‘विश्व गुरु’ के दावों के बीच गिरती अर्थव्यवस्था की हकीकत
सरकार भारत को ‘विश्व गुरु’ और पांच ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाने के दावे बार-बार दोहराती रही है। लेकिन हाल के आर्थिक संकेतक एक बिल्कुल विपरीत तस्वीर पेश कर रहे हैं। सवाल यह है कि क्या भारत की अर्थव्यवस्था वास्तव में मजबूत हो रही है, या यह सब प्रचार और भ्रम का खेल है?
1. आर्थिक संकट के संकेत
भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) के विदेशी मुद्रा भंडार में हाल ही में लगभग 7 अरब डॉलर की गिरावट दर्ज की गई है। इससे भी गंभीर बात यह है कि RBI को अपने भंडार से करीब 35 टन सोना बेचने के लिए विवश होना पड़ा।
सोना किसी भी देश की आर्थिक स्थिरता का प्रतीक माना जाता है। ऐसे में, यह समझ से परे है कि यदि अर्थव्यवस्था “मजबूत” है, तो सोना बेचने की नौबत क्यों आई?
इसके साथ ही रिपोर्टें यह भी बता रही हैं कि RBI के हजारों करोड़ रुपये के संसाधनों में गड़बड़ी या ‘गायब’ होने जैसी चिंताजनक बातें सामने आई हैं। इन पर न तो कोई ठोस स्पष्टीकरण दिया जा रहा है और न ही मीडिया में गंभीर चर्चा हो रही है।
2. जनता पर बढ़ता बोझ
इन आर्थिक निर्णयों का सीधा असर आम नागरिकों की जेब पर पड़ रहा है।
- महंगाई अपने चरम पर है,
- रोजगार के अवसर लगातार घट रहे हैं,
- और वेतन वृद्धि ठहर सी गई है।
ऐसे में “अमृत काल” और “विकास की रफ्तार” जैसे सरकारी नारे आम जनता के लिए खोखले लगने लगे हैं।
3. बहस का केंद्र बदलना
जब देश को आर्थिक चुनौतियों पर ठोस विमर्श की आवश्यकता है, तब राष्ट्रीय बहस को धार्मिक और सांस्कृतिक मुद्दों की ओर मोड़ दिया गया है — कभी मंदिर-मस्जिद, कभी खानपान, कभी पहनावे को लेकर।
यह रणनीति जनता का ध्यान असली मुद्दों — महंगाई, बेरोजगारी और आर्थिक असमानता — से हटाने का प्रयास प्रतीत होती है।
दुर्भाग्य से, मुख्यधारा का मीडिया भी इन वास्तविक मुद्दों पर चुप्पी साधे हुए है।
4. सार्वजनिक संस्थानों की स्वायत्तता पर खतरा
हाल में Washington Post की एक रिपोर्ट ने एक और गंभीर सवाल उठाया है। रिपोर्ट के अनुसार, सरकार की ओर से LIC जैसी सार्वजनिक कंपनियों पर विशेष औद्योगिक समूहों में निवेश का दबाव डाला गया।
यह प्रवृत्ति न केवल सार्वजनिक धन के दुरुपयोग की ओर इशारा करती है, बल्कि इन संस्थानों की स्वायत्तता और विश्वसनीयता को भी खतरे में डालती है।
5. जिम्मेदारी और जवाबदेही की मांग
घटता विदेशी मुद्रा भंडार, सोने की बिक्री, सार्वजनिक संस्थानों पर दबाव और रोजगार संकट — ये सब मिलकर भारत की अर्थव्यवस्था की एक चिंताजनक तस्वीर पेश करते हैं।
अब देश को खोखले नारों या धार्मिक विमर्शों में उलझाने की बजाय, सरकार से पारदर्शिता और जवाबदेही की मांग करनी चाहिए।
जनता को यह जानने का हक है कि —
- देश का पैसा कहाँ जा रहा है?
- विकास के वादे कब पूरे होंगे?
- और आखिर सरकार की वास्तविक प्राथमिकताएँ क्या हैं?
निष्कर्षतः, “विश्व गुरु” बनने की आकांक्षा तभी सार्थक होगी जब देश की आर्थिक रीढ़ मजबूत, पारदर्शी और जनता-उन्मुख होगी। फिलहाल जो संकेत मिल रहे हैं, वे ‘विकास’ के नहीं, बल्कि गहरी आर्थिक अस्थिरता के हैं।

