देश निर्णायक आंदोलन की ओर
पृष्ठभूमि और व्यापकता
जनता एक बार फिर सड़कों पर उतरने जा रही है। इस बार आंदोलन का फोकस सिर्फ इंडिया गेट या दिल्ली के जंतरमंतर तक सीमित नहीं है, बल्कि देशभर में जगह–जगह मोदी और शाह के खिलाफ प्रदर्शन होने जा रहे हैं, जिनसे स्पष्ट होता है कि देश निर्णायक आन्दोलन की ओर बढ़ चला है। इसमें आम जनता, किसान, मजदूर और तमाम तरह के संगठन शामिल हो रहे हैं।औपचारिक रूप से आंदोलन 23 अक्टूबर से शुरू है, लेकिन 22 अक्टूबर की शाम से ही कई शहरों मेंलोग मोर्चे पर डट गए हैं। चेन्नई से लेकर दक्षिण और उत्तर भारत के कई शहरों तक प्रदर्शन शुरू हो चुकेहैं।
किसान, छात्र संगठन और चेतावनी
एक तरफ जेएनजे है और इस बार किसान भी मैदान में हैं। किसानों ने कई जगह मोर्चा संभाल लिया है।उनकी मांगें वोट चोरी के मुद्दे के साथ–साथ किसानों से जुड़ी अपनी मांगें भी हैं। बड़े किसान नेता राकेशटिकैत ने फिर कहा है कि अगर इस बार पुलिस ने—अमित शाह की पुलिस ने—छात्रों, बेटे या बेटी पर लाठी उठाई, तो इस बार खैर नहीं होगी, क्योंकि किसान मैदान पर उतर रहा है और मुंहतोड़ जवाब देगा।उन्होंने यह भी कहा कि जिस तरह से कुछ लोग पुलिस के साथ मिलकर परेशानी और मारपीट कर रहे हैं, छोटे बच्चों और लड़कियों को मार रहे हैं, वह बर्दाश्त के परे है। हम उसका मुकाबला करेंगे, उन्हें सुरक्षादेंगे और अगर ऐसे लोग मिलेंगे तो हमारे लोग भी उनका इलाज करने से पीछे नहीं हटेंगे।
23 अक्टूबर से 1 नवंबर तक बढ़ता दायरा
यह आंदोलन 23 अक्टूबर से शुरू होकर धीरे–धीरे 26 अक्टूबर तक और बड़े पैमाने पर होगा। इसका क्लाइमेक्स 1 नवंबर को होगा, जब दिल्ली में 7 से 8 लाख या उससे ज्यादा लोग प्रदर्शन करने आ सकते हैं। कांग्रेस की रैली रामलीला मैदान में है और मैदान 10 दिन के लिए बुक है।
सरकार की तैयारी और अमित शाह को कमान
मोदी और शाह ने इस दूसरे चरण के आंदोलन को लेकर दिनभर बैठकें कीं। इंटेलिजेंस ब्यूरो के प्रमुख, पुलिस कमिश्नर और अन्य अधिकारियों के साथ दिल्ली और चारों तरफ बड़ा बंदोबस्त किया गया।खासकर दिल्ली को बैरिकेड किया जा रहा है ताकि किसान पश्चिमी उत्तर प्रदेश, पंजाब और हरियाणा सेट्रैक्टर लेकर न घुस सकें। हालांकि किसानों ने कहा है कि 23 अक्टूबर को जिला मुख्यालयों पर प्रदर्शनहोगा। सरकार में “अंदर की खबर” के अनुसार, नरेंद्र मोदी ने इस बार सारी कमान अमित शाह को दे दीहै। कहा जा रहा है कि छह–सात दिन पहले मोदी–शाह की बैठक हुई और प्रधानमंत्री ने इस पूरे आंदोलन तथा समूचे विपक्ष और Gen-Z को डील करने की जिम्मेदारी शाह को दे दी। शाह ने आज ताबड़तोड़ इंतजाम भी किए हैं—सीमा पर पैरामिलिट्री तैनाती, बसों को रोकना और बाहर से आने वाले कार्यकर्ताओं पर नजर रखना। अमित शाह ने अपने जन्मदिन के मौके पर रैली करके सीधे राहुल गांधी को चैलेंज भी किया कि आप कुछ नहीं कर पाएंगे; चाहे जितने प्रोटेस्ट कर लो, सरकार नहीं जाने वाली। उन्होंने कहाकि 2014 से अगले 30 वर्षों तक आपकी सरकार नहीं बनने वाली।
निर्मला सीतारमण के पति का मार्च और भाजपा की भीतरी बेचैनी
एक और खबर के अनुसार, मोदी की खास मंत्री और वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के पति प्रभाकर परकला भी 23 अक्टूबर को आंदोलन में शामिल हो रहे हैं। कहा जा रहा है कि वे एसआईआर और वोटचोरी को लेकर कुछ बड़े खुलासे भी कर सकते हैं। यह मोदी के लिए अपमानजनक स्थिति बताई जा रहीहै। इसके साथ ही भाजपा के भीतर भी घमासान की चर्चा है। एक समय की “पार्टी विद द डिफरेंस” अबजनता दल जैसी हो गई है और भाजपा के भीतर कई भाजपाएँ मौजूद हैं। मुरली मनोहर जोशी, गडकरी, योगी आदित्यनाथ, वसुंधरा राजे, रमन सिंह, शिवराज सिंह चौहान, शाहनवाज हुसैन, राजीव प्रताप रूडीऔर रविशंकर प्रसाद जैसे कई नेताओं के बारे में कहा जा रहा है कि वे इस सरकार के मुखालिफ हैं औरमौके का इंतजार कर रहे हैं। संघ की दशहरा रैली में उस व्यक्ति की मौजूदगी भी चर्चा में है जिसका इस्तीफा आनन–फानन में लिया गया था और जिस पर कथित तौर पर उद्योगपति के इस्तेमाल से INDIA गठबंधन के सहयोग से चंद्रबाबू नायडू को प्रधानमंत्री बनाने का गेम रचने का आरोप था। वह व्यक्ति अगर मोहन भागवत के बगल में नागपुर में खड़ा है, तो दीवार पर लिखी इबारत समझने के लिए और कुछ नहीं चाहिए।
Gen-Z और “कॉकरोच जनता पार्टी” की भूमिका
इस आंदोलन का सारा दारोमदार Gen-Z पर निर्भर करता है। Gen-Z का मतलब 14-15 साल सेलेकर 28-29 साल तक के युवा हैं, जिनमें सबसे प्रमुख “कॉकरोच जनता पार्टी” है। इसके दो बड़े नेताआशुतोष राका और सौरव दास को जुडिशियल कस्टडी में जानबूझकर कई दिन रखा गया, लेकिन वे रिहाहो गए हैं। वे डरे नहीं हैं और उनका हौसला जारी है। कॉकरोच जनता पार्टी इस आंदोलन को और तेज करेगी और उसकी भी मीटिंग्स हो रही हैं। दिल्ली में Gen-Z की एक और लीडर नेहा बोरा ने कहा है कि इस बार के आंदोलन में समाज का हर तबका शामिल हो रहा है और उम्मीद है कि बड़ा इंपैक्ट पड़ेगा। उन्होंने कहा कि अगर किसी को लगता है कि जंतरमंतर को ब्लॉक करके प्रोटेस्ट रुक जाएंगे, तो वह गलत समझता है। कल जिस तरह से अलग–अलग सेक्शन के लोग—वकील, शिक्षक, प्रोफेसर, एक्टिविस्ट और छात्र—साथ आए, उसी तरह दिल्ली और देशभर में सड़कों पर उतरेंगे। एक ब्रॉडर यूनिटी के साथ प्रोटेस्ट जारी रहेगा।
अन्नामलाई का रुख और भाजपा भीतरी लॉबी
अमित शाह के पूर्व चेले और पूर्व आईपीएस अधिकारी अन्नामलाई ने अमित शाह से दूरी बनाई है। कहाजा रहा है कि उन्होंने “कॉकरोच जनता पार्टी” को पूरा समर्थन देने की बात कही है। यह अमित शाह के लिए बड़ी चुनौती मानी जा रही है। भाजपा के भीतर भी अमित शाह के खिलाफ एक लॉबी सक्रिय है और मोदी ने उस लॉबी को निपटाने की कोशिश की है, लेकिन उनके खिलाफ लोग संगठित हैं। यह भी कहाजा रहा है कि अमित शाह को आगे क्यों किया गया, यह शाह और मोदी ही जानें, लेकिन अगर दमन की कोशिश की गई तो अगले 15 दिन में सरकार के लिए मुश्किल खड़ी हो सकती है।
कमेटी या ज्ञानेश कुमार का इस्तीफा: सरकार के विकल्प
अगर सरकार इस आंदोलन को लाठी के जोर से दबाने की कोशिश करती है, तो आंदोलन और भड़कसकता है। अमित शाह को दमन चक्र ही आता है—20 जुलाई को पैलेट गन चली और सिवान में AK-47 चली; बच्चे उसे भूले नहीं हैं। लेकिन अगर सरकार जनता की राय और मांग को मान ले, समझौते पर आजाए, तो सरकार पर भार कम हो सकता है और गुस्सा भी कम हो सकता है। सरकार के पास दो विकल्पहैं: एक, कमेटी बनाकर Gen-Z और विपक्षी दलों से बातचीत करना—जैसे पहले नीट पेपर लीक के मामले में नड्डा की कमेटी बनी थी और बातचीत हुई थी, फिर धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा हुआ था। दूसरा, अगर सरकार को लगता है कि Gen-Z बातचीत के लिए तैयार नहीं होगा, तो ज्ञानेश कुमार को कुर्बान करना। अगर सरकार इन दोनों में से कोई विकल्प नहीं चुनती, तो 1 नवंबर को पता चलेगा, जब पिछले कुछ वर्षों की सबसे बड़ी रैली होने जा रही है।
ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग और कमेटी की सार्थकता पर सवाल
विवाद की शुरुआत ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग से होती है। सवाल यह है कि कमेटी बनाकर क्या होगा, जब जेएनजे ज्ञानेश कुमार को एक मिनट भी झेलने को तैयार नहीं है। कमेटी तब बन सकती है जब ज्ञानेश कुमार का इस्तीफा हो जाए। एसआईआर को लेकर भी सवाल है—क्या चुनी हुई सरकारों को बर्खास्त करके राष्ट्रपति शासन लगाकर फिर चुनाव होगा? ज्ञानेश कुमार पद पर बैठे हों और कमेटी बनाई जाए, यह उस तरह की कमेटी होगी जैसे ओसामा बिन लादेन पाकिस्तान में छिपा हो और पाकिस्तान अमेरिका को मूर्ख बना रहा हो। पहले छात्रों के साथ धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर कमेटी बनी थी और जेपी नड्डा के घर तक बात पहुंची थी, लेकिन जब तक धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा नहीं हुआ, मामला शांत नहीं हुआ। अब कमेटी बनाने का कोई मतलब नहीं है; पानी गले तक आ चुका है। अमित शाह ने न्यूज चैनल्स के संपादकों और पत्रकारों के साथ बैठक में साफ इशारा किया था कि चाहे कुछ हो जाए, वे ज्ञानेश कुमार को नहीं हटाएंगे। यानी विकेट नहीं गिरे, मोदी और शाह ज्ञानेश कुमार को नहीं हटाना चाहते और छात्र कमेटी से बात नहीं करना चाहते, तो टकराव बहुत आगे तक जा सकता है; हिंसा भी हो सकती है और चीजें आउट ऑफ कंट्रोल जा सकती हैं।
ज्ञानेश कुमार ही नहीं, मोदी–शाह तक के इस्तीफे की मांग
पिछले एक–डेढ़ महीने में कई सबूत सामने आए हैं। पीलीभीत का सबूत भी सामने आया, जहां 13,100 एपिक नंबरों पर असली वोटर्स के नाम बदल दिये गए और एसआईआर के बाद हेराफेरी हुई। सीमा खन्नाकी भी कलई खुल गई है। अब ज्ञानेश कुमार गुप्ता का रहना स्वीकार्य नहीं है और उनका इस्तीफा मिनिमम है। लेकिन बात अब केवल ज्ञानेश कुमार और सीमा खन्ना तक नहीं रुकेगी; मोदी और अमित शाह को भी इस्तीफा देना होगा। अमित शाह के इस बयान से कि “जनता चाहे तुम्हारे साथ हो, हम तुम्हें क्रश कर देंगे” का मतलब यह है कि जनता को क्रश करने की तैयारी करनी है। हम और बड़ी संख्या में दिल्ली पहुंचेंगे, रामलीला मैदान पहुंचेंगे और देखेंगे कि कैसे क्रश करते हैं। लोकतांत्रिक ढंग से सरकार हटाई जाएगी और रिजीम चेंज भी किया जाएगा।
शंखनाद, वार्म–अप और 1 नवंबर का क्लाइमेक्स
दशहरे के बाद विपक्ष धमाका करने जा रहा था और 23 अक्टूबर का दिन आ गया। किसान यूनियन, मजदूर यूनियन, Gen-Z, विपक्षी पार्टियां और अल्पसंख्यक संगठन—सब देशभर में सड़कों पर हैं। यह ट्रेलर है और शंखनाद है। पुराने युद्धों में दोनों पक्षों की तरफ से शंखनाद होता था; इंडिया गठबंधन ने शंखनाद किया है और अमित शाह ने भी कहा है कि सुरक्षा बल हमारे साथ हैं, इसलिए हम तुम्हें क्रश कर देंगे। इतिहास में जो होता आया है। जैसे फिल्म में इंटरवल के बाद क्लाइमेक्स आता है और विलेन हीरो से पिटता है, वैसे ही अभी शुरुआत हुई है। अगले 15 दिन में सुरक्षा बल सहयोग करने से मना कर देंगे औरजनता का दबाव बढ़ेगा। इस बार दक्षिण के राज्यों का योगदान बहुत ज्यादा होगा; हर प्रदेश से लोगसड़कों पर होंगे—राजनीतिक कार्यकर्ता, सिविल सोसाइटी, किसान और श्रमिक।
23 अक्टूबर को वार्म–अप है। जैसे दो पहलवान पहले एक–दूसरे का बल नापते हैं, वैसे ही शुक्रवार को बल नापा जा रहा है। विपक्ष जनता के आवेश को देखकर बल नाप रहा है और अमित शाह पुलिस वसुरक्षा बलों को देखकर। इसके बाद किसान संगठन, सिविल सोसाइटी, Gen-Z और इंडिया गठबंधन एकजुट होकर सड़क पर उतरेंगे। 1 नवंबर को कम से कम 10 लाख लोग दिल्ली की सड़कों पर हो सकते हैं; सड़कें पट जाएंगी। किसानों के ट्रैक्टर, बच्चों के जेएनजे के कपड़े और नारे देखने को मिलेंगे। यहमहाभारत के बाद अगले 15 दिन में दिखने वाला युद्ध जैसा होगा।
अंतिम सवाल
अंततः बात रिजीम चेंज तक जा सकती है। ज्ञानेश कुमार का इस्तीफा न होना जनता के आक्रोश को और बढ़ाएगा। सरकार जनता की भावना से खेल रही है। अगर धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा नहीं हुआ होता, तोआज देशभर में Gen-Z तूफान खड़ा हो चुका होता। ज्ञानेश कुमार की कुर्बानी देनी ही पड़ेगी, जैसे धर्मेंद्र प्रधान की कुर्बानी दी गई थी; अगर ऐसा नहीं होता, तो इस आंदोलन की आग मोदी के दफ्तर तक जाकर ही खत्म होगी। यानी अगला टारगेट मोदी और अमित शाह हैं। फैसला सरकार के हाथ में है। 1 नवंबर बहुत बड़ी तारीख है, क्योंकि उस दिन आंदोलन का सबसे बड़ा स्वरूप देखने को मिलेगा और 10 लाख से ज्यादा लोग आ सकते हैं। वह निर्णायक दिन होगा।

