अनुच्छेद 340 से मंडल तक: ओबीसी अधिकारों की अधूरी यात्रा
ओबीसी चेतना, अम्बेडकर की दृष्टि और मनुवादी प्रतिरोध का इतिहास
भूमिका
भारत का संविधान केवल शासन की रूपरेखा नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय का दस्तावेज़ है। जब डॉ. भीमराव आंबेडकर ने इसे तैयार किया, तो वे केवल एक विधिवेत्ता नहीं, बल्कि एक सामाजिक दार्शनिक के रूप में कार्य कर रहे थे। उनके लिए संविधान वह औज़ार था, जिसके माध्यम से भारत की बहुजन आबादी—विशेषतः शूद्रों, दलितों और आदिवासियों—को ऐतिहासिक अन्याय से मुक्ति दिलाई जा सके। इसी दृष्टि से संविधान में अनुच्छेद 340, 341 और 342 जोड़े गए, जो क्रमशः अन्य पिछड़े वर्गों (OBC), अनुसूचित जातियों (SC) और अनुसूचित जनजातियों (ST) से संबंधित हैं।
अंबेडकर की दृष्टि: शूद्रों से लेकर ‘ओबीसी’ तक
हिन्दू धर्मग्रंथों के गहन अध्ययन के बाद डॉ. आंबेडकर ने 1946 में “Who Were the Shudras?” नामक पुस्तक लिखी। इस ग्रंथ में उन्होंने पहली बार यह ऐतिहासिक तथ्य उजागर किया कि ‘शूद्र’ वास्तव में वे लोग हैं, जिन्हें ब्राह्मणवादी चातुर्वर्ण्य व्यवस्था ने धीरे-धीरे समाज के निचले पायदान पर धकेल दिया। यही वर्ग आगे चलकर संवैधानिक भाषा में “अन्य पिछड़ा वर्ग” (OBC) कहलाया।
संविधान निर्माण के दौरान जब आरक्षण और सामाजिक प्रतिनिधित्व का प्रश्न उठा, तब आंबेडकर ने सर्वप्रथम ओबीसी वर्ग पर विचार किया। उन्होंने अनुच्छेद 340 के तहत यह प्रावधान जोड़ा कि सरकार ओबीसी जातियों की पहचान करे, उनके पिछड़ेपन के कारणों की जांच करे और उनके उत्थान के लिए ठोस नीति तैयार करे।
लेकिन संविधान सभा में इस अनुच्छेद का जबरदस्त विरोध हुआ। आंबेडकर को यहां तक कहना पड़ा कि “यदि इस देश में सामाजिक न्याय लाना है, तो शूद्रों को पहचानना और उन्हें ऊपर उठाना अनिवार्य है।” उनकी तर्कशक्ति और अडिग संकल्प के कारण अंततः अनुच्छेद 340 पारित हो गया—लेकिन इसके विरोध की जड़ें वहीं से गहरी हो गईं।
नेहरू और कालेलकर आयोग: एक अधूरी कोशिश
संविधान लागू होते ही (26 जनवरी 1950) आंबेडकर ने ओबीसी आयोग के गठन की मांग रखी, परंतु प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने इसे लगातार टालते रहे। इसी बीच हिन्दू कोड बिल पर भी ऊपरी जातियों और महिलाओं का विरोध तेज़ हो गया, जिससे निराश होकर आंबेडकर ने 1951 में मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया।
इसके बाद भी वे सक्रिय रहे और ओबीसी समुदाय को संगठित करने लगे। नेहरू को भय था कि ओबीसी वर्ग आंबेडकर के साथ एकजुट न हो जाए। इसी दबाव में 1953 में नेहरू ने ‘दत्तात्रेय बालकृष्ण (काका साहेब) कालेलकर’ की अध्यक्षता में ओबीसी आयोग गठित किया।
1955 में कालेलकर आयोग ने अपनी रिपोर्ट राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद को सौंपी, जिसमें ओबीसी की पहचान और आरक्षण की सिफारिशें की गईं। लेकिन नेहरू और कालेलकर दोनों ही उस रिपोर्ट से असहमत निकले। कालेलकर ने स्वयं टिप्पणी कर दी कि “मैं इस रिपोर्ट से सहमत नहीं हूं,” और इस तरह रिपोर्ट ठंडे बस्ते में डाल दी गई।
मंडल आयोग: जागृति की लौ और प्रतिरोध की राजनीति
डॉ. आंबेडकर के निधन (1956) के बाद ओबीसी आंदोलन ठहर गया, लेकिन 1970 के दशक में यह फिर से उभरा। 1977 में जनता पार्टी ने अपने चुनावी घोषणा-पत्र में पिछड़ा आयोग की सिफारिशें लागू करने का वादा किया। प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई ने पुरानी रिपोर्ट को अनुपयुक्त बताते हुए 1979 में नया आयोग गठित किया, जिसकी अध्यक्षता बी. पी. मंडल ने की।
31 दिसंबर 1980 को मंडल आयोग ने अपनी ऐतिहासिक रिपोर्ट प्रस्तुत की। इसने 3744 जातियों को सामाजिक और शैक्षिक दृष्टि से पिछड़ा चिन्हित करते हुए, उनके लिए 27% आरक्षण की सिफारिश की। लेकिन यह रिपोर्ट एक दशक तक धूल फांकती रही।
अंततः 7 अगस्त 1990 को प्रधानमंत्री वी. पी. सिंह ने मंडल आयोग की सिफारिशें लागू करने की घोषणा की। इससे उच्चवर्णीय संगठनों और तथाकथित हिन्दुत्ववादी दलों में हड़कंप मच गया। विश्व हिन्दू परिषद, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद और बजरंग दल जैसे संगठनों ने हिंसक विरोध किया। इसी दौर में भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी ने “राम रथ यात्रा” निकाली — जिससे समाज को धर्म के नाम पर फिर विभाजित किया गया।
वी. पी. सिंह सरकार गिर गई, लेकिन मंडल की लौ बुझी नहीं। ओबीसी राजनीति का नया अध्याय शुरू हो चुका था।
ओबीसी और मनुवादी राजनीति: एक स्थायी धोखा
विडम्बना यह है कि ओबीसी वर्ग आज भी यह पहचानने में विफल है कि उसके अधिकारों के मार्ग में सबसे बड़ा रोड़ा कौन रहा है। कांग्रेस और भाजपा दोनों ही ने जाति आधारित जनगणना को रोककर यह सुनिश्चित किया कि ओबीसी अपनी जनसंख्या के अनुपात में हिस्सेदारी न मांग सकें।
इसी तरह मंडल आयोग की सिफारिशों को कमजोर करने के लिए ‘क्रीमी लेयर’ और ‘50% सीमा’ जैसे प्रावधान लाए गए। यह वही दौर था जब अयोध्या आंदोलन के नाम पर बहुजन समाज का ध्यान मंडल से हटाकर ‘कमंडल’ की ओर मोड़ दिया गया।
6 दिसंबर 1992 को जब बाबरी मस्जिद गिराई गई, उसी दिन डॉ. आंबेडकर के महापरिनिर्वाण दिवस की भी वर्षगांठ थी। प्रतीकात्मक रूप से यह घटना बताती है कि मनुवादी राजनीति का असली निशाना हमेशा अंबेडकरवाद रहा है — क्योंकि वही इस व्यवस्था के मूल ढांचे को चुनौती देता है।
निष्कर्ष: जागृति का एक ही मार्ग — अंबेडकरवाद
ओबीसी समाज आज भी नेहरू, गांधी और तिलक को अपना नेता मानता है, जबकि डॉ. आंबेडकर ने ही उन्हें संवैधानिक पहचान, अधिकार और सामाजिक न्याय का आधार दिया। मनुवादी शक्तियों ने आंबेडकर को केवल “दलित नेता” के रूप में प्रचारित किया ताकि ओबीसी उनके योगदान से दूर रहें — और दुर्भाग्यवश यह षड्यंत्र काफी हद तक सफल भी रहा।
यदि ओबीसी वर्ग वास्तव में अपने अधिकारों को पाना चाहता है, तो उसे अंबेडकरवादी विचारधारा को आत्मसात करना होगा — क्योंकि वही उसे इतिहास की गुलामी से निकालकर स्वाभिमान की राजनीति की ओर ले जा सकती है।
जैसा कि भगवान बुद्ध ने कहा था —
“बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय।”
इस नारे का अर्थ केवल करुणा नहीं, बल्कि शक्ति और चेतना का पुनर्जागरण है।
Editor’s Note (संपादकीय टिप्पणी)
यह लेख भारतीय संविधान के अनुच्छेद 340 की उत्पत्ति, कालेलकर आयोग की उपेक्षा और मंडल आयोग की ऐतिहासिक स्वीकृति तक की जटिल यात्रा को गहराई से उजागर करता है। डॉ. भीमराव आंबेडकर की दृष्टि से शुरू होकर यह कथा भारतीय लोकतंत्र में सामाजिक न्याय की उस लम्बी लड़ाई को दर्ज करती है, जो आज भी अधूरी है।
लेख केवल अतीत की घटनाओं का वृत्तांत नहीं है — यह समकालीन ओबीसी समाज के सामने खड़े उस बुनियादी प्रश्न को भी रेखांकित करता है कि सत्ता में समान हिस्सेदारी के बिना समानता का स्वप्न अधूरा है।
VicharVani के इस विशेषांक में प्रकाशित यह लेख हमें याद दिलाता है कि संविधान के शब्द तभी जीवित रहते हैं, जब समाज उनके अर्थ को बचाने के लिए सजग रहता है।

