मुद्दा कोई भी हो, जगह चुनाव रैली हो या संसद, मोदी जी हमेशा नेहरू की या इतिहास की ही बात क्यों करते रहते हैं? वर्तमान में उनकी सरकार के पास क्या और मुद्दे नहीं हैं, जिनका वे जिक्र कर सकें?
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नेहरू क्यों? मोदी सरकार का ‘अतीतवाद’ और वर्तमान से भागती राजनीति

(एक जनपक्षीय विश्लेषण)

भारतीय राजनीति का एक दिलचस्प दृश्य है, मंच कोई भी हो, चुनावी रैली हो या संसद का पवित्र सदन, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अपने भाषणों में बार-बार दो ही चीज़ों पर लौट आते हैं: नेहरू और इतिहास। ऐसा लगता है जैसे भारत की सबसे बड़ी समस्याएँ, अर्थव्यवस्था की दिशा, कृषि संकट, बेरोज़गारी, महंगाई, तकनीकी पिछड़ापन, सबके जवाब 1947 से 1964 के बीच कहीं छिपे हुए हैं।

लेकिन सवाल यह है कि क्यों?
क्यों देश की सबसे शक्तिशाली सरकार, 400 सीटों का दावा करने वाली पार्टी, 11 साल शासन करने के बाद भी अपने वर्तमान की बात करने के बजाय, नेहरू की छाया से निकल नहीं पाती?

यह लेख इसी राजनीतिक मनोविज्ञान, सत्ता रणनीति और जन-ध्यान-भटकाव की तकनीक को सरल भाषा में खोलता है।

1. नेहरू—एक व्यक्ति नहीं, एक प्रतीक

भाजपा और संघ परिवार की राजनीति केवल नेहरू-व्यक्तित्व पर हमला नहीं करती।
वह उन मूल्यों पर हमला करती है जिनके कारण आधुनिक भारत की नींव रखी गई—
• वैज्ञानिक दृष्टिकोण
• धर्मनिरपेक्षता
• बहुलवाद
• संस्थागत लोकतंत्र
• सामाजिक न्याय
• आधुनिक शिक्षा
• तर्क और विवेकवाद

यह पूरा ढाँचा भाजपा के राष्ट्रवाद की कथा से मेल नहीं खाता।
इसलिए नेहरू विपक्षी नेता नहीं, एक वैकल्पिक भारत के प्रतीक हैं।
उन्हें गिराने का मतलब है उस भारत की कल्पना को गिराना जो वैज्ञानिकता और समानाधिकार पर बना है।

2. “अतीतवाद” वर्तमान की असफलताओं को ढकने का तरीका है

किसी भी सरकार की असली परीक्षा होती है, वर्तमान में।
आज रोजगार कहाँ है?
किसान आत्महत्या क्यों रोक नहीं पा रहे?
क्यों 80 करोड़ लोग वर्षों से मुफ्त राशन पर टिके हुए हैं?
स्वास्थ्य और शिक्षा की हालत क्यों बदतर है?
अर्थव्यवस्था का वास्तविक इंजन—MSME—क्यों ध्वस्त है?
महंगाई पर सरकार का कोई ठोस नियंत्रण क्यों नहीं?

इन सवालों का जवाब कठिन है।
इसलिए अतीत की ओर जाना आसान है।
नेहरू को दोष दो, 70 साल कहो, मुगलों को बीच में लाओ—और वर्तमान की असफलताएँ पर्दे के पीछे चली जाती हैं।

यह एक राजनीतिक मनोवैज्ञानिक रणनीति है:
लोग सोचते रहें कि जो हुआ है वह पहले की गलती है, वर्तमान से प्रश्न न पूछें।

3. भावनात्मक राजनीति: तर्क पर भावनाएँ भारी

नेहरू का नाम भीड़ की चेतना में एक ‘ट्रिगर’ की तरह इस्तेमाल किया जाता है।
उनका नाम लेते ही भाजपा वोटबेस के भीतर एक पैटर्न सक्रिय होता है—
कांग्रेस की नाकामी, वंशवाद, पुरानी राजनीति, समाजवाद, आदि…

यही “ट्रिगर” असल मुद्दों को पीछे धकेल देता है।
भावनात्मक राजनीति तर्क पर हावी हो जाती है।

नेहरू बashing का एक फायदा यह भी है कि इससे भाजपा का सपोर्ट-बेस तथ्यात्मक बहस से दूर रहता है, और बहस एक काल्पनिक अतीत में अटक जाती है।

4. इतिहास का पुनर्लेखन: नया राष्ट्रवाद गढ़ने की परियोजना

RSS का सपना है—एक वैकल्पिक राष्ट्रीय इतिहास।
जहाँ—
• आज़ादी के आंदोलन में संघ की भूमिका ऊँची दिखे,
• गांधी-नेहरू की वैचारिक विरासत को कमजोर किया जाए,
• हिंदू राष्ट्रवाद को भारत का मूल चरित्र साबित किया जाए,
• आधुनिक भारत के श्रेय में कांग्रेस का नाम कम किया जाए।

इस परियोजना में नेहरू सबसे बड़ी बाधा हैं।
वे उस आधुनिक भारत के निर्माता हैं जिसका सपना हिंदू राष्ट्रवाद नहीं देखता।

इसलिए मोदी सरकार “इतिहास” की चर्चा केवल मनोरंजन के लिए नहीं करती—
यह एक ideological repositioning है।
भारत के इतिहास को बदलकर राजनीति का भविष्य लिखा जा रहा है।

5. वर्तमान पर बोलने से डर क्यों?

अगर वर्तमान में ठोस उपलब्धियाँ होतीं, तो भाषण में 1947 या 1962 न आते—
आते 2024–2025 की नीतियाँ, उनका असर, लोगों की ज़िंदगी में बदलाव।

लेकिन आज़ादी के अमृतकाल के नारे के बावजूद,
• गरीबों की आय 10 साल में लगभग स्थिर
• 90% लोग अनौपचारिक श्रम में
• बेरोज़गारी 45 साल के रिकॉर्ड स्तरों पर
• शिक्षा में सरकारी निवेश लगातार घटता
• स्वास्थ्य सुविधा जीडीपी के 2% से नीचे
• प्रेस और न्यायपालिका की विश्व रैंकिंग गिरती हुई
• कृषि संकट का समाधान ठप्प
• डेटा नीति अस्पष्ट
• महिलाओं की कार्य भागीदारी दुनिया में सबसे नीचे

इनमें से किसी पर सरकार खुलकर बोल नहीं सकती।
इसलिए सुरक्षित विषय है—नेहरू।

6. विपक्ष को ‘अतीत’ में उलझाने की रणनीति

भाजपा चाहती है कि विपक्ष कभी भी वर्तमान की ठोस लड़ाई न लड़े।
वह चाहे कि विपक्ष नेहरू के बचाव और भाजपा के आरोपों के जवाब में उलझा रहे।
इससे राष्ट्रीय बहस फँसी रहती है,
“नेहरू अच्छे थे या बुरे?”
जबकि असली सवाल होना चाहिए,
“आज देश की जनता किस स्थिति में है?”

यह एक चाल है,
बहस को अतीत के दायरे में बाँध देना, ताकि वर्तमान की जवाबदेही न उठ सके।

7. मीडिया-सिस्टम का amplification

मीडिया का बड़ा हिस्सा सरकार की लाइन को amplify करता है।
इसलिए हर भाषण, हर ट्रोल-आर्मी मैसेज, हर डिबेट का निष्कर्ष वही,
नेहरू।
कभी उनकी नीतियाँ गलत,
कभी उनकी विदेश नीति गलत,
कभी चीन युद्ध की याद,
कभी समाजवाद पर व्यंग्य।

इस शोर में एक चीज़ खो जाती है,
आज की सरकार की असलियत।

8. नेहरू पर हमला—गांधी और संविधान पर अप्रत्यक्ष हमला

नेहरू का विचार Gandhi–Ambedkar–Tagore–Nehru की उस धारा का हिस्सा है जो आधुनिक, बहुलतावादी, संवैधानिक भारत का सपना देखती थी।
नेहरू के खिलाफ लगातार प्रचार चलाकर भाजपा उस पूरे वैचारिक परिवार को कमजोर करती है, जहाँ—
• धर्म-राज्य अलग हों
• किसी धर्म का प्रभुत्व न हो
• नागरिक पहले, हिंदू–मुस्लिम बाद में
• संविधान सर्वोपरि हो
• राज्य वैज्ञानिक दृष्टिकोण से चले
• इतिहास विवेक और प्रमाण पर टिका हो

नेहरू की आलोचना दरअसल संविधानवादी भारत की आलोचना है।

9. यह केवल अतीत की राजनीति नहीं, भविष्य की तैयारी है

कौन कहता है कि इतिहास केवल पीछे देखने की चीज़ है?
सत्ता उसे आगे बढ़ने का साधन बनाती है।

नेहरू को बार-बार दोष देने से दो फायदे मिलते हैं,
एक- जनता आज की समस्याओं से विचलित नहीं होती।
दो- धीरे-धीरे एक नया ऐतिहासिक नैरेटिव बनता जाता है कि जो भी कमी है, वह “पुराने भारत” की वजह से है।

जब जनता इस बात पर यकीन करने लगती है, तब सत्ता के लिए हर असफलता को वैचारिक जीत में बदलना आसान हो जाता है।

10. इसलिए मोदी नेहरू को याद करते हैं क्योंकि वे आज को भूलवाना चाहते हैं

नेहरू को याद करना मोदी सरकार का ‘शौक’ नहीं,
यह strategy है।
लोगों को वर्तमान की पीड़ा से दूर रखकर अतीत के झगड़े में उलझाना,
और इस बहस को इतना बड़ा बना देना कि बेरोज़गारी, शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि जैसे विषय “secondary” बन जाएँ।

अगर सरकार वर्तमान में सफल होती,
तो प्रधानमंत्री का हर भाषण 1947–1962 में नहीं अटकता।
वह भविष्य की रोडमैप दिखाते।
लेकिन जब आज के पास दिखाने को बहुत कुछ न हो,
तो नेहरू ही सबसे आसान target हैं।

निष्कर्ष

भारत का भविष्य केवल इतिहास पर भाषणों से सुरक्षित नहीं होगा।
असली जिम्मेदारी है,
आज की चुनौतियों का समाधान,
आज के नागरिकों की गरिमा की रक्षा,
और आज की अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाना।

नेहरू को रोज़ याद करना यह साबित करता है कि
मोदी सरकार इतिहास में नहीं, वर्तमान से भाग रही है।

भारत का भविष्य तभी बदलेगा जब बहस अतीत से हटकर वर्तमान की ठोस नींवों पर खड़ी होगी।
और यह जिम्मेदारी जनता, बुद्धिजीवियों, मीडिया और विपक्ष, सभी की है कि वे सरकार को आज का हिसाब देने पर मजबूर करें।

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