बुद्धि का विकास: डॉ. अम्बेडकर के विचारों का मूल दर्शन
हम सब बाबासाहेब डॉ. भीमराव अम्बेडकर को जानते हैं — संविधान निर्माता, विधिवेत्ता, और दलित चेतना के सबसे महान प्रवक्ता के रूप में।
लेकिन क्या हमने कभी यह समझने की कोशिश की है कि उनके पूरे चिंतन का मूल सार क्या था?
डॉ. अम्बेडकर ने स्वयं कहा था —
“बुद्धि का विकास मानव के अस्तित्व का अंतिम लक्ष्य होना चाहिए।”
यह वाक्य उनके सम्पूर्ण दर्शन का केन्द्रबिंदु है।
परंतु जब हम ‘बुद्धि के विकास’ की बात करते हैं, तो प्रायः हमारा ध्यान स्कूल, कॉलेज और डिग्री तक सीमित रहता है।
लेकिन बाबासाहेब के लिए शिक्षा केवल आजीविका का साधन नहीं, बल्कि समाज परिवर्तन और सामाजिक क्रांति का सबसे सशक्त हथियार थी।
शिक्षा: अस्तित्व की पुनर्प्राप्ति का माध्यम
डॉ. अम्बेडकर ने कहा था कि जब मनुष्य शिक्षित होता है, तो उसमें विवेक की शक्ति उत्पन्न होती है —
वह यह समझने लगता है कि क्या न्याय है और क्या अन्याय।
यह उनके लिए केवल कोई सैद्धांतिक विचार नहीं था, बल्कि उनके अपने जीवन का अनुभव था।
सोचिए — एक बालक जिसे स्कूल में कक्षा के बाहर बैठना पड़ता था, जिसे पानी तक पीने नहीं दिया जाता था,
वही बालक आगे चलकर कोलंबिया यूनिवर्सिटी और लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स से उच्चतम शिक्षा प्राप्त करता है।
यह सिर्फ एक व्यक्ति की सफलता नहीं थी; यह एक पूरे समुदाय के लिए ‘अस्तित्व की पुनःप्राप्ति’ थी।
हिंदू सामाजिक व्यवस्था ने दलितों से सिर्फ अधिकार नहीं छीने थे — उन्होंने उनका मनुष्यत्व ही छीन लिया था।
डॉ. अम्बेडकर के लिए शिक्षा, उस खोए हुए आत्म-सम्मान और मानवीय गरिमा को पुनः प्राप्त करने का संघर्ष थी।
‘बुद्धि’ और ‘प्रज्ञा’ में अंतर
बाबासाहेब ने ‘बुद्धि’ और ‘प्रज्ञा’ में एक सूक्ष्म लेकिन गहरा भेद किया।
उन्होंने देखा कि समाज में बहुत बार पढ़े-लिखे लोग भी अन्याय का समर्थन करने लगते हैं।
जब लोग अपनी बुद्धि का प्रयोग सत्ता या परंपरा के पक्ष में करते हैं, तो बुद्धि दिशा खो देती है।
‘प्रज्ञा’ इसके विपरीत है।
प्रज्ञा वह नैतिक और तर्कसंगत समझ है जो अंधविश्वास, भेदभाव और अन्याय के खिलाफ खड़ी होती है।
यह केवल जानने की नहीं, बल्कि सही समझने की क्षमता है।
डॉ. अम्बेडकर ने अपने बौद्ध दर्शन में तीन मूल तत्वों को एक साथ जोड़ा —
प्रज्ञा (समझ), करुणा (सहानुभूति) और समता (समानता)।
उन्होंने ‘प्रज्ञा’ को सबसे ऊपर रखा, क्योंकि बिना प्रज्ञा के करुणा भी भटक सकती है और प्रेम भी अन्याय का पक्ष ले सकता है।
‘प्रज्ञा’ एक तरह से वह तर्कपूर्ण ऑपरेटिंग सिस्टम है जो मानवता को दिशा देता है।
जब यह समझ दृढ़ होती है कि सभी मनुष्य समान हैं और असमानता एक मानव-निर्मित संरचना है,
तब करुणा और समता केवल नैतिक आदेश नहीं रहते — वे उस तर्कसंगत समझ के स्वाभाविक परिणाम बन जाते हैं।
मानसिक क्रांति से सामाजिक क्रांति तक
डॉ. अम्बेडकर का मानना था कि सामाजिक क्रांति से पहले मानसिक क्रांति आवश्यक है।
जाति व्यवस्था केवल बाहरी ढांचा नहीं, बल्कि लोगों के मन में बैठी एक मानसिक बीमारी है।
प्रज्ञा का विकास उसी संक्रमित मन को शुद्ध करने की प्रक्रिया है।
उनके विचारों ने पारंपरिक भारतीय दर्शन को एक नए दृष्टिकोण से पुनर्परिभाषित किया।
दुःख, कर्म और निर्वाण की पुनर्व्याख्या
1. दुःख (Dukkha):
पारंपरिक दृष्टि में दुःख को जीवन का अविभाज्य हिस्सा माना गया, जिसका कारण तृष्णा या इच्छा बताई गई।
बाबासाहेब ने इसे निराशावादी दृष्टिकोण कहा।
उन्होंने कहा कि दुःख का वास्तविक कारण आध्यात्मिक नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक अन्याय, शोषण, गरीबी और असमानता है।
इसलिए दुःख से मुक्ति का मार्ग वैराग्य नहीं, बल्कि अन्याय के विरुद्ध सक्रिय संघर्ष है।
2. कर्म (Karma):
उन्होंने उस भाग्यवाद को अस्वीकार किया जो कहता है कि किसी की जाति या स्थिति पिछले जन्मों के कर्मों का फल है।
उनके अनुसार यह सिद्धांत निष्क्रियता को बढ़ावा देता है।
उन्होंने कर्म को पुनर्परिभाषित किया: “मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता स्वयं है।”
3. निर्वाण (Nirvana):
पारंपरिक रूप से निर्वाण को मृत्यु के बाद की मुक्ति माना गया।
डॉ. अम्बेडकर ने कहा — निर्वाण इसी जीवन में प्राप्त की जाने वाली एक मानसिक अवस्था है,
जहाँ आपका विवेक आपके जुनून पर नियंत्रण पा लेता है।
यह संसार से भागने की नहीं, बल्कि समाज में रहकर उपयोगी कार्य करने की तैयारी है।
शिक्षित बनो, संगठित रहो, संघर्ष करो
यह नारा सिर्फ नारा नहीं, बल्कि डॉ. अम्बेडकर के सामाजिक दर्शन का त्रिविध सूत्र है।
• शिक्षित बनो:
यह आंतरिक क्रांति का प्रथम चरण है — बुद्धि का विकास, प्रज्ञा का जागरण।
• संगठित रहो:
जब चेतना जागती है, तो व्यक्ति समझता है कि परिवर्तन सामूहिक शक्ति से ही संभव है।
• संघर्ष करो:
यह बाहरी क्रांति है — अन्याय के विरुद्ध, समानता और गरिमा के लिए सतत प्रयास।
प्रज्ञा: आज की राष्ट्रीय अनिवार्यता
आज जब समाज झूठ, पूर्वाग्रह और नफरत के वातावरण में घिरा है,
तब डॉ. अम्बेडकर का ‘प्रज्ञा’ पर ज़ोर पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक है।
उनका सपना था ‘प्रबुद्ध भारत’ (Prabuddha Bharat) —
एक ऐसा राष्ट्र जो जाति, पंथ और लिंग के भेदों से मुक्त हो, और
जिसकी नींव स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व पर टिकी हो।
यह सपना तभी साकार होगा जब हम सब — आप, मैं, और यह समाज —
“बुद्धि के विकास को अपने अस्तित्व का अंतिम लक्ष्य” बनाएंगे।
यह केवल एक दार्शनिक बात नहीं है;
यह आज के भारत के लिए एक राष्ट्रीय अनिवार्यता है।
सोचिएगा ज़रूर।

