‘रिजीम चेंज’ का डर या जनादेश का सम्मान? सत्ता परिवर्तन की बहस में लोकतंत्र की असली परीक्षा

जनता को चुनाव में सरकार बदलने का अधिकार है। विरोध-प्रदर्शन को तख्तापलट की साजिश बताकर बदनाम करना लोकतंत्र की भावना के विरुद्ध है। सवाल यह है कि सत्ता परिवर्तन से डर किसे लगता है और क्यों?

लोकतंत्र में सत्ता स्थायी नहीं, जनता सर्वोपरि है

लोकतंत्र की सबसे बड़ी खूबी यह है कि इसमें कोई भी सरकार स्थायी नहीं होती। जनता किसी राजनीतिक दल को सत्ता सौंपती है, लेकिन यह अधिकार आजीवन के लिए नहीं देती। सरकार अच्छा काम करे तो उसे दोबारा जनादेश मिलता है; जनता असंतुष्ट हो जाए तो वह उसे चुनाव के जरिए सत्ता से बाहर भी कर सकती है। यही लोकतंत्र है और यही संविधान की मूल भावना है।

लेकिन जब सत्ता परिवर्तन की बात को ही देशविरोधी साजिश, अराजकता और तख्तापलट से जोड़कर पेश किया जाने लगे, तब सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या सत्ताधारी दल लोकतंत्र की इस बुनियादी सच्चाई को स्वीकार करता है?

नेहा बोरा और प्रशांत भूषण द्वारा कथित रूप से ‘रिजीम चेंज’ की बात किए जाने के बाद भाजपा के नेताओं की प्रतिक्रियाओं ने इस बहस को और तेज कर दिया है। केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के बयानों में भारत में बांग्लादेश या फ्रांस जैसी परिस्थितियां पैदा करने की साजिश का आरोप सामने आया है। इन आरोपों की सच्चाई का मूल्यांकन प्रमाणों के आधार पर होना चाहिए, न कि केवल राजनीतिक आशंकाओं के आधार पर।

यदि कोई हिंसा भड़काने, संवैधानिक व्यवस्था को बलपूर्वक गिराने या विदेशी हस्तक्षेप के जरिए सत्ता हथियाने की साजिश करता है, तो उसकी जांच होनी चाहिए और दोष सिद्ध होने पर कानून के अनुसार कार्रवाई भी। लेकिन शांतिपूर्ण आंदोलन, सरकार की आलोचना और चुनाव के जरिए सत्ता बदलने की मांग को उसी श्रेणी में रख देना लोकतांत्रिक अधिकारों का संकुचन है।

सरकार का विरोध देश का विरोध नहीं है। सरकार बदलने की मांग संविधान बदलने या देश तोड़ने की साजिश नहीं है।

‘रिजीम चेंज’ का अर्थ समझिए

अंग्रेजी के ‘रिजीम चेंज’ शब्द का इस्तेमाल अलग-अलग संदर्भों में होता है। अंतरराष्ट्रीय राजनीति में यह किसी शासन-व्यवस्था या सरकार के परिवर्तन के लिए इस्तेमाल हो सकता है। कई बार इसका संबंध विदेशी हस्तक्षेप या बलपूर्वक सत्ता परिवर्तन से भी होता है। लेकिन भारतीय लोकतंत्र में चुनाव के जरिए सरकार बदलने की मांग एक सामान्य राजनीतिक प्रक्रिया है।

1977 में आपातकाल के बाद जनता ने इंदिरा गांधी की सरकार को सत्ता से बाहर कर दिया। क्या वह लोकतंत्र के विरुद्ध तख्तापलट था? नहीं, वह मतदाताओं का फैसला था। 2014 में जनता ने कांग्रेस के नेतृत्व वाली सरकार को हराकर भाजपा को सत्ता सौंपी। 2024 में भाजपा को लोकसभा में अपने दम पर बहुमत नहीं मिला, लेकिन एनडीए के सहयोगियों के समर्थन से नरेंद्र मोदी तीसरी बार प्रधानमंत्री बने। इन तीनों घटनाओं का मूल संदेश यही है कि लोकतंत्र में सत्ता का अधिकार जनता के जनादेश से निर्धारित होता है।

इसलिए यदि विपक्ष कहता है कि मौजूदा सरकार को हराना है, उसकी नीतियों को बदलना है और अगली बार उसे सत्ता से बाहर करना है, तो इसमें अपने आप कोई असंवैधानिक बात नहीं है। विपक्ष का काम ही सरकार की आलोचना करना, जनता के मुद्दे उठाना और वैकल्पिक राजनीतिक व्यवस्था प्रस्तुत करना है।

सवाल यह नहीं कि विपक्ष सत्ता परिवर्तन क्यों चाहता है। सवाल यह है कि क्या वह ऐसा संवैधानिक तरीके से करना चाहता है? यदि हां, तो लोकतांत्रिक राजनीति में उसकी मांग को अपराध की तरह पेश करने का औचित्य क्या है?

नौ राज्यों की राजनीति और जनादेश की नैतिकता

2014 के बाद भारतीय राजनीति में कई राज्यों में सरकारों के गठन, विधायकों की बगावत, इस्तीफों और दल-बदल को लेकर गंभीर विवाद सामने आए। अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर, गोवा, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, पुडुचेरी, महाराष्ट्र, उत्तराखंड और बिहार इसके प्रमुख उदाहरण हैं।

2016 में अरुणाचल प्रदेश में कांग्रेस की सरकार राजनीतिक उथल-पुथल के बाद गिर गई और पेमा खांडू अंततः भाजपा के नेतृत्व वाले राजनीतिक खेमे में आ गए। 2017 में गोवा में कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी थी, लेकिन भाजपा ने अन्य दलों के समर्थन से सरकार बना ली। उसी वर्ष मणिपुर में भी कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी होने के बावजूद भाजपा गठबंधन सरकार बनाने में सफल रही।

2018 में कर्नाटक में कांग्रेस-जेडीएस गठबंधन की सरकार बनी, लेकिन 2019 में विधायकों के इस्तीफों के बाद सरकार गिर गई और भाजपा सत्ता में आ गई। मध्य प्रदेश में 2020 में ज्योतिरादित्य सिंधिया के साथ कांग्रेस के 22 विधायकों के इस्तीफे के बाद कमलनाथ सरकार गिर गई। पुडुचेरी में 2021 के विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस सरकार बहुमत खो बैठी।

महाराष्ट्र में 2022 में शिवसेना के भीतर बगावत के बाद उद्धव ठाकरे की सरकार गिर गई और एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में नई सरकार बनी। 2023 में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी में विभाजन हुआ और अजित पवार भाजपा-शिवसेना सरकार में शामिल हो गए। बिहार में नीतीश कुमार ने 2017 में महागठबंधन छोड़कर भाजपा के साथ सरकार बनाई और 2024 में फिर महागठबंधन से अलग होकर एनडीए में लौट आए।

उत्तराखंड में 2016 के राजनीतिक संकट के दौरान राष्ट्रपति शासन लगा, लेकिन न्यायिक हस्तक्षेप और फ्लोर टेस्ट के बाद हरीश रावत की सरकार बहाल हुई।

इन घटनाओं को एक ही तरह का ‘तख्तापलट’ कहना कानूनी और राजनीतिक दृष्टि से उचित नहीं होगा। हर मामले की परिस्थितियां अलग थीं। कुछ घटनाओं में न्यायालयों ने हस्तक्षेप किया, कुछ में दल-बदल कानून और विधायकों की भूमिका पर सवाल उठे, और कुछ में गठबंधन की राजनीति निर्णायक रही।

फिर भी इन घटनाओं से एक महत्वपूर्ण लोकतांत्रिक प्रश्न पैदा होता है: क्या सरकार बनाने के लिए केवल कानूनी रूप से आवश्यक संख्या जुटाना पर्याप्त है, या मतदाताओं के मूल जनादेश की नैतिकता का भी सम्मान किया जाना चाहिए?

संवैधानिक व्यवस्था में बहुमत का परीक्षण विधानसभा के पटल पर होता है। लेकिन जब चुनाव के बाद लगातार दल-बदल, राजनीतिक खरीद-फरोख्त के आरोप और टूटते गठबंधन सत्ता गठन का माध्यम बनते हैं, तब जनता के मन में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि उसके वोट का वास्तविक मूल्य कितना बचा है।

लोकतंत्र को केवल सरकार बनाने की तकनीक तक सीमित नहीं किया जा सकता। इसमें जनादेश, राजनीतिक नैतिकता, पारदर्शिता और जवाबदेही भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं।

विरोध-प्रदर्शन लोकतंत्र की कमजोरी नहीं, उसकी ताकत हैं

सत्ता में बैठे लोग अक्सर बड़े आंदोलनों को बाहरी ताकतों की साजिश बताकर उनकी वैधता पर सवाल उठाते हैं। लेकिन इतिहास बताता है कि अनेक जनआंदोलन छोटे और स्थानीय मुद्दों से शुरू होकर व्यापक सामाजिक असंतोष का रूप लेते रहे हैं।

जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में 1970 के दशक का आंदोलन भ्रष्टाचार, महंगाई, बेरोजगारी और शासन के खिलाफ असंतोष से जुड़ा था। बाद में यह देशव्यापी राजनीतिक आंदोलन बना। उस आंदोलन में आज की भाजपा की पूर्ववर्ती राजनीतिक धारा, जनसंघ और संघ से जुड़े लोगों ने भी भाग लिया था।

इसी तरह अन्ना हजारे के नेतृत्व में 2011 का भ्रष्टाचार-विरोधी आंदोलन भी व्यापक जनसमर्थन के साथ सामने आया। उस समय आंदोलन को लोकतांत्रिक बदलाव की मांग के रूप में प्रस्तुत किया गया था। इसलिए आज जब दूसरे नागरिक सरकार की नीतियों के खिलाफ सड़कों पर उतरते हैं, तो उनके अधिकारों का मूल्यांकन भी समान लोकतांत्रिक कसौटी पर होना चाहिए।

हालांकि, इतिहास के इन उदाहरणों का अर्थ यह नहीं कि हर आंदोलन की हर मांग या हर कार्रवाई सही है। किसी भी आंदोलन की प्रकृति, उद्देश्य, तरीके और प्रमाणों की जांच की जा सकती है। लेकिन शांतिपूर्ण विरोध को केवल इसलिए साजिश नहीं कहा जा सकता कि उससे सरकार असहज हो रही है।

फ्रांस और बांग्लादेश के उदाहरणों को भारत पर लागू करने से पहले वहां की परिस्थितियों और यहां की संवैधानिक व्यवस्था के बीच अंतर समझना जरूरी है। दूसरे देशों में हिंसा या राजनीतिक संकट का उल्लेख करके भारत के प्रत्येक आंदोलन को उसी श्रेणी में रख देना तर्कसंगत नहीं है।

जनता जब महंगाई, बेरोजगारी, शिक्षा, भ्रष्टाचार या चुनावी प्रक्रिया को लेकर सवाल उठाती है, तो उसका उत्तर तथ्यों और नीतियों से दिया जाना चाहिए। हर असहमति में विदेशी हाथ खोजने से वास्तविक समस्याएं समाप्त नहीं हो जातीं।

किसान आंदोलन ने क्या सिखाया?

तीन कृषि कानूनों के खिलाफ किसानों का आंदोलन भारतीय लोकतंत्र के हालिया इतिहास की महत्वपूर्ण घटनाओं में से एक है। लंबे समय तक चले इस आंदोलन में किसानों ने अपनी मांगों के समर्थन में धरने दिए, यात्राएं कीं और सरकार से बातचीत की। आंदोलन के दौरान जान गंवाने वाले किसानों की संख्या को लेकर अलग-अलग दावे सामने आए, लेकिन यह निर्विवाद है कि अनेक किसानों की मृत्यु हुई और आंदोलन ने देशव्यापी राजनीतिक बहस को जन्म दिया।

आखिरकार नवंबर 2021 में प्रधानमंत्री ने तीनों कृषि कानूनों को वापस लेने की घोषणा की और संसद ने उन्हें निरस्त कर दिया।

यह घटना बताती है कि सरकार के पास कानून बनाने का अधिकार है, लेकिन लोकतंत्र में उस अधिकार के साथ जनता के प्रति जवाबदेही भी जुड़ी होती है। जब किसी कानून को लेकर व्यापक विरोध हो, तब सरकार को केवल अपनी शक्ति का प्रदर्शन करने के बजाय आलोचनाओं और आशंकाओं का गंभीरता से परीक्षण करना चाहिए।

किसानों के आंदोलन को कभी-कभी ‘आंदोलनजीवी’ कहकर खारिज करने की कोशिश हुई। लेकिन सवाल यह है कि यदि नागरिक संगठित होकर अपने अधिकारों की रक्षा के लिए आवाज न उठाएं, तो लोकतंत्र में उनकी शिकायतें सरकार तक कैसे पहुंचेंगी?

आंदोलन किसी सरकार के लिए असुविधाजनक हो सकता है, लेकिन नागरिकों के शांतिपूर्ण संगठन और विरोध के अधिकार को समाप्त करना लोकतंत्र को कमजोर करेगा।

यही सिद्धांत बेरोजगार युवाओं, प्रतियोगी परीक्षाओं के अभ्यर्थियों और शिक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता की मांग करने वाले छात्रों पर भी लागू होता है। पेपर लीक, परीक्षा रद्द होने और भर्ती प्रक्रियाओं में अनियमितताओं के आरोपों की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। यदि कहीं प्रशासनिक या राजनीतिक जवाबदेही बनती है, तो कार्रवाई भी होनी चाहिए।

युवाओं को न्याय मांगने के लिए बार-बार सड़कों पर उतरना पड़े और सरकार उनकी समस्याओं का समाधान करने के बजाय उनके विरोध को राजनीतिक षड्यंत्र बताने लगे, तो यह शासन की जवाबदेही पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है।

‘सोरोस’ का आरोप और प्रमाणों की कसौटी

राजनीतिक बहस में जॉर्ज सोरोस और विदेशी फंडिंग के आरोप बार-बार सामने आते रहे हैं। किसी भी विदेशी संस्था या व्यक्ति द्वारा भारतीय राजनीति को प्रभावित करने के प्रयास की जांच करना सरकार का अधिकार ही नहीं, बल्कि आवश्यकता भी हो सकती है।

लेकिन लोकतंत्र में आरोप और प्रमाण के बीच स्पष्ट अंतर होता है। किसी पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता, विपक्षी नेता या आंदोलनकारी पर विदेशी धन से देश में अस्थिरता पैदा करने का आरोप लगाया जाता है, तो उसके समर्थन में विश्वसनीय साक्ष्य प्रस्तुत किए जाने चाहिए।

केवल किसी व्यक्ति का नाम दोहराने, उसके विचारों को विदेशी एजेंडा बताने या उसके साथ जुड़े लोगों पर संदेह जताने से आरोप सिद्ध नहीं हो जाते।

यदि सरकार के पास विदेशी हस्तक्षेप के ठोस प्रमाण हैं, तो उन्हें कानून के अनुरूप जांच और न्यायिक प्रक्रिया के सामने रखा जाना चाहिए। यदि प्रमाण नहीं हैं, तो राजनीतिक प्रचार के जरिए किसी नागरिक की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाना अनुचित है।

यही कसौटी सभी पर समान रूप से लागू होनी चाहिए। विपक्ष के आंदोलन को विदेशी साजिश बताने वाले नेताओं से भी पूछा जा सकता है कि वे अपने राजनीतिक जीवन में जब सरकारों के खिलाफ आंदोलनों में शामिल हुए थे, तब क्या उनके पास विदेशी समर्थन के प्रमाण थे? यदि नहीं, तो आज दूसरे लोगों के लिए अलग नियम क्यों?

राजनीतिक विरोधियों पर आरोप लगाने की स्वतंत्रता का अर्थ उन्हें दोषी घोषित करने का अधिकार नहीं है। लोकतंत्र में कानून व्यक्ति की राजनीतिक पहचान देखकर नहीं, प्रमाणों और स्थापित प्रक्रिया के आधार पर काम करता है।

महंगाई, बेरोजगारी और आर्थिक असुरक्षा के सवाल

किसी भी सरकार की लोकप्रियता का वास्तविक परीक्षण केवल चुनावी नारों या राजनीतिक अभियानों से नहीं, बल्कि आम नागरिक के जीवन में होने वाले बदलावों से होता है।

यदि परिवारों को भोजन, शिक्षा, स्वास्थ्य और आवास पर बढ़ते खर्च का सामना करना पड़ रहा है, युवाओं को पर्याप्त रोजगार नहीं मिल रहा है, किसानों को खेती की लागत और उचित आय के बीच संतुलन बनाने में कठिनाई हो रही है तथा छोटे कारोबारियों को आर्थिक अनिश्चितता का सामना करना पड़ रहा है, तो इन सवालों के जवाब सरकार को देने होंगे।

सरकार इन समस्याओं के लिए वैश्विक परिस्थितियों, पिछली सरकारों या बाहरी ताकतों को जिम्मेदार ठहरा सकती है। कुछ परिस्थितियों में ये कारण वास्तव में महत्वपूर्ण भी होते हैं। लेकिन इससे वर्तमान सरकार की नीतियों और उनके परिणामों की समीक्षा की आवश्यकता समाप्त नहीं होती।

जनता ने सरकार को इसलिए नहीं चुना कि वह हर आलोचना का जवाब राजनीतिक आरोपों से दे। उसे इसलिए चुना कि वह समस्याओं का समाधान करे, संस्थाओं को मजबूत बनाए और नागरिकों के जीवन को बेहतर बनाने के लिए काम करे।

लोकतंत्र में सरकार की सफलता का प्रमाण यह नहीं कि उसके खिलाफ कोई आवाज न उठे। असली प्रमाण यह है कि नागरिक बिना भय के अपनी शिकायत रख सकें और सरकार उन शिकायतों को सुनकर सुधार करने के लिए तैयार हो।

लोकतांत्रिक संस्थाओं की निष्पक्षता क्यों जरूरी है?

सत्ता परिवर्तन की बहस का एक महत्वपूर्ण पक्ष चुनावी प्रक्रिया और संवैधानिक संस्थाओं पर जनता का विश्वास है। निर्वाचन आयोग, न्यायपालिका, संसद और जांच एजेंसियों की विश्वसनीयता लोकतंत्र के लिए अनिवार्य है।

यदि चुनावी प्रक्रिया को लेकर सवाल उठते हैं, तो उनका जवाब पारदर्शी तथ्यों से दिया जाना चाहिए। यदि किसी राजनीतिक दल को लगता है कि चुनाव में अनियमितता हुई है, तो उसे कानूनी उपाय अपनाने का अधिकार है। इसी तरह संबंधित संस्थाओं का दायित्व है कि वे शिकायतों की निष्पक्ष जांच करें और अपने निर्णयों का तर्कसंगत आधार स्पष्ट करें।

किसी संस्था की आलोचना करना अपने आप में उसे कमजोर करना नहीं है। बल्कि जवाबदेही की मांग कई बार संस्थाओं में जनता का विश्वास मजबूत करने का माध्यम बनती है।

लेकिन यह भी उतना ही आवश्यक है कि संस्थाओं पर लगाए गए आरोपों को बिना प्रमाण अंतिम सत्य न मान लिया जाए। लोकतांत्रिक विमर्श में आलोचना की स्वतंत्रता और तथ्यात्मक जिम्मेदारी, दोनों साथ-साथ चलने चाहिए।

सरकार और विपक्ष, दोनों को यह समझना होगा कि संवैधानिक संस्थाएं किसी एक राजनीतिक दल की संपत्ति नहीं हैं। उनका दायित्व नागरिकों और संविधान के प्रति है।

सत्ता के अहंकार की भी एक सीमा होती है

इतिहास में अनेक ऐसी सरकारें रही हैं, जिन्होंने अपनी राजनीतिक शक्ति को स्थायी समझ लिया। उन्हें लगा कि प्रशासनिक नियंत्रण, प्रचार, विरोधियों की आलोचना और राजनीतिक संगठन के सहारे वे लंबे समय तक सत्ता में बनी रहेंगी। लेकिन लोकतंत्र में जनता का असंतोष धीरे-धीरे व्यापक राजनीतिक बदलाव का रूप ले सकता है।

भारत का स्वतंत्रता आंदोलन इसका बड़ा उदाहरण है। औपनिवेशिक सत्ता के पास प्रशासन, पुलिस और सेना की शक्ति थी, फिर भी वह जनता की स्वतंत्रता की आकांक्षा को हमेशा के लिए दबा नहीं सकी। आपातकाल के बाद 1977 में हुए चुनावों ने भी दिखाया कि नागरिक मताधिकार के जरिए शक्तिशाली सरकार को सत्ता से बाहर कर सकते हैं।

इस इतिहास का अर्थ हिंसा या अराजकता को उचित ठहराना नहीं है। इसका अर्थ यह है कि सत्ता की वैधता जनता की स्वीकृति और संवैधानिक व्यवस्था से आती है, केवल बल-प्रयोग से नहीं।

इसलिए ‘बांग्लादेश जैसे हालात’ की चेतावनी देने के बजाय सरकार को उन परिस्थितियों को समझना चाहिए, जिनमें जनता का असंतोष बढ़ता है। यदि बेरोजगारी, महंगाई, सामाजिक असमानता, भ्रष्टाचार या संस्थागत अविश्वास जैसी समस्याएं मौजूद हैं, तो उनका समाधान राजनीतिक संवाद, जवाबदेही और नीतिगत सुधारों से ही होगा।

किसी भी देश को ऐसे मोड़ पर नहीं पहुंचना चाहिए, जहां नागरिकों को लगे कि उनकी आवाज सुनने के लिए कोई लोकतांत्रिक रास्ता बचा ही नहीं है। यही कारण है कि शांतिपूर्ण विरोध और स्वतंत्र राजनीतिक विमर्श की रक्षा केवल विपक्ष का नहीं, बल्कि सरकार का भी दायित्व है।

निष्कर्ष: लोकतंत्र में जनता ही अंतिम निर्णायक है

‘रिजीम चेंज’ को लेकर जारी राजनीतिक बहस का सार बहुत सरल है। भारत में सत्ता परिवर्तन का संवैधानिक और लोकतांत्रिक रास्ता चुनाव है। चुनावों के बीच सरकार की आलोचना करना, जनआंदोलन चलाना, नीतियों को बदलने की मांग करना और अगले चुनाव में सरकार को हराने का संकल्प लेना भी लोकतांत्रिक राजनीति का हिस्सा है।

हिंसा, विदेशी हस्तक्षेप या बलपूर्वक सत्ता परिवर्तन की किसी वास्तविक साजिश के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए। लेकिन ऐसी साजिश के आरोप को शांतिपूर्ण असहमति को कुचलने का सामान्य बहाना नहीं बनाया जा सकता।

भाजपा हो या कोई अन्य राजनीतिक दल, जब वह विपक्ष में हो तो उसे आंदोलन और सत्ता परिवर्तन की मांग का अधिकार है। जब वही दल सत्ता में आए, तो उसे दूसरों के लिए भी समान अधिकार स्वीकार करने चाहिए। लोकतंत्र की विश्वसनीयता इसी सिद्धांत पर टिकी है।

आज सरकार को अपने आलोचकों से यह पूछने से पहले कि वे सत्ता परिवर्तन क्यों चाहते हैं, स्वयं से पूछना चाहिए कि जनता किन समस्याओं से परेशान है। क्या बेरोजगार युवाओं को पर्याप्त अवसर मिल रहे हैं? क्या किसानों की आय और सुरक्षा के प्रश्नों का समाधान हो रहा है? क्या महंगाई से जूझ रहे परिवारों को राहत मिल रही है? क्या नागरिकों को बिना भय के अपनी बात कहने की स्वतंत्रता है? क्या संवैधानिक संस्थाओं पर जनता का विश्वास मजबूत हो रहा है?

इन सवालों का उत्तर राजनीतिक नारों से नहीं, ठोस नीतियों और उनके परिणामों से देना होगा।

सत्ता जनता की सेवा का दायित्व है, जनता पर शासन करने का स्थायी लाइसेंस नहीं।

जो सरकार अपने विरोध को सुन सकती है, अपनी गलतियों को स्वीकार कर सकती है और जनता के प्रति जवाबदेह रह सकती है, वही लोकतंत्र को मजबूत बनाती है। जो सरकार हर असहमति को षड्यंत्र और हर आलोचक को शत्रु मानने लगती है, वह स्वयं अपनी लोकतांत्रिक विश्वसनीयता को कमजोर करती है।

अंततः लोकतंत्र में किसी प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री या राजनीतिक दल की कुर्सी स्थायी नहीं होती। स्थायी महत्व संविधान, नागरिक अधिकारों और जनता की संप्रभुता का है।

जनता को सरकार चुनने का अधिकार है, तो उसे सरकार बदलने का अधिकार भी है। यही लोकतंत्र है, यही संवैधानिक राजनीति है और यही किसी भी जनपक्षीय व्यवस्था की बुनियाद होनी चाहिए।

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