सवेरा सिर्फ सूरज का नहीं होता: स्त्री की सुबह की साधना

सवेरे की पहली किरण अभी आसमान से टकराने भी नहीं पाई होती, अंधेरे में अभी रात के सितारे झिलमिला रहे होते हैं, तभी एक आवाज़ घर की नींद को चीरती है – एक स्त्री की उठती हुई सांसों की आहट। यह सवेरा सूरज के उगने का इंतज़ार नहीं करता, बल्कि यह तो स्त्री की आँखों के खुलते ही शुरू हो जाता है। उसकी पलकों के झपकने के साथ ही घर की दुनिया में एक नया अध्याय लिखा जाने लगता है।

वह अलार्म घड़ी नहीं, जीवन की घड़ी है

हम अक्सर सवेरे को सूर्योदय से जोड़कर देखते हैं, लेकिन उस स्त्री के लिए तो सवेरा उस पल शुरू हो जाता है जब वह बिस्तर छोड़ने का संकल्प लेती है। चाहे शरीर थका हो, मन सोया चाहता हो, पर वह जानती है कि उसके जागने पर एक पूरा संसार निर्भर है। वह अलार्म घड़ी नहीं है, बल्कि परिवार की जीवन-घड़ी है जो हर सुबह फिर से चलने लगती है।

चूल्हे-चौके की पूजा

सुबह की पहली पूजा चूल्हे-चौके से शुरू होती है। नाश्ता तैयार करना सिर्फ रसोई का काम नहीं, बल्कि एक रस्म है जहाँ हर व्यंजन में प्यार और चिंता का तड़का लगता है। बच्चे की टिफिन में सब्जी डालते हुए वह उसके भविष्य की कामना करती है, पति के लिए चाय बनाते हुए उसकी दिनभर की थकान का ख्याल रखती है। यह साधना है – निस्वार्थ भाव से परिवार के लिए अपनी ऊर्जा अर्पित करने की।

समय के साथ दौड़ती एक जादूगरनी

सुबह की स्त्री एक जादूगरनी की तरह होती है जो समय के साथ दौड़ते हुए भी हर काम पूरा कर लेती है। एक ही समय में वह बच्चे को यूनिफॉर्म पहनाती है, लंच बॉक्स पैक करती है, बड़ों की दवाईयाँ देती है और ऑफिस के लिए तैयार होती है। उसकी इस साधना में कोई मंत्र नहीं, कोई योग मुद्रा नहीं – बस एक अदृश्य ताकत है जो उसे हर सुबह फिर से खड़ा कर देती है।

वह सूरज से पहले जागती है, चाँद से पहले सोती है

स्त्री का दिन प्रकृति के चक्र से भी आगे चलता है। वह सूरज से पहले जागती है और अक्सर चाँद के उगने तक काम करती रहती है। उसकी सुबह की साधना में कोई ध्यान लगाने का विलास नहीं, बल्कि ध्यान ही कर्म बन जाता है। हर काम में वह इतनी तल्लीन होती है कि उसकी हर हरकत एक प्रकार की मेडिटेशन बन जाती है।

सवेरे के अंधेरे में छिपा संकल्प

उस सुबह के अंधेरे में, जब बाकी दुनिया सो रही होती है, स्त्री अपने सपनों, आकांक्षाओं और जिम्मेदारियों के बीच संतुलन बिठाती है। वह न केवल दूसरों के सपनों को सँवारती है बल्कि अपनी आकांक्षाओं को भी जीवित रखती है। ऑफिस के लिए तैयार होती वह स्त्री सिर्फ कपड़े नहीं बदल रही, बल्कि एक भूमिका बदल रही होती है।

निष्कर्ष: वह सवेरा स्वयं है

सच तो यह है कि स्त्री स्वयं सवेरा है। वह नई शुरुआत है, नई उम्मीद है, नई ऊर्जा है। उसके जागने के साथ ही घर में जीवन का संचार होता है। सूरज तो बस एक साक्षी है, असली सवेरा तो उस स्त्री की आँखों में होता है जो हर सुबह बिना थके, बिना रुके, बिना शिकायत के फिर से शुरू होती है।

उसकी यह साधना किसी मस्जिद-गुरुद्वारा तक सीमित नहीं, बल्कि उसके हर कर्म में बसी है, और शायद इसीलिए कहा गया है – “यत्र स्त्रियः आदर्यन्ते तत्र सुखसमृद्धिः वसति।” – जहाँ नारी का आदर होता है, वहां सुख, समृद्धि निवास करते हैं। पर हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि उसकी सबसे बड़ी पूजा है – उसके इस निस्वार्थ समर्पण को समझना और उसके प्रति कृतज्ञता महसूस करना।

आइए, कल सवेरे जब सूरज उगे, तो हम उस सच्चे सवेरे को सलाम करें जो हमारे घरों में हर रोज एक स्त्री की आँखों के खुलने के साथ जन्म लेता है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *