ICU से सरहद तक: मेक इन इंडिया के नाम पर आत्मनिर्भरता का छल और राष्ट्रीय सुरक्षा से खिलवाड़!

देशभक्ति का उपदेश देने वाली सरकार बताए कि भारतीय अस्पतालों के ICU और सेना के ड्रोन तक चीनी तकनीक की निर्भरता कैसे पहुँच गई?

देश के वाणिज्य मंत्री का यह कहना कि भारत में चीनी सामान इसलिए बिकता है क्योंकि देश के लोगों में देशभक्ति की कमी है, केवल एक गैर-जिम्मेदाराना बयान नहीं है। यह उस राजनीतिक मानसिकता का परिचायक है जो अपनी नीतिगत विफलताओं का ठीकरा नागरिकों के सिर फोड़ने में देर नहीं करती। मंत्री महोदय को शायद यह समझना चाहिए कि किसी देश की आर्थिक आत्मनिर्भरता नागरिकों को देशभक्ति का प्रमाणपत्र बाँटने से नहीं, बल्कि मजबूत औद्योगिक नीतियों, तकनीकी क्षमता, अनुसंधान और जवाबदेह शासन से आती है।

लेकिन असली सवाल यह है कि जब सरकार स्वयं चीन पर निर्भरता कम करने का दावा करती है, तब भारतीय अस्पतालों के ICU में इस्तेमाल होने वाली जीवनरक्षक मशीनों से लेकर भारतीय सेना के निगरानी ड्रोन तक चीनी उपकरणों और तकनीक पर निर्भर क्यों हैं? और उससे भी गंभीर सवाल यह कि इस निर्भरता को भारतीय निर्माण का नाम देकर सरकारी खरीद में प्रस्तुत कैसे किया जा रहा है?

बिजली के लिए चीन जरूरी, लेकिन देशभक्ति का पाठ नागरिकों को!

मार्च 2026 में सरकार ने सार्वजनिक क्षेत्र की दो महारत्न कंपनियों BHEL और SAIL को चीन से आवश्यक उपकरण और कलपुर्जे खरीदने की विशेष अनुमति दी। इसके बाद जून 2026 में चार बड़ी चीनी बिजली उपकरण कंपनियों को भारतीय बिजली परियोजनाओं में बोली लगाने की अनुमति दी गई। सरकार का तर्क था कि चीनी उपकरणों के बिना कई महत्वपूर्ण बिजली परियोजनाएँ अधूरी रह सकती हैं।

यहाँ सरकार की व्यावहारिक मजबूरी समझ में आती है। लेकिन प्रश्न यह है कि जब देश के महत्वपूर्ण बिजली क्षेत्र में चीनी निर्भरता स्वीकार करनी पड़ती है, तब देश के नागरिकों को चीनी सामान खरीदने के लिए देशभक्ति का पाठ पढ़ाने का नैतिक अधिकार सरकार को कैसे मिल जाता है?

सरकार के अपने फैसले बताते हैं कि राष्ट्रीय हित के नाम पर चीन के साथ व्यावहारिक संबंध बनाए रखना उसे भी आवश्यक लगता है। फिर देशभक्ति की परीक्षा केवल उपभोक्ताओं की क्यों?

ICU में भारतीय नाम, मशीनों के भीतर चीनी तकनीक!

मामला केवल बिजली परियोजनाओं तक सीमित नहीं है। उपलब्ध आयात अभिलेखों के अनुसार, भारतीय ब्रांड के नाम से सरकारी अस्पतालों में आपूर्ति किए जा रहे कुछ वेंटिलेटर और पेशेंट मॉनिटर्स की लागत का लगभग 88 प्रतिशत हिस्सा चीन से आयातित प्रमुख इकाइयों से जुड़ा है।

इसका अर्थ यह है कि जिस उत्पाद को भारतीय निर्माण के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है, उसकी वास्तविक तकनीकी और आर्थिक संरचना में विदेशी निर्भरता अत्यधिक हो सकती है। यदि भारत में मुख्यतः बाहरी आवरण, पैकेजिंग, केबल और लेबल लगाने का काम हो रहा है, तो क्या इसे वास्तविक स्वदेशी विनिर्माण कहा जा सकता है?

यह सवाल और गंभीर हो जाता है जब जनवरी 2025 में अमेरिकी साइबर सुरक्षा एजेंसी द्वारा संबंधित प्रकार के पेशेंट मॉनिटर्स की जाँच में उनके फर्मवेयर के भीतर चीन के सर्वर का हार्ड-कोडेड IP एड्रेस मिलने की बात सामने आती है।

अस्पताल की मशीन केवल मरीज का ब्लड प्रेशर, ऑक्सीजन स्तर और हृदयगति नहीं मापती। वह संवेदनशील चिकित्सा सूचनाओं को भी संसाधित करती है। यदि उसके सॉफ्टवेयर या नेटवर्क कनेक्टिविटी में सुरक्षा संबंधी खामियाँ हैं, तो यह केवल तकनीकी समस्या नहीं, बल्कि मरीजों की निजता और राष्ट्रीय साइबर सुरक्षा का प्रश्न है।

कल्पना कीजिए, जिस मशीन पर किसी मरीज की साँसें और जीवन निर्भर हैं, उसके भीतर मौजूद तकनीक की सुरक्षा की पर्याप्त जाँच ही न हुई हो!

2020 का प्रतिबंध और कानूनों के बीच छिपा रास्ता

गलवान घाटी में 15 जून 2020 को भारतीय और चीनी सैनिकों के बीच हिंसक संघर्ष के बाद देश में चीनी निर्भरता कम करने की माँग तेज हुई। इसके 38 दिन बाद, 23 जुलाई 2020 को वित्त मंत्रालय के व्यय विभाग ने General Financial Rules, 2017 में Rule 144(xi) जोड़ा।

इस नियम के तहत भारत की स्थलीय सीमा से लगे देशों की कंपनियों को सरकारी खरीद में भाग लेने के लिए सक्षम प्राधिकारी के पास पंजीकरण तथा निर्धारित सुरक्षा और राजनीतिक मंजूरी प्राप्त करना अनिवार्य किया गया।

यह राष्ट्रीय सुरक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण कदम था। लेकिन इसकी एक बुनियादी सीमा थी। नियम का प्रमुख ध्यान इस बात पर था कि सरकारी निविदा में बोली लगाने वाली कंपनी कौन है और उसका स्वामित्व किसके पास है। यह सुनिश्चित करने का समान रूप से प्रभावी तंत्र विकसित नहीं हुआ कि उस कंपनी द्वारा आपूर्ति की जा रही मशीनों के भीतर वास्तव में किस देश की तकनीक, हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर मौजूद हैं।

इसी कमजोरी का लाभ उठाने की आशंका सामने आती है।

दूसरी ओर, Drugs and Cosmetics Act, 1940 की धारा 3(f) में निर्माण की परिभाषा व्यापक है। इसमें बनाने, बदलने, फिनिशिंग, पैकिंग और लेबलिंग जैसी प्रक्रियाओं को भी शामिल किया गया है। बाद में Medical Devices Rules, 2017 के अंतर्गत भी मेडिकल उपकरणों के निर्माण और लाइसेंसिंग की व्यवस्था विकसित हुई।

समस्या यह है कि यदि निर्माण की कानूनी परिभाषा और सरकारी खरीद में स्वदेशी उत्पाद की वास्तविक तकनीकी पहचान के बीच पर्याप्त अंतर नहीं किया जाता, तो आयातित पुर्जों या लगभग तैयार मशीनों को भारतीय निर्माण के रूप में प्रस्तुत करने की गुंजाइश पैदा हो सकती है।

कानून का उद्देश्य घरेलू विनिर्माण को प्रोत्साहित करना होना चाहिए, न कि केवल विदेशी उत्पाद पर भारतीय कंपनी का लेबल लगाकर उसे स्वदेशी घोषित करने की सुविधा देना।

सवाल यह नहीं कि भारत में कोई विदेशी कलपुर्जा क्यों इस्तेमाल हुआ। सवाल यह है कि वास्तविक घरेलू मूल्यवर्धन, तकनीकी स्वामित्व और विनिर्माण क्षमता की जाँच किए बिना किसी उत्पाद को स्वदेशी मानने का आधार क्या है?

सेना के ड्रोन में भी वही कहानी!

राष्ट्रीय सुरक्षा का प्रश्न अस्पतालों तक सीमित नहीं है। उपलब्ध विवरणों के अनुसार, भारतीय सेना को निगरानी और लॉजिस्टिक्स के लिए भारतीय ब्रांडों के नाम पर आपूर्ति किए गए तीन ड्रोन अनुबंधों का कुल मूल्य लगभग 230 करोड़ रुपये था। तकनीकी और सुरक्षा संबंधी जाँच में इन ड्रोन में चीनी मूल के कलपुर्जों और संचार मॉड्यूल की मौजूदगी सामने आने के बाद इन अनुबंधों को रद्द करना पड़ा।

इसके अतिरिक्त, उपलब्ध सरकारी आँकड़ों के अनुसार, भारत में इस्तेमाल होने वाले छोटे ड्रोन के लगभग 39 प्रतिशत फ्लाइट कंट्रोलर चीन में निर्मित हैं।

यह कोई मामूली पुर्जा नहीं है। फ्लाइट कंट्रोलर ड्रोन का मस्तिष्क होता है। उसकी उड़ान, दिशा, नियंत्रण और कई तकनीकी कार्य इसी पर निर्भर करते हैं। संचार मॉड्यूल और सॉफ्टवेयर की सुरक्षा में कोई गंभीर खामी हो तो निगरानी और रक्षा संबंधी सूचनाओं के दुरुपयोग का जोखिम पैदा हो सकता है।

अब एक तरफ अस्पतालों के ICU में जीवनरक्षक मशीनें हैं और दूसरी तरफ सीमाओं पर निगरानी करने वाले सेना के ड्रोन। दोनों जगह सवाल एक ही है—क्या हमने केवल उत्पाद पर भारतीय नाम और स्टिकर देखकर उसे स्वदेशी मान लिया? क्या उसकी तकनीकी उत्पत्ति, सॉफ्टवेयर, डेटा सुरक्षा और वास्तविक विनिर्माण क्षमता की पर्याप्त जाँच की गई?

यदि ऐसा नहीं हुआ, तो यह आत्मनिर्भरता नहीं, बल्कि निर्भरता को स्वदेशी आवरण में छिपाने का प्रयास है।

सरकार की प्राथमिकता में प्रचार है या जवाबदेही?

यहाँ सरकार की भूमिका पर कुछ सीधे सवाल उठने चाहिए।

जब सरकारी खरीद पोर्टल GeM नियमों के उल्लंघन के आरोपों पर Hikvision जैसे चीनी ब्रांडों के उत्पादों को प्रतिबंधित कर सकता है, तो मेडिकल उपकरणों और रक्षा संबंधी ड्रोन में चीनी मूल की तकनीक की पारदर्शी जाँच क्यों नहीं हो सकती?

जब बिजली परियोजनाओं के लिए सरकार नियमों में बदलाव कर सकती है, तो अस्पतालों और रक्षा उपकरणों की खरीद में वास्तविक स्वदेशी सामग्री तथा तकनीकी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए कठोर व्यवस्था क्यों नहीं बनाई जा सकती?

यदि इन छह वर्षों में री-लेबलिंग और वास्तविक विनिर्माण के अंतर की व्यवस्थित जाँच नहीं हुई, तो इसके लिए जिम्मेदार कौन है? संबंधित मंत्रालय, नियामक संस्थाएँ, सरकारी खरीद एजेंसियाँ या वे अधिकारी जिन्होंने करोड़ों रुपये के टेंडरों को मंजूरी दी?

सरकार को यह भी स्पष्ट करना चाहिए कि जिन कंपनियों ने सरकारी अस्पतालों और रक्षा प्रतिष्ठानों को उपकरण आपूर्ति किए, उनकी तकनीकी जाँच किस स्तर पर हुई? आयातित पुर्जों का अनुपात कितना था? फर्मवेयर और संचार सुरक्षा का स्वतंत्र ऑडिट हुआ या नहीं? और यदि हुआ तो उसकी रिपोर्ट सार्वजनिक क्यों नहीं की जाती?

आत्मनिर्भर भारत का अर्थ भारतीय स्टीकर नहीं, भारतीय क्षमता है!

आत्मनिर्भर भारत का अर्थ यह नहीं कि चीन में मशीन बने, भारत में उसका पैकेट बदले, कंपनी का नाम छपे और फिर उसे स्वदेशी उत्पाद बताकर सरकारी खजाने से भुगतान कर दिया जाए।

आत्मनिर्भरता का अर्थ है कि भारत के वैज्ञानिक, इंजीनियर और उद्योग ऐसी तकनीक विकसित करें जिनका डिजाइन, निर्माण, गुणवत्ता नियंत्रण, सॉफ्टवेयर और सुरक्षा हमारी अपनी क्षमता पर आधारित हो। विदेशी कलपुर्जों का इस्तेमाल अपने आप में अपराध नहीं है। आधुनिक वैश्विक विनिर्माण में ऐसा होता है। लेकिन रणनीतिक क्षेत्रों में महत्वपूर्ण तकनीक पर अत्यधिक निर्भरता और उसकी अपारदर्शिता राष्ट्रीय हित के विरुद्ध हो सकती है।

सरकार को चाहिए कि मेडिकल डिवाइस और रक्षा उपकरणों के लिए वास्तविक घरेलू मूल्यवर्धन की स्पष्ट परिभाषा बनाए। केवल पैकिंग और लेबलिंग को उच्च स्वदेशी सामग्री का प्रमाण न माना जाए। महत्वपूर्ण उपकरणों के हार्डवेयर, फर्मवेयर, डेटा सुरक्षा और सप्लाई चेन का स्वतंत्र ऑडिट हो। सरकारी टेंडरों में तकनीकी उत्पत्ति और अंतिम लाभकारी स्वामित्व का खुलासा अनिवार्य किया जाए। साथ ही, दोषी पाए जाने वाले निर्माताओं और जिम्मेदार अधिकारियों के विरुद्ध कार्रवाई हो।

यह भी जरूरी है कि राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर वास्तविक भारतीय निर्माताओं को परेशान न किया जाए और न ही विदेशी तकनीक के हर उपयोग को संदेह की दृष्टि से देखा जाए। कसौटी स्पष्ट होनी चाहिए—पारदर्शिता, गुणवत्ता, वास्तविक मूल्यवर्धन और सुरक्षा।

अंततः, देशभक्ति का प्रमाण नागरिकों से नहीं, सरकार की नीतियों और कामकाज से माँगा जाना चाहिए।

जो सरकार नागरिकों को चीनी सामान न खरीदने की सलाह देती है, उसे पहले यह बताना होगा कि भारतीय अस्पतालों और सेना के उपकरणों में चीनी तकनीक की निर्भरता दूर करने के लिए उसने क्या किया। जो सरकार मेक इन इंडिया का प्रचार करती है, उसे यह साबित करना होगा कि भारतीय उत्पाद वास्तव में भारत की तकनीकी क्षमता का परिणाम हैं, न कि विदेशी मशीनों पर चिपकाया गया भारतीय लेबल।

ICU में मरीज की साँसें किसी विज्ञापन अभियान से नहीं चलतीं और सरहदों की सुरक्षा किसी राजनीतिक नारे से नहीं होती। इसके लिए विश्वसनीय तकनीक, मजबूत संस्थाएँ और जवाबदेह शासन चाहिए।

देशभक्ति का ठेका नागरिकों को देने वाली सरकार को अब अपने काम का हिसाब देना चाहिए।

क्योंकि देश के साथ सबसे बड़ा धोखा केवल विदेशी सामान खरीदना नहीं है; सबसे बड़ा धोखा है विदेशी निर्भरता को आत्मनिर्भरता बताकर देश को भ्रमित करना और राष्ट्रीय सुरक्षा तथा नागरिकों के जीवन से जुड़े सवालों पर जवाबदेही से बचना।

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