संविधान : नागरिक और राज्य के बीच समझौते का दस्तावेज़

 

हम सब “संविधान” शब्द सुनते हैं — स्कूलों में, संसद में, या अदालतों में। लेकिन क्या हमने कभी यह सोचा है कि वास्तव में संविधान है क्या?

सरल शब्दों में कहा जाए तो संविधान एक समझौता प्रपत्र (Agreement Deed) है — दो पक्षों के बीच किया गया एक अनुबंध।

एक पक्ष है राज्य (State) और दूसरा पक्ष है नागरिक (Citizen)।

 

संविधान का असली अर्थ

 

संविधान वह दस्तावेज़ है जिसमें यह तय किया गया है कि राज्य (सरकार, संसद, न्यायपालिका, पुलिस, सेना आदि) और नागरिक — दोनों किन सीमाओं में काम करेंगे।

राज्य के पास अपार शक्तियां हैं — वह कर वसूल सकता है, कानून बना सकता है, पुलिस बल चला सकता है, जेल भेज सकता है, यहाँ तक कि युद्ध भी कर सकता है।

लेकिन नागरिकों के पास क्या है?

नागरिकों के पास केवल वे अधिकार हैं जो संविधान ने उन्हें दिए हैं — जैसे बोलने की स्वतंत्रता, समानता का अधिकार, शिक्षा का अधिकार, मतदान का अधिकार आदि।

इसीलिए संविधान का उद्देश्य यही है कि यह सुनिश्चित किया जा सके कि राज्य, अपनी असीम शक्तियों का दुरुपयोग न करे।

राज्य नागरिकों पर जोर-जबरदस्ती न करे, उनकी स्वतंत्रता का गला न घोंटे, और उनके अधिकारों का हनन न करे — यही संविधान की आत्मा है।

 

संविधान का रक्षक कौन है?

 

संविधान में यह जिम्मेदारी सुप्रीम कोर्ट को दी गई है।

सुप्रीम कोर्ट का काम है — अगर राज्य (सरकार या कोई संस्था) नागरिकों के अधिकारों पर हमला करे, तो नागरिक को न्याय दिलाना।

कोर्ट नागरिक और राज्य के बीच न्याय का सेतु है।

लेकिन आज जो स्थिति बन रही है, वह बेहद चिंताजनक है।

 

आज की विचित्र स्थिति

 

आज भारत में हालात इस दिशा में बढ़ रहे हैं जहाँ राज्य (सरकार) लगातार नागरिकों के अधिकारों पर कुठाराघात कर रहा है।

आप अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की बात कीजिए — तो राजद्रोह या यूएपीए (UAPA) जैसे कानूनों का डर दिखाया जाता है।

आप सरकार की आलोचना कीजिए — तो आईटी रूल्स, सेंसरशिप या ईडी-सीबीआई का भय खड़ा कर दिया जाता है।

आप आंदोलन कीजिए — तो “देशविरोधी” या “आतंकवादी” करार दिए जाते हैं।

इन सबके बीच, सुप्रीम कोर्ट — जो संविधान का रक्षक है — वह भी अब पहले जैसा मुखर नहीं दिखता।

 

सुप्रीम कोर्ट की मौन भूमिका

 

कई मामलों में सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश सुनवाई के दौरान नागरिकों के पक्ष में तीखे सवाल और टिप्पणियां करते हैं —

वे कहते हैं कि सरकार को जवाब देना चाहिए, नागरिकों के अधिकारों की रक्षा ज़रूरी है।

लेकिन जब फैसला (Judgment) आता है — तो वे टिप्पणियां गायब हो जाती हैं, और निर्णय अक्सर राज्य के पक्ष में चला जाता है।

यह सवाल पैदा होता है — क्या अदालतों पर भी राजनीतिक दबाव बढ़ रहा है?

क्या सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के जजों की नियुक्ति में ऐसे लोगों को प्राथमिकता दी है, जो उसकी विचारधारा या नीतियों से सहमत हैं?

अगर यह सच है, तो यह केवल न्यायपालिका का संकट नहीं — बल्कि पूरे लोकतंत्र का संकट है।

 

145 करोड़ लोगों के अधिकार दांव पर

 

भारत के हर नागरिक के पास कुछ मौलिक अधिकार हैं —

जीने का अधिकार, अभिव्यक्ति का अधिकार, समानता का अधिकार, और सबसे बड़ा — मतदान का अधिकार (Right to Vote)।

अगर राज्य इन अधिकारों को सीमित करने लगे, और सुप्रीम कोर्ट चुप रहे, तो नागरिक के पास फिर बचता क्या है?

यह स्थिति एक तरह से संविधान के मूल उद्देश्य पर हमला है — क्योंकि संविधान नागरिकों की सुरक्षा के लिए बना था, न कि सत्ता को और मजबूत करने के लिए।

 

अब क्या किया जा सकता है?

 

अब सवाल उठता है — इस स्थिति से उबरने का रास्ता क्या है?

इसका उत्तर केवल न्यायपालिका या सरकार के पास नहीं है।

इसका उत्तर हम नागरिकों के पास है।

 

  1. संविधान की समझ बढ़ाना होगा —

    हर नागरिक को यह जानना चाहिए कि संविधान केवल कानून की किताब नहीं, बल्कि उसके जीवन की गारंटी है।

    जब लोग अपने अधिकारों को समझेंगे, तभी उनके उल्लंघन पर सवाल उठा पाएंगे।

  2. लोकतांत्रिक दबाव बनाना होगा —

    नागरिक समाज, मीडिया, छात्र, बुद्धिजीवी — सबको मिलकर एक मजबूत जनमत तैयार करना होगा जो न्यायपालिका से जवाब मांगे।

  3. न्यायिक जवाबदेही (Judicial Accountability) की मांग उठानी होगी —

    सुप्रीम कोर्ट और उच्च न्यायालयों की पारदर्शिता, जजों की नियुक्ति प्रक्रिया, और फैसलों की समीक्षा पर जनता की भागीदारी बढ़नी चाहिए।

  4. स्वतंत्र मीडिया और नागरिक विमर्श को मजबूत करना होगा —

    जब मीडिया सत्ता के साथ खड़ा हो जाता है, तो नागरिक अकेला पड़ जाता है। इसलिए नागरिक पत्रकारिता, जन मंचों और वैकल्पिक मीडिया को समर्थन देना होगा।

 

अंतिम बात

 

संविधान किसी राजा या शासक की देन नहीं है — यह जनता की अपनी बनाई हुई व्यवस्था है।

राज्य (सरकार) और नागरिकों के बीच यह एक अनुबंध है —

जहाँ राज्य को शक्ति दी गई है, लेकिन उस शक्ति पर नागरिकों की निगरानी भी रखी गई है।

अगर सुप्रीम कोर्ट और अन्य संस्थाएँ इस संतुलन को बनाए नहीं रखतीं,

तो संविधान केवल एक किताब बनकर रह जाएगा — और नागरिक केवल प्रजा बनकर।

समय आ गया है कि हम सब संविधान को केवल पढ़ें नहीं, जीना शुरू करें —

ताकि आने वाली पीढ़ियाँ यह कह सकें कि भारत में अभी भी जनता ही सर्वोच्च है, न कि राज्य।

मुख्य संदेश

 

संविधान केवल एक कानूनी दस्तावेज़ नहीं है —

यह जनता और राज्य के बीच न्यायपूर्ण सहअस्तित्व का अनुबंध है।

जब नागरिक जागरूक रहते हैं, तभी संविधान जीवित रहता है।

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