखाई दे रहा है।
मोदी और सत्ता की स्थायित्व योजना
नरेंद्र मोदी के लिए यह दौर केवल प्रधानमंत्री पद का अंत नहीं, बल्कि सत्ता के स्थायी रूप की तैयारी का समय है।
आरएसएस के भीतर भी हलचल है — मोहन भागवत ने अरुण कुमार की जगह अतुल लिंबो को नियुक्त किया, जिससे संकेत मिलता है कि संघ और मोदी–शाह धुरी में सामंजस्य नहीं बचा है।
इसी बीच यह चर्चा तेज़ है कि मोदी जी अब अपना रिटायरमेंट प्लान तैयार कर रहे हैं —
और यह रिटायरमेंट किसी शांत संन्यास की तरह नहीं, बल्कि राष्ट्रपति पद की ओर अग्रसर एक रणनीतिक परिवर्तन है।
“राष्ट्रपति बनकर भी सक्रिय”: एक नया प्रयोग?
कहा जा रहा है कि मोदी जी राष्ट्रपति बनकर भी निष्क्रिय नहीं रहना चाहते।
वे उस पद को भी “सक्रिय नेतृत्व” का प्रतीक बनाना चाहते हैं।
संकेत हमें पहले ही दिखने लगे हैं —
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने हाल ही में ग़ाज़ियाबाद के एक निजी अस्पताल और हरिद्वार के पतंजलि विश्वविद्यालय जैसे निजी संस्थानों के कार्यक्रमों में भाग लिया।
यह परंपरा असामान्य है, क्योंकि राष्ट्रपति सामान्यतः केवल सरकारी या राष्ट्रीय आयोजनों में ही भाग लेते हैं।
क्या यह महज़ संयोग है, या राष्ट्रपति पद को राजनीतिक सक्रियता के लिए तैयार करने का पूर्वाभ्यास?
संवैधानिक परंपराएँ बनाम प्रतीकात्मक सत्ता
भारतीय लोकतंत्र में राष्ट्रपति का पद तटस्थ और मर्यादित माना गया है।
परंतु अगर भविष्य में राष्ट्रपति निजी कंपनियों और संगठनों के मंचों पर राजनीतिक संदेश देने लगें,
तो यह संविधान की भावना को कमजोर करेगा।
यह संभावना नज़रअंदाज़ नहीं की जा सकती कि भविष्य में नरेंद्र मोदी राष्ट्रपति बनकर भी राजनीतिक रूप से सक्रिय, प्रतीकात्मक और सर्वशक्तिमान भूमिका निभाएँ —
ऐसी भूमिका जो औपचारिक रूप से सीमित है, लेकिन व्यवहार में केंद्रबिंदु बनी रहे।
बिहार की राजनीति में संकेत
बिहार में अनंत सिंह की गिरफ्तारी और चुनाव आयोग के रुख़ ने यह स्पष्ट किया है कि
अब संस्थाएँ केवल प्रशासनिक नहीं रहीं, बल्कि राजनीतिक औज़ार बन चुकी हैं।
तेजस्वी यादव की सभा से ठीक पहले की गई यह कार्रवाई यह दिखाती है कि
चुनाव आयोग और पुलिस अब सत्ता के संकेतों पर कार्य कर रही हैं।
यह परिदृश्य 2025 के राजनीतिक माहौल की पृष्ठभूमि तैयार करता है,
जहाँ केंद्र सत्ता विपक्षी राज्यों पर सीधा नियंत्रण चाहती है।
“विकसित भारत 2047” और जवाबदेही से पलायन
मोदी शासन की एक बड़ी विशेषता है — लक्ष्यों को दूर खिसका देना।
“2022 तक किसानों की आय दुगनी”, “2024 तक सबको घर”, “2047 तक विकसित भारत” —
इन सब नारों ने तत्काल जवाबदेही को समाप्त कर दिया है।
योजना आयोग को समाप्त कर नीति आयोग बनाया गया ताकि
“पाँच-वर्षीय योजनाओं की जिम्मेदारी” खत्म हो जाए।
अब विकास का हर लक्ष्य भविष्य के अनिश्चित समय पर टाल दिया जाता है,
जहाँ ना हिसाब माँगा जा सकता है, ना जवाब दिया जाता है।
झूठ और भ्रम का साम्राज्य
सत्ता अब तथ्यों से नहीं, भावनाओं और प्रतीकों से संचालित हो रही है।
धर्म, मंदिर–मस्जिद, श्मशान–कब्रिस्तान जैसे मुद्दे
वास्तविक समस्याओं — बेरोजगारी, शिक्षा, स्वास्थ्य — से जनता का ध्यान भटका रहे हैं।
झूठे आंकड़े, अधूरे वादे और योजनाओं का प्रचार
एक नए प्रकार के “स्थायी चुनाव अभियान” में बदल गया है।
मीडिया और विपक्ष की निष्क्रियता
मुख्यधारा मीडिया इन परिवर्तनों पर मौन है।
विपक्ष भी “प्रतीकों की राजनीति” में उलझा हुआ है।
जबकि असली प्रश्न यह है —
क्या भारत अब उस रास्ते पर है जहाँ एक व्यक्ति का शासन
संविधान से भी बड़ा प्रतीक बन जाएगा?
निष्कर्ष: सत्ता का मोह और लोकतंत्र की चुनौती
मोदी जी का रिटायरमेंट कोई साधारण घटना नहीं होगी।
यह भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में सत्ता के केंद्रीकरण का नया अध्याय खोल सकता है।
राष्ट्रपति भवन अगर सत्ता का नया केंद्र बना,
तो प्रधानमंत्री पद केवल औपचारिकता रह जाएगा।
अब जनता के सामने प्रश्न यह है —
क्या वह इस “अनंत शासन” की अवधारणा को स्वीकार करेगी,
या लोकतंत्र की मूल भावना — सत्ता परिवर्तन का अधिकार — को पुनः स्थापित करेगी?

