दोहरी आंधी: महंगाई-बेरोजगारी और पूंजी पलायन
इस देश में दो तरह की आंधियां चल रही हैं। एक है महंगाई, बेरोजगारी और नौकरियों के जाने की। दूसरी है भारत से बाहर भागने की—यह उल्टी दिशा में चलने वाली आंधी बहुत खतरनाक है। इसमें भारतीय रुपया और डॉलर दोनों उड़े चले जा रहे हैं। विदेशी निवेशक ही नहीं, भारतीय निवेशक भी अपना पैसा बाहर भेज रहे हैं। अर्थव्यवस्था को चलाने वाले आम लोग यह नहीं समझ पा रहे कि उनकी बदहाली का राज क्या है या पैसा क्यों उड़ाया जा रहा है। व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी के अंकल इन दिनों क्या बोल रहे हैं, यह भी एक पहेली है।
शेयर बाजार का बिगड़ता हाल
18 मई की दोपहर बाद बाजार संभल गया, मगर खुलते ही चंद घंटों में निवेशकों के 7 लाख करोड़ रुपये हवा हो गए। सेंसेक्स में लिस्टेड कंपनियों का मार्केट कैप 12 नवंबर को 473 लाख करोड़ था और अब 454 लाख करोड़ पर आ गया है। सात महीने में निवेशकों के करीब 20 लाख करोड़ रुपये हवा हो चुके हैं। भारत के शेयर बाजार में नकारात्मक रिटर्न की आंधी चल रही है, और देश के निवेशक भी यहां से पैसा निकालकर बाहर लगा रहे हैं।
आंकड़े बता रहे उल्टी आंधी का सच
मार्च 2025 से फरवरी 2026 के बीच भारतीयों ने विदेशी शेयर बाजारों में 2.2 अरब डॉलर का निवेश किया—जो पिछले साल की तुलना में 60% अधिक है। पिछले एक साल में रिटेल निवेशकों (आम निवेशकों) की हिस्सेदारी भारतीय स्टॉक में 9.2% घट गई है। फरवरी और मार्च में भारतीय कंपनियों का विदेशों में निवेश 138% बढ़ गया। विदेशी निवेशक भी पिछले दो महीनों में 2 लाख करोड़ रुपये निकाल ले गए। सवाल है: आखिर सब भागे क्यों जा रहे हैं? क्या मोदी सरकार के पास वक्त या कोई रास्ता बचा है?
आपदाओं का दशक और नागरिकता छोड़ने का रिकॉर्ड
पिछले 10 साल का हिसाब दिए बिना, प्रधानमंत्री मोदी आने वाले 10 साल को ‘आपदाओं का दशक’ बता रहे हैं। यह दशक वास्तव में दुनिया के लिए संकट लेकर आया है। अगर स्थितियां नहीं बदलीं, तो पिछली उपलब्धियों पर पानी फिर जाएगा और बड़ी आबादी गरीबी में धंस जाएगी। 2024 तक 18 लाख लोग भारत की नागरिकता छोड़ चुके थे। युद्ध केवल एक बहाना है; हालात पहले से ही खराब थे—बस चर्चा अब शुरू हुई है।
अडानी समूह का विदेश निवेश और दोहरी नीति
प्रधानमंत्री मोदी को अडानी समूह से अपील करनी चाहिए। खबरों के मुताबिक, अमेरिका में अपना केस खत्म करने के लिए अडानी समूह अरबों डॉलर का निवेश वहां करेगा और 15,000 नौकरियां पैदा करेगा। 18 मिलियन डॉलर देकर मामला सुलझाया जा रहा है। एक तरफ आम आदमी से कहा जा रहा है कि तेल की खपत कम करके डॉलर बचाए, वहीं दूसरी तरफ अडानी समूह 96,000 करोड़ रुपये का निवेश भारत से बाहर ले जा रहा है। सवाल है: भारत में कौन रह गया और उसकी हालत क्या है?
घटती कमाई, बढ़ती महंगाई और सरकारी बचत के संकेत
दर्जनों रिपोर्ट बताती हैं कि लोगों की कमाई घट रही है। सैलरी इतनी नहीं कि खुलकर खर्च कर सकें या बाजार में मांग बढ़े। थोक महंगाई का असर खुदरा महंगाई पर पड़ने वाला है, और बैंकों के ब्याज और बढ़ेंगे। वित्त मंत्रालय ने सरकारी बैंकों से कहा है: यात्राएं कम करें, बैठकें वीडियो कॉन्फ्रेंस से करें और इलेक्ट्रिक वाहन अपनाएं। यह स्पष्ट संकेत है कि खतरा आ गया है—सायरन बज चुका है। ‘भारत तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था’ का ख्वाब टूट चुका है। केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण ने देशभर में मासिक बिजली बिल में भारी बढ़ोतरी का प्रस्ताव दिया है।
मजदूर, डिलीवरी बॉय और अनाज पर पलटी अर्थव्यवस्था
तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था को खींचने वाले वे लोग हैं जो कम मजदूरी पर काम करते हैं। न्यूनतम मजदूरी बिना आंदोलन के नहीं मिलती, और आंदोलन करने पर मजदूरों के खिलाफ मुकदमे हो जाते हैं। करोड़ों युवा होम डिलीवरी के काम में लगा दिए गए हैं—उनकी कमाई इतनी भर है कि न मिडिल क्लास में गिने जा सकें, न गरीब में। सरकार 2020 से 80 करोड़ लोगों को मुफ्त अनाज दे रही है। छह साल से लोग मुफ्त अनाज पर पेट पाल रहे हैं—इसी पीठ पर भारत की अर्थव्यवस्था रेंग रही है।
युवाओं के लिए नौकरी का सच
अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय की रिपोर्ट के अनुसार, बीए करने वालों में से केवल 4% युवाओं को कॉर्पोरेट नौकरी मिल पाती है। स्थायी नौकरी का ख्वाब धरा रह जाता है। चाहे बीए पास हो या स्कूल छोड़ने वाला, जिसे भी काम मिल रहा है, वह दिहाड़ी का ही है।
न्यायपालिका से लेकर प्रशासन तक का बदलता हाल
मेजर हर्षित शर्मा को अपनी बहन त्रिशा की कथित हत्या के बाद एफआईआर दर्ज कराने के लिए भोपाल में मुख्यमंत्री के घर के बाहर धरना देना पड़ा। त्रिशा की शादी वकील समर्थ सिंह से हुई थी। आरोप है कि शादी के पाँच महीने के भीतर उसे प्रताड़ित किया गया, गर्भ गिराने का दबाव बनाया गया, और 12 मई की रात उसकी मौत हो गई। समर्थ की मां जिला जज के पद से रिटायर हैं। त्रिशा के पिता नवनी शर्मा का कहना है कि वह एक पूरे सिस्टम के खिलाफ लड़ रहे हैं—आरोपी परिवार के लोग न्यायपालिका और चिकित्सा क्षेत्र में ऊंचे पदों पर हैं। उन्होंने मांग की है कि शव को एम्स दिल्ली में स्वतंत्र जांच के लिए भेजा जाए और सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में सुनवाई हो। वह कहते हैं, “जिस देश में एक मेजर को एफआईआर के लिए धरना देना पड़े, उस देश से मुझे कोई उम्मीद नहीं।”
रुपये का गिरना और निवेश का ठहराव
पिछले एक साल में रुपया डॉलर के मुकाबले 11.2% गिरा है। अर्थशास्त्री कौशिक बसू के अनुसार, पिछले 22 महीनों में कुल प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) लगभग शून्य रहा—जितना पैसा आया, उतना निकल गया। रुपया थाईलैंड, बांग्लादेश, श्रीलंका और पाकिस्तान की मुद्राओं के मुकाबले भी अधिक गिरा है। अगर तेल के दाम ऊंचे रहे और RBI हस्तक्षेप नहीं करता, तो डॉलर के मुकाबले रुपया 102 पर जा सकता है।
AI के मौके से चूक और भारत को ‘लूजर’ करार देना
जापान टाइम्स ने लिखा है कि जब AI दुनिया में निवेश का प्रवाह बदल रहा है, भारत सबसे बड़े ‘लूजर्स’ में से एक साबित हुआ है। आईटी में आगे रहने वाला देश AI में पीछे क्यों रह गया? प्रधानमंत्री मोदी अपने साथ अंबानी और अडानी को तो ले जाएंगे, लेकिन कोई ऐसा उत्पाद नहीं है जिसे लेकर भारत वैश्विक नेता का दावा कर सके।
विदेशी निवेशकों का मोहभंग और मार्केट कैप में गिरावट
ब्लूमबर्ग के आंकड़ों के मुताबिक, एक साल में अमेरिका, चीन, जापान, ताइवान, दक्षिण कोरिया आदि के मार्केट कैप में बढ़ोतरी हुई, जबकि भारत का मार्केट कैप 8.5% घट गया। फ्रांस का 4.2% घटा, लेकिन भारत उससे भी 4% अधिक गिरा। यानी युद्ध से पहले ही भारत के स्टॉक मार्केट को नुकसान होने लगा था। गोल्डमैन सैक्स की रिपोर्ट के अनुसार, अप्रैल में सीजफायर और तेल की कीमतों में गिरावट के बाद भी विदेशी निवेशक भारत नहीं लौटे—यह सिर्फ युद्ध का नहीं, बल्कि पिछले कई सालों की नाकामियों का संकट है।
टैक्स नीति और विदेश निवेश का रुझान
फाइनेंशियल एक्सप्रेस के अनुसार, भारत के सॉवरेन डेट मार्केट में विदेशी निवेशकों का हिस्सा मुश्किल से 3% है, क्योंकि बॉन्ड से मिलने वाले पैसे पर 20% टैक्स लगता है, जबकि चीन जैसे देश छूट देते हैं। यदि टैक्स जीरो कर दिया जाए, तो दो साल में 40-50 अरब डॉलर का निवेश आ सकता है, लेकिन सरकार ने यह कदम नहीं उठाया। दूसरी ओर, भारत की बड़ी कंपनियां (टाटा मोटर्स, रिलायंस, रिन्यू, जिंदल, रोल्टा) यूएई, सिंगापुर, मॉरीशस और अमेरिका में पैसा लगा रही हैं। मार्च 2025 से मार्च 2026 के बीच विदेश निवेश में 7 अरब डॉलर की बढ़ोतरी हुई। फरवरी-मार्च में ही विदेश निवेश 138% बढ़ गया। अब RBI भी कंपनियों से पूछेगा कि यह पैसा बोनाफाइड बिजनेस में जा रहा है या नहीं।
व्यापारिक माहौल, बुलडोजर राजनीति और ‘हिंदू सुख’
इस देश में किसी का व्यवसाय बंद कर देना बहुत आसान हो गया है। सरकार विदेशी मुद्रा लाने वाले यूट्यूब चैनलों को भी उड़ा सकती है, और जनता ताली बजाती है। रिश्वतखोरी, फर्जी केस, कब्जे—नए या पुराने, हर व्यवसायी के लिए खतरा बना हुआ है। वही कारोबार चमक रहा है जो सत्ताधारी दल को करोड़ों का चंदा देता है। ‘हिंदू सुख’ नाम की चीज बताई जा रही है—बिना कोर्ट के आदेश के किसी के घर या दुकान को बुलडोजर से गिरा देना, क्योंकि लोगों को यह अच्छा लगता है।
गर्मी और पर्यावरण का हाल
अप्रैल में दुनिया के 50 सबसे गर्म शहर सभी भारत के थे। ‘मां के नाम पर पेड़ लगाने’ की नौटंकी चल रही है, जबकि जंगल गायब किए जा रहे हैं। जो जंगल बचाने के लिए प्रदर्शन करते हैं, उन पर पुलिस लाठियां बरसा रही है। मिडिल क्लास को यह नहीं दिखता—उसे बस शेयर मार्केट में रिटर्न की चिंता है, और वह रिटर्न भी नहीं मिल रहा। मिल रहा है सिर्फ ‘हिंदू सुख’।

