मताधिकार पर मनमानी को न्यायिक चुनौती
निर्वाचन आयोग की मनमानी पर हाईकोर्ट का प्रहार
मतदाता के अधिकार पर निर्वाचन आयोग की मनमानी को न्यायपालिका का करारा जवाब: गोवा हाईकोर्ट का फैसला लोकतंत्र के लिए उम्मीद की नई किरण
लोकतंत्र में निर्वाचन आयोग की सबसे बड़ी जिम्मेदारी केवल चुनाव कराना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि प्रत्येक पात्र नागरिक को बिना किसी बाधा के मताधिकार प्राप्त हो। लेकिन जब मतदाता सूची को शुद्ध करने की प्रक्रिया ही पात्र नागरिकों को उनके संवैधानिक अधिकार से वंचित करने का माध्यम बनने लगे, तब सवाल केवल प्रशासनिक लापरवाही का नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था की विश्वसनीयता का हो जाता है। गोवा में बॉम्बे हाईकोर्ट की खंडपीठ ने 5 नवंबर 2026 को ऐसा ही एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाकर निर्वाचन आयोग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। ये मतदाता सूची विवाद एवं मताधिकार पर मनमानी को न्यायिक चुनौती है।
मामला गोवा के सांताक्रूज विधानसभा क्षेत्र के निवासी परेश सालगांवकर और उनके परिवार के पांच अन्य सदस्यों का है। यह परिवार 1995 से मतदाता के रूप में पंजीकृत था। कई वर्ष पहले परिवार ने उसी विधानसभा क्षेत्र के भीतर अपना आवास बदल लिया था। नियमानुसार उन्होंने पता बदलने के लिए Form 8 जमा किया। बूथ लेवल ऑफिसर ने भी उन्हें यही प्रक्रिया अपनाने की सलाह दी थी।
लेकिन SIR के दौरान उनके नाम मतदाता सूची से गायब हो गए। जब परिवार ने अपने नाम बहाल करने के लिए Form 8 के माध्यम से आवेदन किया तो निर्वाचन अधिकारियों ने तकनीकी व्यवस्था का हवाला देकर उसे स्वीकार करने से इनकार कर दिया। उन्हें Form 6 भरने के लिए कहा गया, जो पहली बार मतदाता सूची में नाम दर्ज कराने वाले नए मतदाताओं के लिए निर्धारित है।
यहां एक गंभीर कानूनी और नैतिक प्रश्न खड़ा हुआ। जो व्यक्ति 1995 से मतदान करता आ रहा है, वह यह घोषणा कैसे करे कि वह पहली बार मतदाता बन रहा है और पहले किसी निर्वाचन क्षेत्र की मतदाता सूची में उसका नाम नहीं था? ऐसा करना तो उससे गलत घोषणा करवाना होता। परिवार ने गलत घोषणा करने से इनकार कर दिया और न्यायालय का दरवाजा खटखटाया।
तकनीकी सॉफ्टवेयर नागरिक के अधिकार से बड़ा नहीं हो सकता
इस मामले का सबसे चिंताजनक पहलू निर्वाचन आयोग की तकनीकी व्यवस्था ERONET से जुड़ा था। अधिकारियों के अनुसार, SIR के बाद संबंधित मतदाताओं का रिकॉर्ड सिस्टम में उपलब्ध नहीं था और Form 8 पर कार्रवाई करने के बजाय उसे अस्वीकार करने का विकल्प ही दिखाई दे रहा था।
अर्थात सॉफ्टवेयर में विकल्प नहीं था, इसलिए नागरिक का वैधानिक अधिकार भी समाप्त मान लिया गया!
क्या किसी लोकतांत्रिक देश में तकनीकी व्यवस्था कानून से ऊपर हो सकती है? क्या किसी अधिकारी को केवल इसलिए नागरिक के आवेदन को अस्वीकार करने का अधिकार मिल जाता है कि सरकारी पोर्टल में उसे स्वीकार करने का विकल्प उपलब्ध नहीं है?
बॉम्बे हाईकोर्ट की गोवा खंडपीठ ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया। न्यायमूर्ति वाल्मीकि मेनेज़ेस और न्यायमूर्ति अमित एस. जामसंदेकर ने स्पष्ट किया कि SIR की प्रक्रिया के दौरान भी Representation of the People Act, 1950 की धारा 22 तथा Registration of Electors Rules, 1960 के नियम 13 के अंतर्गत Form 8 से संबंधित वैधानिक प्रावधान निलंबित नहीं हो जाते।
अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि किसी मतदाता का नाम हटाने अथवा उसके आवेदन को अस्वीकार करने से पहले कानून के अनुसार सुनवाई का उचित अवसर देना आवश्यक है। केवल सॉफ्टवेयर की तकनीकी सीमा के आधार पर नागरिक का अधिकार छीना नहीं जा सकता।
सर्वोच्च न्यायालय में लंबित मामला न्यायिक जवाबदेही से बचने का बहाना नहीं
निर्वाचन आयोग ने सुनवाई टालने के लिए सर्वोच्च न्यायालय में SIR से संबंधित लंबित मामलों का हवाला दिया। लेकिन हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि उसके सामने विचाराधीन मामला पूरे SIR की वैधता को चुनौती देने का नहीं, बल्कि Form 8 के आवेदन को अस्वीकार करने का था। इसलिए दोनों मामलों को एक जैसा मानकर इस याचिका की सुनवाई टालने का कोई औचित्य नहीं है।
5 नवंबर को फैसला सुनाते हुए अदालत ने याचिका स्वीकार कर ली और संबंधित निर्वाचन अधिकारी को निवास सत्यापन के बाद दस दिनों के भीतर सभी छह याचिकाकर्ताओं के नाम मतदाता सूची में शामिल करने का निर्देश दिया।
निर्वाचन आयोग ने इस आदेश को दो सप्ताह तक स्थगित रखने की मांग की, ताकि वह सर्वोच्च न्यायालय में अपील कर सके। लेकिन अदालत ने रोक लगाने से इनकार कर दिया। उसका स्पष्ट रुख था कि मतदाताओं के नाम सूची में शामिल करने के आदेश पर रोक लगाने का औचित्य नहीं है। आयोग चाहे तो सर्वोच्च न्यायालय जा सकता है।
यह फैसला केवल छह नागरिकों को राहत देने का मामला नहीं है। यह उस सिद्धांत की पुनर्स्थापना है कि निर्वाचन प्रक्रिया में प्रशासनिक सुविधा, तकनीकी सॉफ्टवेयर और आयोग के निर्देश कानून तथा नागरिक के अधिकारों से ऊपर नहीं हो सकते।
SIR की विश्वसनीयता का प्रश्न अब और गंभीर हो गया है
इस फैसले से निर्वाचन आयोग की SIR प्रक्रिया के सामने एक बुनियादी सवाल खड़ा होता है। यदि किसी नागरिक का नाम मतदाता सूची से हटाने के बाद उसे अपने पुराने मतदाता होने के बावजूद नए मतदाता के रूप में आवेदन करने के लिए बाध्य किया जाता है, तो यह प्रक्रिया कितनी न्यायसंगत है?
SIR का घोषित उद्देश्य मतदाता सूची को शुद्ध करना है, न कि पात्र मतदाताओं को सूची से बाहर करना। किसी नागरिक का स्थान परिवर्तन, प्रशासनिक रिकॉर्ड की त्रुटि अथवा तकनीकी समस्या उसके मताधिकार को समाप्त करने का आधार नहीं बन सकती।
यह भी ध्यान रखना होगा कि गोवा हाईकोर्ट का फैसला पूरे देश में SIR की संवैधानिक वैधता पर अंतिम निर्णय नहीं है। लेकिन इसने एक महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांत स्थापित किया है कि SIR के नाम पर मौजूदा वैधानिक अधिकारों और प्रक्रियाओं को मनमाने ढंग से निष्प्रभावी नहीं किया जा सकता।
यह फैसला सर्वोच्च न्यायालय के लिए भी एक महत्वपूर्ण विचारणीय प्रश्न प्रस्तुत करता है। जब नागरिकों के मताधिकार से जुड़े विवाद सामने आते हैं, तब उन्हें केवल दूसरे मंचों पर भेज देना पर्याप्त नहीं है। न्यायिक प्रक्रिया का उद्देश्य नागरिक को वास्तविक और समयबद्ध राहत उपलब्ध कराना भी है। मतदाता सूची से बाहर हुआ व्यक्ति यदि वर्षों तक अपने अधिकार की बहाली के लिए कार्यालयों और अदालतों के चक्कर लगाता रहे, तो चुनाव के बाद मिलने वाला न्याय उसके लिए कितना सार्थक रह जाएगा?
निर्वाचन आयोग की जवाबदेही लोकतंत्र की बुनियादी शर्त है
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और निर्वाचन आयोग की कार्यप्रणाली पर उठ रहे सवालों को किसी राजनीतिक दल के समर्थन या विरोध की दृष्टि से नहीं देखा जाना चाहिए। चुनाव आयोग किसी सरकार, सत्तारूढ़ दल अथवा राजनीतिक नेतृत्व की सुविधा के लिए नहीं, बल्कि संविधान और नागरिकों के लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा के लिए है।
लोकतंत्र में नागरिकों के अधिकारों और सत्ता की जवाबदेही के इसी बुनियादी प्रश्न पर हमारा पूर्व संपादकीय ‘लोकतंत्र में नागरिक कटघरे में और सत्ता सवालों से बाहर क्यों?’ भी महत्वपूर्ण विमर्श प्रस्तुत करता है।
निर्वाचन आयोग की निष्पक्षता केवल उसके वक्तव्यों से नहीं, बल्कि उसके निर्णयों, प्रक्रियाओं और नागरिकों के प्रति उसके व्यवहार से प्रमाणित होनी चाहिए। यदि उसकी किसी प्रक्रिया में त्रुटि है तो उसे स्वीकार करना, सुधारना और प्रभावित नागरिकों को राहत देना उसकी जिम्मेदारी है।
गोवा हाईकोर्ट ने यही संदेश दिया है कि कानून के शासन में किसी संस्था की प्रशासनिक शक्ति असीमित नहीं होती। निर्वाचन आयोग भी न्यायिक समीक्षा से परे नहीं है और उसका सॉफ्टवेयर संविधान तथा कानून का विकल्प नहीं बन सकता।
आखिर लोकतंत्र में मतदाता आयोग की सुविधा के लिए नहीं होता, आयोग मतदाता के अधिकारों की रक्षा के लिए होता है।

