भारत की राजनीतिक सत्ता और अर्थव्यवस्था पर विदेशी प्रभाव: जवाबदेही किसकी?
राहुल गांधी के आरोप, मोदी सरकार के दावे और देश की आर्थिक एवं राजनीतिक संप्रभुता का सवाल
भारत की संप्रभुता का अर्थ केवल यह नहीं है कि देश की सीमाओं पर किसी विदेशी सेना का कब्जा न हो अथवा शासन का संचालन किसी विदेशी सरकार के हाथ में न हो। वास्तविक संप्रभुता का अर्थ यह भी है कि देश की राजनीतिक सत्ता, आर्थिक नीतियाँ, प्राकृतिक संसाधन, सार्वजनिक संस्थाएँ और सूचना व्यवस्था भारतीय नागरिकों के हितों के अनुरूप संचालित हों, न कि किसी विदेशी शक्ति, बहुराष्ट्रीय कॉरपोरेट समूह या अंतरराष्ट्रीय वित्तीय हितों के दबाव में।
इसी व्यापक संदर्भ में लोकसभा में नेता विपक्ष राहुल गांधी का प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को संबोधित हालिया ट्वीट एक गंभीर राजनीतिक बहस का विषय बन गया है। राजनीतिक हलकों में इसे कोई ‘हाइड्रोजन बम’ तो कोई ‘एटम बम’ बता रहा है। राहुल गांधी ने सीधे आरोप लगाया है कि नरेंद्र मोदी विदेशी मदद से प्रधानमंत्री बने और विदेशी मदद से ही प्रधानमंत्री बने हुए हैं। उन्होंने प्रधानमंत्री की आर्थिक व्यवस्था को विदेशियों के नियंत्रण और समर्थन से जुड़ा बताया तथा विदेशी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों पर भी उन्हें समर्थन मिलने का आरोप लगाया है। इतना ही नहीं, उन्होंने प्रधानमंत्री को इस विषय पर किसी भी मंच पर, किसी भी समय खुली बहस की चुनौती दी है।
यह आरोप असाधारण रूप से गंभीर है। लेकिन इस बहस को केवल राहुल गांधी बनाम नरेंद्र मोदी के राजनीतिक टकराव के रूप में देखना उचित नहीं होगा। असली प्रश्न यह है कि क्या भारत की राजनीतिक सत्ता और आर्थिक व्यवस्था पर विदेशी शक्तियों तथा बहुराष्ट्रीय कॉरपोरेट हितों का प्रभाव बढ़ रहा है? यदि ऐसा है तो उसकी प्रकृति क्या है, उसका लाभ किसे मिल रहा है और इसकी जवाबदेही किसकी है?
प्रधानमंत्री के आरोप और नेता विपक्ष की चुनौती
इस विवाद का एक दूसरा पहलू प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के उस बयान से जुड़ा है, जिसमें उन्होंने कुछ ऐसी ताकतों का उल्लेख किया है जो भारत को कमजोर करने, समाज को विभाजित करने और सोशल मीडिया के माध्यम से अफवाहें फैलाने का प्रयास कर रही हैं। उन्होंने विपक्ष पर भी ऐसी ताकतों के साथ खड़े होने का संकेत दिया है।
यदि प्रधानमंत्री के पास ऐसी गंभीर सूचनाएँ हैं तो देश यह जानना चाहेगा कि वे ताकतें कौन हैं? क्या वे विदेशी सरकारें हैं, अंतरराष्ट्रीय संगठन हैं, वित्तीय समूह हैं, डिजिटल कंपनियाँ हैं या कोई संगठित राजनीतिक नेटवर्क?
भारत के पास रॉ, इंटेलिजेंस ब्यूरो और विभिन्न राज्यों की खुफिया एजेंसियों का व्यापक तंत्र है। राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मामलों में सरकार के पास सूचनाएँ जुटाने और उनकी जाँच करने की संस्थागत क्षमता भी है। ऐसी स्थिति में केवल अस्पष्ट संकेत देकर विपक्ष को संदेह के घेरे में खड़ा करना पर्याप्त नहीं है।
राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर प्रत्येक गोपनीय सूचना सार्वजनिक करना संभव नहीं होता, लेकिन संसद की संबंधित समितियों और सक्षम संस्थाओं के सामने प्रमाण प्रस्तुत किए जा सकते हैं। प्रधानमंत्री को स्पष्ट करना चाहिए कि जिन विदेशी शक्तियों के हस्तक्षेप की बात की जा रही है, उनके विरुद्ध सरकार ने क्या ठोस कार्रवाई की है।
लोकतंत्र में सरकार का दायित्व केवल खतरे की चेतावनी देना नहीं, बल्कि नागरिकों को यह विश्वास दिलाना भी है कि वह उन खतरों से निपटने में सक्षम और जवाबदेह है।
इजराइल यात्रा और अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक संपर्क
नरेंद्र मोदी के गुजरात के मुख्यमंत्री रहने के दौरान इजराइल यात्रा का संदर्भ भी इस बहस में सामने आया है। मई 2006 में तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी केंद्रीय कृषि मंत्री शरद पवार के नेतृत्व वाले भारतीय प्रतिनिधिमंडल के साथ इजराइल में आयोजित Agritech-2006 से जुड़े कार्यक्रमों में शामिल हुए थे। इस यात्रा का घोषित उद्देश्य आधुनिक कृषि तकनीक, जल प्रबंधन और कृषि क्षेत्र में भारत-इजराइल सहयोग की संभावनाओं का अध्ययन करना था। समकालीन समाचार रिपोर्टों में इस यात्रा के लिए पाँच दिवसीय कार्यक्रम का उल्लेख मिलता है। <Cite refs={[“turn694703search0”,“
इजराइल कृषि तकनीक, सिंचाई और जल संरक्षण के क्षेत्र में महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ रखता है। इसलिए ऐसी यात्रा और तकनीकी सहयोग को अपने आप में संदेहास्पद नहीं माना जा सकता।
लेकिन अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक संपर्कों का अध्ययन करते समय एक व्यापक प्रश्न भी प्रासंगिक है। किसी राजनीतिक व्यक्ति के विदेशी संपर्कों का स्वरूप क्या है? उनसे किस प्रकार के संस्थागत और व्यावसायिक संबंध विकसित हुए? क्या इन संबंधों का कोई राजनीतिक या नीतिगत प्रभाव पड़ा?
इन प्रश्नों का उत्तर यात्रा के आयोजन या विदेशी नेताओं से मुलाकात मात्र से नहीं निकाला जा सकता। इसके लिए दस्तावेजों और उसके बाद विकसित हुए संबंधों का अध्ययन आवश्यक है।
APCO Worldwide: गुजरात की ब्रांडिंग या राजनीतिक छवि निर्माण?
नरेंद्र मोदी के गुजरात के मुख्यमंत्री रहने के दौरान विदेशी जनसंपर्क और लॉबिंग कंपनियों के साथ उनके संबंधों का संदर्भ विशेष रूप से उल्लेखनीय है।
अमेरिकी कंपनी APCO Worldwide को गुजरात की ‘वाइब्रेंट गुजरात’ पहल के अंतरराष्ट्रीय प्रचार और निवेश आकर्षित करने के लिए नियुक्त किया गया था। वर्ष 2009 में इस कंपनी का चयन अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धी बोली प्रक्रिया के माध्यम से हुआ था। उस समय की मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, APCO ने अन्य जनसंपर्क कंपनियों को पीछे छोड़कर यह काम हासिल किया था। गुजरात सरकार के तत्कालीन अधिकारियों ने भी इसके चयन में अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धी बोली की पुष्टि की थी। <Cite refs={[“turn694703search1”,“
यहाँ एक महत्वपूर्ण तथ्य स्पष्ट रहना चाहिए। किसी राज्य सरकार द्वारा विदेशी जनसंपर्क कंपनी की सेवाएँ लेना अपने आप में गैरकानूनी या राष्ट्रविरोधी गतिविधि नहीं है। दुनिया की अनेक सरकारें निवेश आकर्षित करने और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी छवि प्रस्तुत करने के लिए ऐसी कंपनियों की सेवाएँ लेती हैं।
लेकिन प्रश्न तब पैदा होता है जब सामान्य प्रचार और राजनीतिक छवि निर्माण के बीच की सीमा अस्पष्ट हो जाती है।
APCO के कार्यक्षेत्र में गुजरात को अंतरराष्ट्रीय निवेश गंतव्य के रूप में स्थापित करना, विदेशी निवेशकों और संस्थानों से संपर्क विकसित करना तथा वैश्विक स्तर पर गुजरात की ब्रांडिंग करना शामिल था। कंपनी को गुजरात सरकार द्वारा भुगतान और उसके कार्यादेश से संबंधित विवरण भी उस समय की मीडिया रिपोर्टों में सामने आए थे। <Cite refs={[“turn694703search1”,“
इसलिए सवाल यह नहीं कि APCO को नियुक्त क्यों किया गया, बल्कि यह है कि उसके कार्य का वास्तविक दायरा क्या था?
क्या कंपनी की भूमिका केवल गुजरात में निवेश आकर्षित करने तक सीमित थी? क्या उसने नरेंद्र मोदी की व्यक्तिगत राजनीतिक छवि को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्थापित करने में भी भूमिका निभाई? उसके काम का मूल्यांकन किस आधार पर हुआ और सरकार को उससे क्या परिणाम प्राप्त हुए?
APCO ने 2013 में स्पष्ट किया था कि उसका अनुबंध गुजरात सरकार के साथ था, नरेंद्र मोदी के साथ व्यक्तिगत रूप से नहीं, और उसका काम मार्च 2013 में समाप्त हो गया था। <Cite refs={[“turn694703search4”]}/>
इन तथ्यों को ध्यान में रखते हुए किसी गुप्त विदेशी राजनीतिक नियंत्रण का निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा। लेकिन विदेशी PR कंपनियों, राजनीतिक छवि निर्माण और सरकारी प्रचार के बीच संबंधों में पारदर्शिता की माँग पूरी तरह जायज है।
1993 का American Council of Young Political Leaders कार्यक्रम
नरेंद्र मोदी की वर्ष 1993 की अमेरिका यात्रा भी इस बहस में चर्चा का विषय बनी है।
उपलब्ध विवरणों के अनुसार, 10 से 23 जुलाई 1993 के दौरान वे American Council of Young Political Leaders (ACYPL) के एक विनिमय कार्यक्रम के अंतर्गत अमेरिका गए थे। उस समय वे भाजपा के संगठनात्मक कार्यों में सक्रिय थे। इस कार्यक्रम के माध्यम से उन्हें अमेरिकी राजनीतिक नेताओं, अधिकारियों, नीति-निर्माताओं और अन्य संस्थागत प्रतिनिधियों से संवाद का अवसर मिला था। <Cite refs={[“turn694703search7”]}/>
ऐसे कार्यक्रमों का घोषित उद्देश्य विभिन्न देशों के युवा राजनीतिक प्रतिनिधियों के बीच संवाद, अनुभवों का आदान-प्रदान और दीर्घकालीन संबंध विकसित करना होता है।
अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक नेतृत्व कार्यक्रमों में भाग लेना किसी विदेशी शक्ति के नियंत्रण में होने का प्रमाण नहीं है। फिर भी यह जानना प्रासंगिक है कि प्रतिभागियों का चयन किस आधार पर होता है, कार्यक्रम का वित्तपोषण कौन करता है, किन संस्थाओं से संपर्क स्थापित किए जाते हैं और भविष्य में इन संपर्कों का क्या स्वरूप बनता है।
ACYPL की आधिकारिक Alumni सूची में नरेंद्र मोदी का नाम होने और 1993 के विशिष्ट प्रतिनिधिमंडल की पूरी आधिकारिक सूची सार्वजनिक रूप से उपलब्ध होने में अंतर है। इसलिए उस समय के सभी प्रतिभागियों के नामों को प्रमाणित सूची के रूप में प्रस्तुत करना उचित नहीं होगा।
इस कार्यक्रम में शामिल रहे भारतीय प्रतिनिधियों के अनुभव और कार्यक्रम के स्वरूप पर सार्वजनिक जानकारी उपलब्ध होना पारदर्शिता के हित में है।
विदेशी प्रभाव का सबसे बड़ा माध्यम: आर्थिक निर्भरता
भारत की संप्रभुता पर विदेशी प्रभाव का प्रश्न केवल किसी नेता की विदेश यात्रा या विदेशी कंपनी के साथ व्यावसायिक संबंधों तक सीमित नहीं है। इसका सबसे गंभीर पक्ष हमारी आर्थिक व्यवस्था में दिखाई देता है।
पिछले कुछ दशकों में भारत ने वैश्विक अर्थव्यवस्था के साथ अपने संबंधों का विस्तार किया है। विदेशी निवेश, तकनीक, अंतरराष्ट्रीय व्यापार और पूँजी का प्रवाह आर्थिक विकास में योगदान दे सकता है। लेकिन जब आर्थिक नीतियाँ सार्वजनिक हित के बजाय बड़े कॉरपोरेट समूहों और वित्तीय पूँजी के हितों के अनुरूप बनने लगें, तब यह गंभीर चिंता का विषय बन जाता है।
शिक्षा, स्वास्थ्य, बीमा, बैंकिंग, डिजिटल सेवाओं और बुनियादी ढाँचे जैसे क्षेत्रों में निजी तथा विदेशी पूँजी की बढ़ती भूमिका का मूल्यांकन इसी कसौटी पर होना चाहिए।
इसका एक उदाहरण जुलाई 2026 में सामने आया गुरुग्राम के Pathways School से जुड़ा लगभग 1,500 करोड़ रुपये का संभावित अधिग्रहण है। KKR समर्थित Lighthouse Learning द्वारा इस स्कूल के अधिग्रहण की प्रक्रिया की खबर प्रमुख व्यावसायिक समाचार माध्यमों में प्रकाशित हुई। यह सौदा भारतीय स्कूल शिक्षा क्षेत्र के बड़े कॉरपोरेट लेन-देन में से एक माना जा रहा है। <Cite refs={[“turn694703search8”,“
यहाँ ध्यान देने योग्य बात यह है कि यह रिपोर्टेड व्यावसायिक सौदा है, न कि सरकार द्वारा सार्वजनिक की गई कोई बिक्री विलेख या पूर्ण अधिग्रहण की कानूनी घोषणा।
एक तरफ सरकारी विद्यालयों की संख्या, उनकी गुणवत्ता और संसाधनों को लेकर गंभीर चिंताएँ हैं, दूसरी तरफ निजी शिक्षा का बाजार लगातार महँगा होता जा रहा है। शिक्षा जैसे बुनियादी सामाजिक अधिकार का क्षेत्र भी बड़े निवेश और कॉरपोरेट कारोबार का हिस्सा बनता जा रहा है।
स्वास्थ्य और बीमा के क्षेत्र में भी यही प्रवृत्ति दिखाई देती है। यदि नागरिकों की बुनियादी आवश्यकताएँ धीरे-धीरे महँगी निजी सेवाओं पर निर्भर होती जाएँ तो आर्थिक विकास के आंकड़ों का आम नागरिक के जीवन से संबंध कमजोर पड़ जाता है।
प्रश्न विदेशी निवेश का विरोध करने का नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करने का है कि निवेश की शर्तें, मुनाफे का वितरण, तकनीकी नियंत्रण और सार्वजनिक जवाबदेही भारतीय नागरिकों के हितों के अनुरूप हों।
डिजिटल संप्रभुता: हमारी सूचना व्यवस्था किसके नियंत्रण में है?
आज डिजिटल प्लेटफॉर्म केवल संचार के साधन नहीं रह गए हैं। वे जनमत निर्माण, राजनीतिक प्रचार, विज्ञापन, सूचना के प्रसार और नागरिकों के व्यवहार को प्रभावित करने वाले शक्तिशाली माध्यम बन चुके हैं।
Google, YouTube, Facebook, Instagram, WhatsApp और Apple जैसे प्लेटफॉर्म विदेशी कंपनियों से जुड़े हैं। भारत में करोड़ों नागरिक इन माध्यमों का इस्तेमाल करते हैं। राजनीतिक दल भी अपने प्रचार और जनसंपर्क के लिए इन पर निर्भर हैं।
इन कंपनियों के एल्गोरिदम यह निर्धारित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं कि किस व्यक्ति तक कौन-सी सूचना पहुँचेगी, कौन-सी सामग्री अधिक लोगों को दिखाई देगी और किस प्रकार का विज्ञापन किस वर्ग के सामने प्रस्तुत होगा।
यही वह क्षेत्र है जहाँ लोकतंत्र के सामने एक नया प्रश्न खड़ा होता है। यदि किसी डिजिटल प्लेटफॉर्म के एल्गोरिदम में अपारदर्शिता है, राजनीतिक विज्ञापन के स्रोत स्पष्ट नहीं हैं और किसी सामग्री को बढ़ावा देने अथवा सीमित करने के निर्णय सार्वजनिक जाँच से बाहर हैं, तो नागरिकों के सूचना-अधिकार और निष्पक्ष राजनीतिक प्रतिस्पर्धा दोनों प्रभावित हो सकते हैं।
हालाँकि यह कहना तथ्यात्मक रूप से उचित नहीं होगा कि विदेशी सोशल मीडिया कंपनियाँ किसी एक राजनीतिक दल का समर्थन करती हैं। इसके लिए विज्ञापन, एल्गोरिदम, सामग्री के वितरण और कंपनी के निर्णयों से जुड़े ठोस प्रमाण आवश्यक हैं।
UPI के संदर्भ में भी स्पष्टता जरूरी है। UPI भारत की NPCI द्वारा संचालित भुगतान व्यवस्था है। Google Pay और PhonePe जैसे ऐप विदेशी कंपनियों से जुड़े होने के बावजूद भारतीय UPI व्यवस्था के अंतर्गत काम करते हैं। इसलिए ऐप की विदेशी हिस्सेदारी और भुगतान प्रणाली के विदेशी नियंत्रण को एक जैसा नहीं माना जा सकता।
फिर भी डेटा का स्वामित्व, नागरिकों की डिजिटल निजता, विदेशी सर्वरों पर निर्भरता और तकनीकी बुनियादी ढाँचे की सुरक्षा ऐसे मुद्दे हैं जिन पर सरकार को स्पष्ट नीति बनानी चाहिए।
डिजिटल संप्रभुता का अर्थ इंटरनेट को बंद करना या विदेशी तकनीक को बाहर करना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि भारत की सूचना व्यवस्था किसी निजी कंपनी की अपारदर्शी व्यावसायिक प्राथमिकताओं की बंधक न बने।
विदेशी पूँजी और राजनीतिक सत्ता का गठजोड़
आर्थिक शक्ति का राजनीतिक प्रभाव से संबंध कोई नई बात नहीं है। दुनिया के अनेक लोकतंत्रों में कॉरपोरेट समूह, वित्तीय संस्थाएँ, लॉबिंग नेटवर्क और बड़े विज्ञापन उद्योग नीतिगत निर्णयों को प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं।
भारत भी इससे अछूता नहीं है।
जब बड़े उद्योग समूहों को सरकारी नीतियों, प्राकृतिक संसाधनों, सार्वजनिक संपत्तियों, ठेकों और वित्तीय संस्थाओं तक विशेष पहुँच मिलती है, तब यह देखना आवश्यक हो जाता है कि निर्णयों का आधार सार्वजनिक हित है या निजी लाभ।
यहाँ विदेशी और घरेलू पूँजी के बीच अंतर से अधिक महत्वपूर्ण सवाल पूँजी के राजनीतिक प्रभाव और जवाबदेही का है।
यदि किसी विदेशी वित्तीय समूह का भारतीय कंपनियों में बड़ा निवेश है, यदि कोई बहुराष्ट्रीय कंपनी भारत के डिजिटल बाजार में निर्णायक भूमिका निभाती है अथवा कोई अंतरराष्ट्रीय लॉबिंग नेटवर्क सरकारी नीतियों को प्रभावित करने का प्रयास करता है, तो इन संबंधों में पारदर्शिता होनी चाहिए।
लेकिन किसी कंपनी के विदेशी निवेशक होने मात्र से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि वह भारत की सरकार को नियंत्रित करती है। वास्तविक प्रश्न यह है कि क्या उसके आर्थिक हितों को सार्वजनिक हित से ऊपर रखा जा रहा है और क्या इसके प्रमाण उपलब्ध हैं?
इसी प्रकार घरेलू कॉरपोरेट समूहों के राजनीतिक और आर्थिक प्रभाव की भी निष्पक्ष समीक्षा होनी चाहिए। लोकतंत्र में किसी भी निजी समूह को सार्वजनिक नीतियों पर अनुचित प्रभाव डालने का अधिकार नहीं दिया जा सकता।
संसद ही होनी चाहिए इस बहस का वास्तविक मंच
राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री को खुली बहस की चुनौती दी है। प्रधानमंत्री और नेता विपक्ष के बीच सार्वजनिक बहस लोकतांत्रिक संस्कृति को मजबूत कर सकती है। लेकिन इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण मंच संसद है।
प्रधानमंत्री को संसद में स्पष्ट करना चाहिए कि वे किन विदेशी शक्तियों द्वारा भारत को विभाजित करने की साजिश का आरोप लगा रहे हैं। उनके पास क्या प्रमाण हैं और सरकार ने क्या कार्रवाई की है?
दूसरी तरफ राहुल गांधी को भी अपने आरोपों के आधार और कथित दस्तावेजों को सामने रखना चाहिए। यदि उनके पास विदेशी राजनीतिक हस्तक्षेप, वित्तीय सहायता या डिजिटल प्रचार नेटवर्क से जुड़े प्रमाण हैं तो उन्हें सार्वजनिक जाँच के योग्य मंच पर प्रस्तुत करना चाहिए।
संसद केवल सरकार की उपलब्धियों का प्रचार करने या विपक्ष के आरोपों को खारिज करने का मंच नहीं है। उसका मूल उद्देश्य सत्ता से प्रश्न पूछना, नीतियों की समीक्षा करना और नागरिकों के हितों की रक्षा करना है।
विदेशी हस्तक्षेप जैसा गंभीर मुद्दा ट्वीट, प्रेस कॉन्फ्रेंस और राजनीतिक भाषणों तक सीमित नहीं रहना चाहिए।
इसके लिए संसद की उपयुक्त समितियों द्वारा निष्पक्ष समीक्षा, राजनीतिक वित्तपोषण की पारदर्शिता, डिजिटल विज्ञापन और एल्गोरिदम का नियमन तथा विदेशी लॉबिंग गतिविधियों की जाँच जैसे कदम आवश्यक हैं।
निष्कर्ष: संप्रभुता का वास्तविक अर्थ नागरिकों की सत्ता
राहुल गांधी का ट्वीट एक गंभीर राजनीतिक आरोप है, अभी कोई प्रमाणित खुलासा नहीं। इसी प्रकार प्रधानमंत्री द्वारा विदेशी शक्तियों की साजिश का उल्लेख भी तब तक अधूरा है जब तक उसके समर्थन में तथ्य और जवाबदेही सामने न आए।
इस पूरे विवाद में किसी एक नेता को सही और दूसरे को गलत साबित करना हमारा उद्देश्य नहीं होना चाहिए। असली सवाल भारत की राजनीतिक और आर्थिक व्यवस्था की स्वतंत्रता का है।
क्या हमारी आर्थिक नीतियाँ नागरिकों की आवश्यकताओं से तय होती हैं या बड़े पूँजीगत हितों से? क्या हमारी सूचना व्यवस्था पारदर्शी और जवाबदेह है? क्या राजनीतिक दलों के वित्तीय स्रोतों और अंतरराष्ट्रीय संपर्कों की पर्याप्त जानकारी सार्वजनिक है? क्या सरकार विदेशी हस्तक्षेप के आरोपों की निष्पक्ष जाँच कराने को तैयार है?
इन प्रश्नों का उत्तर सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों को देना होगा।
भारत की संप्रभुता केवल राष्ट्रीय ध्वज, सीमा, सेना और राष्ट्रगान तक सीमित नहीं हो सकती। उसकी वास्तविक कसौटी यह है कि देश के संसाधनों, अर्थव्यवस्था, नीतियों और लोकतांत्रिक संस्थाओं पर अंतिम अधिकार किसका है।
यदि निर्णय कुछ शक्तिशाली कॉरपोरेट समूहों, वित्तीय हितों और अपारदर्शी अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क के प्रभाव में लिए जाते हैं, तो लोकतंत्र का औपचारिक ढाँचा बने रहने के बावजूद नागरिकों की वास्तविक भागीदारी कमजोर होती जाएगी।
और यदि विदेशी हस्तक्षेप के आरोप केवल राजनीतिक विरोधियों को बदनाम करने का माध्यम बनते हैं, तो राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे गंभीर विषय का भी राजनीतिक दुरुपयोग होगा।
इसलिए देश को न तो विदेशी पूँजी के प्रति अंधविरोध की जरूरत है और न ही विदेशी निवेश तथा तकनीक के प्रति अंधसमर्थन की। आवश्यकता है पारदर्शिता, स्वतंत्र जाँच, मजबूत सार्वजनिक संस्थाओं और नागरिक हितों को सर्वोच्च प्राथमिकता देने वाली आर्थिक एवं राजनीतिक व्यवस्था की।
सत्ता पक्ष से हमारा सवाल है कि यदि विदेशी ताकतें भारत की राजनीति और सामाजिक व्यवस्था को प्रभावित कर रही हैं तो उनके विरुद्ध कार्रवाई के प्रमाण कहाँ हैं? विपक्ष से हमारा सवाल है कि यदि उसके पास विदेशी हस्तक्षेप के प्रमाण हैं तो उन्हें सार्वजनिक क्यों नहीं किया जा रहा है?
आखिरकार, भारत किसी राजनीतिक दल, प्रधानमंत्री, विपक्षी नेता या कॉरपोरेट समूह की निजी संपत्ति नहीं है। इस देश की संप्रभुता उसके नागरिकों में निहित है।
लोकतंत्र में विदेशी हस्तक्षेप से मुक्ति जितनी जरूरी है, उतनी ही जरूरी घरेलू सत्ता और पूँजी के अपारदर्शी गठजोड़ से मुक्ति भी है। क्योंकि संप्रभुता का वास्तविक अर्थ है—देश के संसाधनों और निर्णयों पर नागरिकों का अधिकार, न कि किसी भी देशी या विदेशी शक्तिशाली समूह का नियंत्रण।
संदर्भ एवं उपयोगी स्रोत
- OneIndia/UNI — मोदी की 2006 इजराइल यात्रा और Agritech-2006
- India Today — APCO की नियुक्ति और अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धी बोली पर सरकारी अधिकारी का बयान
- Times of India — APCO को Vibrant Gujarat के प्रचार का काम
- Economic Times — APCO और गुजरात सरकार के संबंध
- ACYPL कार्यक्रम के ऐतिहासिक संदर्भ
- Times of India — KKR समर्थित Lighthouse Learning और Pathways School का लगभग ₹1,500 करोड़ का सौदा

