लोकतंत्र में नागरिक कटघरे में और सत्ता सवालों से बाहर क्यों?
लोकतंत्र की बुनियाद नागरिक और राज्य के बीच विश्वास पर टिकी होती है। संविधान नागरिक को अधिकार देता है और राज्य को उन अधिकारों की रक्षा करने की जिम्मेदारी सौंपता है। लेकिन जब राज्य अपने नागरिकों को ही संदेह की निगाह से देखने लगे, जब नागरिक को बार-बार अपनी पहचान, अस्तित्व, निष्ठा और पात्रता साबित करने के लिए मजबूर किया जाने लगे, तब यह केवल प्रशासनिक प्रक्रिया का सवाल नहीं रह जाता। यह लोकतंत्र के चरित्र का सवाल बन जाता है।
आज हमारे सामने एक विचित्र विडंबना है। किसी को अपनी नागरिकता साबित करनी है, किसी को मतदाता होने का प्रमाण देना है, किसी को यह बताना है कि वह किसान है, किसी को अपनी पत्रकारिता की विश्वसनीयता सिद्ध करनी है और किसी को अपनी देशभक्ति का प्रमाण देना है। SIR जैसी प्रक्रियाओं में वर्षों से मताधिकार का उपयोग कर रहे नागरिकों को भी अपनी पात्रता के दस्तावेज जुटाने पड़ रहे हैं। दस्तावेजों की अनुपलब्धता, नामों की वर्तनी में अंतर, पारिवारिक विवरणों की विसंगति और प्रशासनिक त्रुटियाँ आम नागरिक के लिए गंभीर परेशानी बन सकती हैं।
सवाल यह नहीं है कि मतदाता सूची का शुद्धिकरण होना चाहिए या नहीं। निश्चित रूप से होना चाहिए। सवाल यह है कि शुद्धिकरण की प्रक्रिया कितनी पारदर्शी, न्यायसंगत और नागरिक-अनुकूल है? किसी पात्र नागरिक का नाम मतदाता सूची से हटने की कीमत केवल एक प्रशासनिक गलती नहीं होती; वह उसके लोकतांत्रिक अधिकार का हनन हो सकता है। इसलिए प्रमाण जुटाने का पूरा बोझ नागरिक पर डाल देना और प्रशासन को अपनी त्रुटियों के प्रति जवाबदेही से मुक्त कर देना न्यायसंगत नहीं हो सकता।
यही स्थिति देशभक्ति और असहमति के सवाल पर भी दिखाई देती है। लोकतंत्र में सरकार की आलोचना करना देश के विरुद्ध जाना नहीं है। किसान अपनी मांगों के लिए आंदोलन करे, छात्र शिक्षा और रोजगार पर सवाल उठाए, पत्रकार सरकार से जवाब माँगे या कोई नागरिक सार्वजनिक नीतियों का विरोध करे—ये लोकतांत्रिक अधिकार हैं, देशद्रोह के प्रमाण नहीं। असहमति को संदेह के घेरे में खड़ा करना लोकतंत्र को कमजोर करता है।
विडंबना यह है कि आम नागरिक से तो हर कदम पर प्रमाण माँगा जाता है, लेकिन सत्ता से जवाबदेही माँगने पर सवाल पूछने वालों को ही कठघरे में खड़ा कर दिया जाता है। चुनावी पारदर्शिता पर सवाल उठाइए तो आपको राजनीतिक चश्मे से देखा जाता है। सरकारी नीतियों की आलोचना कीजिए तो आपको विकास-विरोधी बताया जा सकता है। पत्रकार सवाल पूछे तो उसकी निष्ठा पर प्रश्नचिह्न लगा दिया जाता है।
यहाँ एक बुनियादी प्रश्न उठता है: प्रमाण और जवाबदेही का सिद्धांत केवल नागरिकों पर ही क्यों लागू हो? सत्ता में बैठे लोगों, संवैधानिक संस्थाओं और सरकारी एजेंसियों की जवाबदेही भी उतनी ही अनिवार्य क्यों नहीं है?
यदि नागरिक अपनी नागरिकता का प्रमाण देगा, तो राज्य को भी अपनी प्रक्रियाओं की निष्पक्षता और पारदर्शिता का प्रमाण देना होगा। यदि किसान से उसकी पहचान पूछी जाएगी, तो सरकार को भी अपनी कृषि नीतियों के परिणामों का हिसाब देना होगा। यदि पत्रकार से उसकी विश्वसनीयता का प्रमाण माँगा जाएगा, तो सरकार को भी अपने दावों और सार्वजनिक वक्तव्यों की तथ्यात्मक शुद्धता के प्रति जवाबदेह होना होगा। यदि नागरिक से देश के प्रति निष्ठा की अपेक्षा है, तो सत्ता से संविधान के प्रति निष्ठा की अपेक्षा उससे कहीं अधिक होनी चाहिए।
लोकतंत्र में संवैधानिक पद किसी व्यक्ति को सवालों से ऊपर नहीं उठाते। चुनाव आयोग, प्रवर्तन निदेशालय, पुलिस, प्रशासन और सरकार—सभी संस्थाएँ संविधान और कानून के प्रति जवाबदेह हैं। उनकी विश्वसनीयता आदेशों से नहीं, निष्पक्ष आचरण, पारदर्शिता और सार्वजनिक विश्वास से बनती है।
एक स्वस्थ लोकतंत्र में नागरिक को अपनी गरिमा और अधिकारों के लिए सत्ता के सामने बार-बार सफाई नहीं देनी पड़ती। वहाँ संस्थाएँ नागरिक के अधिकारों की रक्षा के लिए काम करती हैं। सत्ता जनता की मालिक नहीं, जनता के प्रति उत्तरदायी व्यवस्था होती है।
इसलिए आज सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि नागरिक अपनी नागरिकता कैसे साबित करे। असली सवाल यह है कि सत्ता अपने लोकतांत्रिक चरित्र, संवैधानिक निष्ठा और सार्वजनिक जवाबदेही को कैसे साबित करेगी?
याद रखिए, लोकतंत्र में नागरिक की नागरिकता कोई सत्ता की कृपा नहीं है और देशभक्ति का प्रमाणपत्र बाँटने का अधिकार भी किसी सरकार के पास नहीं है। सरकारें आती-जाती हैं, लेकिन संविधान नागरिकों के अधिकारों की स्थायी गारंटी है।
लोकतंत्र की असली परीक्षा यह नहीं कि नागरिक सत्ता के सामने कितना प्रमाण प्रस्तुत कर सकता है, बल्कि यह है कि सत्ता नागरिक के प्रति कितनी जवाबदेह है।

