गोभी मुसल्लम : इतिहास से इतनी नफरत भी अच्छी नहीं कि उसकी रेसिपी तक बदल डालो!

शीर्षक में ‘गोभी मुसल्लम’ के साथ ‘इतिहास की चयनात्मक स्वीकार्यता’ का भाव बहुत प्रभावशाली रहेगा। इस लेख की सबसे बड़ी ताकत यही है कि यह शाकाहार का विरोध नहीं करता, बल्कि खानपान के बहाने सांस्कृतिक पाखंड और इतिहास के राजनीतिक इस्तेमाल पर चोट करता है।

कुछ दिनों पहले स्विट्जरलैंड के राष्ट्रपति भारत आए। प्रधानमंत्री ने उनका स्वागत किया, दावत दी और मेहमाननवाजी के लिए गोभी मुसल्लम परोसा। अब इसमें कोई आपत्ति नहीं कि किसी विदेशी मेहमान को शाकाहारी भोजन कराया जाए। भारत में शाकाहारी भोजन की समृद्ध परंपरा है और हमारी पाककला में ऐसी अनगिनत चीजें हैं जिन पर गर्व किया जा सकता है। लेकिन सवाल भोजन के शाकाहारी या मांसाहारी होने का नहीं, बल्कि उसके नाम और उसके पीछे छिपे इतिहास का है।

भाई साहब, कभी मुर्ग मुसल्लम का नाम सुना है?

मुर्ग मुसल्लम कोई साधारण चिकन करी नहीं होती। इसमें पूरे मुर्गे को खास मसालों में मैरिनेट किया जाता है। कई पारंपरिक विधियों में उसके भीतर अंडे और कीमा भरा जाता है। फिर उसे धीमी आंच पर इस तरह पकाया जाता है कि मसालों का स्वाद मांस के भीतर तक उतर जाए और वह पूरी तरह नरम, रसीला और लाजवाब हो जाए। इसी तरह रान मुसल्लम भी भारतीय उपमहाद्वीप की मशहूर शाही मांसाहारी पाक परंपरा का हिस्सा है।

अब जरा बताइए, एक पूरी गोभी को मसाले लगाकर ओवन में भून देने से वह मुसल्लम कैसे हो गई? वह रोस्टेड कॉलीफ्लावर है भाई! उसे रोस्टेड कॉलीफ्लावर कहने में आखिर शर्म किस बात की है? गोभी को मुसल्लम बनाने के लिए मुर्ग मुसल्लम की ऐतिहासिक पहचान ही उधार क्यों लेनी पड़ रही है?

और यह कोई अकेला उदाहरण नहीं है। पनीर टिक्का, कटहल बिरयानी, सोया चाप, वेज दम बिरयानी, गोभी मुसल्लम और न जाने क्या-क्या! शाकाहारी व्यंजनों के अपने स्वतंत्र नाम, अपनी पहचान और अपनी शानदार पाक परंपरा है। लेकिन जब किसी व्यंजन को विशेष रूप से शाही, विशिष्ट और आकर्षक बनाकर पेश करना होता है तो उसके आगे किसी लोकप्रिय मांसाहारी व्यंजन का नाम चिपका दिया जाता है।

विडंबना देखिए कि जिस मांसाहारी पाक परंपरा से नाम उधार लेने में कोई परेशानी नहीं, उसी परंपरा के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संदर्भों से इतनी असहजता क्यों?

दूसरा सवाल और भी दिलचस्प है। भारत की आबादी का एक बहुत बड़ा हिस्सा मांसाहारी भोजन करता है। विभिन्न सर्वेक्षणों में यह अनुपात अलग-अलग मिलता है, लेकिन यह निर्विवाद है कि मांसाहार भारत की खाद्य संस्कृति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। देश के लगभग हर क्षेत्र की अपनी विशिष्ट मांसाहारी पाक परंपरा है।

कश्मीर का रोगन जोश, लखनऊ का गलौटी कबाब, हैदराबाद की दम बिरयानी, भोपाल का गोश्त कोरमा, बंगाल की मटन करी, केरल का बीफ फ्राई, राजस्थान का लाल मांस और पंजाब का तंदूरी चिकन। भारत की पाक विविधता केवल दाल, चावल, रोटी और सब्जियों तक सीमित नहीं है।

फिर जब विदेशी राष्ट्राध्यक्ष भारत आते हैं तो हमारी मेहमाननवाजी का प्रतिनिधित्व करने के लिए बार-बार ऐसा शाकाहारी मेन्यू ही क्यों चुना जाता है, जिसमें भारत की विशाल मांसाहारी पाक विरासत लगभग गायब हो जाती है?

हाल ही में आयोजित ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के दौरान भी शाकाहारी मेन्यू और मिलेट खिचड़ी जैसी चीजों को प्रमुखता से प्रस्तुत किए जाने पर यही सवाल उठता है। रूस और चीन जैसे देशों के प्रतिनिधियों के सामने भारतीय पाककला की विविधता दिखाने के लिए क्या हमारे पास कुछ और नहीं था? क्या भारत की पहचान केवल मोटे अनाज, खिचड़ी और गोभी तक सीमित कर दी जाएगी?

मिलेट खिचड़ी बुरी नहीं है। गोभी मुसल्लम भी बुरी नहीं है। सवाल यह है कि क्या इन्हीं कुछ चुनिंदा व्यंजनों को भारत की संपूर्ण खानपान संस्कृति का प्रतिनिधि बना देना उचित है?

और अब आते हैं इस पूरे प्रकरण के सबसे दिलचस्प राजनीतिक पहलू पर।

हमारे यहां एक खास राजनीतिक विचारधारा के लोग दिन-रात मध्यकालीन भारतीय इतिहास को लेकर विलाप करते रहते हैं। कभी कहते हैं कि आक्रमणकारियों ने मंदिर तोड़ दिए, कभी कहते हैं कि हमारी संस्कृति को नष्ट कर दिया गया, कभी मुगल काल को भारत के इतिहास का अंधकार युग बताने लगते हैं। इतिहास के उस दौर को लेकर इतनी नफरत पैदा की जाती है कि मानो उस समय इस भूभाग पर कुछ भी रचनात्मक नहीं हुआ।

लेकिन जरा गौर कीजिए!

जब विदेशी मेहमान भारत आते हैं तो उन्हें दिखाने के लिए दिल्ली का लाल किला भी होता है, आगरा का ताजमहल भी होता है, मुगल स्थापत्य भी होता है और शाही रसोई की परंपराओं से निकले व्यंजन भी। तब अचानक वही इतिहास भारत की गौरवशाली विरासत बन जाता है, जिसे अपने राजनीतिक भाषणों में कोसा जाता है।

ताजमहल दिखाने में कोई परहेज नहीं, मुगल स्थापत्य पर गर्व करने में कोई परेशानी नहीं, सल्तनत और मुगलकालीन पाक परंपराओं से निकले व्यंजनों के नाम इस्तेमाल करने में कोई संकोच नहीं; लेकिन इतिहास के उस दौर के सामाजिक-सांस्कृतिक योगदान को स्वीकार करने की बात आते ही माथे पर बल पड़ने लगते हैं।

यह कैसी ऐतिहासिक चयनशीलता है?

इतिहास को अपनी सुविधानुसार स्वीकार और अस्वीकार करने की यह प्रवृत्ति ही असली समस्या है। मध्यकालीन भारत का इतिहास केवल युद्धों, आक्रमणों और सत्ता संघर्षों का इतिहास नहीं है। उसमें स्थापत्य है, संगीत है, भाषा और साहित्य का विकास है, वस्त्र और शिल्प हैं, कृषि और व्यापार है तथा खानपान की ऐसी समृद्ध परंपराएं हैं, जिन्होंने सदियों में भारतीय संस्कृति को नया स्वरूप दिया।

हमारी रसोई भी इतिहास की किताब है। उसमें विभिन्न समुदायों, क्षेत्रों, संस्कृतियों और ऐतिहासिक कालखंडों के मेल का स्वाद मौजूद है। आज हम जिन अनेक व्यंजनों को भारतीय भोजन का हिस्सा मानते हैं, वे इसी लंबे सांस्कृतिक आदान-प्रदान की देन हैं।

इसलिए किसी ऐतिहासिक कालखंड से राजनीतिक असहमति हो सकती है, उसके शासकों के अत्याचारों की आलोचना भी हो सकती है, लेकिन उसके समूचे सांस्कृतिक योगदान को मिटा देने की कोशिश न इतिहासबोध है और न ही राष्ट्रबोध।

विडंबना यह है कि जिन लोगों को मुगलकालीन इतिहास से इतनी शिकायत है, वे विदेशी मेहमानों के सामने उसी दौर की पाककला और स्थापत्य को भारत की शान बताने से नहीं चूकते। शायद इसलिए कि विदेशी मेहमानों के सामने इतिहास की राजनीति नहीं, भारत की छवि महत्वपूर्ण हो जाती है।

मगर सवाल यह है कि अपने ही नागरिकों के सामने इतिहास को लेकर इतना दोहरा रवैया क्यों?

भारत की सांस्कृतिक पहचान किसी एक धर्म, समुदाय, खानपान या ऐतिहासिक कालखंड की बपौती नहीं है। यहां शाकाहारी भी हैं और मांसाहारी भी। यहां दाल-बाटी भी है और गोश्त की दम बिरयानी भी। यहां मंदिरों की स्थापत्य परंपरा भी है और मुगलकालीन स्मारक भी। यहां बौद्ध विरासत भी है, जैन परंपरा भी, सूफी संगीत भी और लोकसंस्कृति की अनगिनत धाराएं भी।

भारत की खूबसूरती इसी विविधता में है।

और हां, अगली बार किसी विदेशी मेहमान को गोभी मुसल्लम परोसिए तो जरूर परोसिए, लेकिन उसके साथ भारत के इतिहास की असली मुसल्लम समझ भी परोसिए। क्योंकि गोभी को मुसल्लम का नाम देने से वह मुर्ग मुसल्लम नहीं बन जाती, ठीक वैसे ही जैसे इतिहास के किसी एक हिस्से को नकार देने से वह इतिहास से गायब नहीं हो जाता।

इतिहास से नफरत करने वालों की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि जब अपनी संस्कृति का प्रदर्शन करना होता है, तो उन्हें उसी इतिहास की रसोई में जाना पड़ता है जिसे वे अपने राजनीतिक एजेंडे के लिए नकारते रहते हैं।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *