आलोचना से असहज होती न्यायपालिका
सुप्रीम कोर्ट की गरिमा या आलोचना से असहज होती न्यायपालिका?
निशिकांत दुबे के लिए ‘फूल नहीं’ और कांग्रेस के लिए ‘आयरन हैंड’! आखिर न्याय के तराजू के दो पलड़े क्यों?
न्यायपालिका लोकतंत्र का वह संवैधानिक स्तंभ है, जिसकी विश्वसनीयता का आधार उसकी निष्पक्षता, स्वतंत्रता और न्यायपूर्ण आचरण है। न्यायालय की प्रतिष्ठा किसी पद, पदवी, आदेश की कठोर भाषा या अवमानना की कार्रवाई से नहीं बनती। उसकी असली प्रतिष्ठा इस बात से बनती है कि वह सत्ता और विपक्ष, शक्तिशाली और कमजोर, सरकार और नागरिक—सभी के साथ एक जैसा संवैधानिक व्यवहार करता है। लेकिन जब एक ही न्यायपालिका अलग-अलग राजनीतिक व्यक्तियों की आलोचना पर अलग-अलग दृष्टिकोण अपनाती दिखाई दे, तो सवाल उठना स्वाभाविक है। और लोकतंत्र में सवाल उठाना कोई अपराध नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट के दो न्यायाधीशों—जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस विपुल एम. पंचोली—की पीठ ने केरल कांग्रेस के 40-50 पदाधिकारियों को अवमानना का नोटिस जारी करते हुए जिस तरह की भाषा का इस्तेमाल किया है, उसने न्यायपालिका की गरिमा, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और संस्थागत निष्पक्षता पर एक गंभीर बहस छेड़ दी है। अदालत ने कहा कि वह देखेगी कि माफीनामा संबंधित लोगों की कलम से आ रहा है या दिल से। यह भी कहा कि सुप्रीम कोर्ट की अथॉरिटी को कमजोर करने की कोशिशों से ‘आयरन हैंड’ से निपटा जाएगा। अदालत ने यह तक कहा कि 40-50 लोग उसके लिए कोई बड़ी संख्या नहीं हैं—सबको बुलाइए, आने दीजिए, अपनी बात कहने दीजिए।
सवाल यह नहीं कि केरल कांग्रेस का पोस्ट उचित था या अनुचित। वह पोस्ट निश्चित रूप से अशिष्ट, गैर-जिम्मेदाराना और राजनीतिक संवाद के गिरते स्तर का उदाहरण था। किसी भी संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति के प्रति ऐसी भाषा से बचना चाहिए। लेकिन क्या किसी पोस्ट का अशिष्ट होना अपने आप में न्यायालय की अवमानना सिद्ध कर देता है? क्या न्यायपालिका की आलोचना और न्यायिक प्रक्रिया में हस्तक्षेप एक ही बात हैं? और क्या किसी राजनीतिक संगठन द्वारा बिना शर्त माफी मांग लेने के बाद भी 40-50 पदाधिकारियों को एक साथ अवमानना की कार्रवाई के दायरे में लाना आवश्यक था?
‘नॉट माय डोमेन’ से शुरू हुआ विवाद
इस पूरे विवाद की पृष्ठभूमि समझना जरूरी है। अक्टूबर के दूसरे सप्ताह में दिल्ली में विपक्षी दल चुनाव आयोग के प्रमुख ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर प्रदर्शन कर रहे थे। दिल्ली में निषेधाज्ञा लागू थी और प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया जा रहा था। जंतर-मंतर पर प्रदर्शन की अनुमति और पुलिस की कार्रवाई को लेकर गंभीर सवाल उठ रहे थे।
9 अक्टूबर को मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की पीठ ने केंद्र सरकार से कहा कि दिल्ली आने वाली ट्रेनों और मेट्रो को रोकने जैसी कार्रवाई नहीं होनी चाहिए तथा प्रदर्शन के लिए कोई स्थान निर्धारित किया जाना चाहिए। लेकिन प्रदर्शनकारियों की हिरासत की वैधता का प्रश्न अलग से अनुत्तरित रहा।
12 अक्टूबर को दिल्ली पुलिस ने जंतर-मंतर को प्रदर्शन स्थल के रूप में हटाकर रामलीला मैदान और पूर्वी दिल्ली में प्रदर्शन करने का विकल्प दिया। इसी दिन पत्रकारों ने मुख्य न्यायाधीश से प्रदर्शनकारियों की हिरासत और विरोध-प्रदर्शन के अधिकार को लेकर सवाल पूछे। उनका जवाब था—यह कानून-व्यवस्था का मामला है, यह मेरा डोमेन नहीं है।
इसी पृष्ठभूमि में केरल कांग्रेस के आधिकारिक एक्स हैंडल से पोस्ट किया गया—‘डियर सूर्यकांत, इफ लॉ एंड ऑर्डर इज नॉट योर डोमेन, रिजाइन नाउ। वी विल फाइंड योर रिप्लेसमेंट, हू कैन हैंडल इट?’
अर्थात यदि कानून-व्यवस्था आपके अधिकार क्षेत्र में नहीं है तो इस्तीफा दे दीजिए, हम आपकी जगह किसी दूसरे व्यक्ति को ढूंढ लेंगे।
यह भाषा निश्चित रूप से मर्यादित नहीं थी। लेकिन यह समझना भी जरूरी है कि पोस्ट किसी न्यायिक फैसले पर व्यक्तिगत हमला करने के बजाय मुख्य न्यायाधीश के सार्वजनिक बयान पर राजनीतिक प्रतिक्रिया के रूप में आया था। इसकी भाषा की आलोचना की जा सकती है, लेकिन उस बयान के राजनीतिक और संवैधानिक संदर्भ को मिटाकर इसे केवल न्यायपालिका को डराने की कोशिश बताना भी उचित नहीं होगा।
कांग्रेस ने कहा कि एक कार्यकर्ता ने पार्टी नेतृत्व की अनुमति के बिना पोस्ट किया था। पोस्ट उसी दिन हटा दिया गया और बिना शर्त माफी भी मांगी गई। अगले दिन इस संबंध में प्रेस विज्ञप्ति जारी की गई।
यानी पोस्ट हटाया गया, गलती स्वीकार की गई और माफी मांगी गई। फिर भी मामला अवमानना की कार्रवाई तक पहुंच गया।
LiveLaw – Supreme Court Issues Contempt Notice to Kerala Congress Office-bearers
एक ही सुप्रीम कोर्ट, लेकिन दो अलग-अलग पैमाने?
इस प्रकरण का सबसे महत्वपूर्ण पहलू अप्रैल-मई 2025 का निशिकांत दुबे प्रकरण है।
निशिकांत दुबे बनाम सुप्रीम कोर्ट – 5 मई 2025 का न्यायिक आदेश
http://Supreme Court Order – Vishal Tiwari v. Union of India (PDF), 5 May 2025Attachment.png
तमिलनाडु के राज्यपाल से संबंधित मामले में सुप्रीम कोर्ट ने विधेयकों पर राष्ट्रपति और राज्यपाल की कार्रवाई के लिए समय-सीमा निर्धारित की थी। इस न्यायिक निर्णय के बाद भाजपा के चार बार के सांसद निशिकांत दुबे ने तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना पर बेहद गंभीर और उत्तेजक टिप्पणी की थी।
उन्होंने कहा था कि यदि सुप्रीम कोर्ट को ही कानून बनाना है तो संसद और विधानसभाओं को बंद कर देना चाहिए। उन्होंने अदालत पर देश को अराजकता की ओर ले जाने का आरोप लगाया और तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश को देश में संभावित सिविल वॉर के लिए जिम्मेदार ठहराया।
यह कोई गुमनाम सोशल मीडिया कार्यकर्ता का पोस्ट नहीं था। यह सत्तारूढ़ दल के एक प्रभावशाली सांसद का सार्वजनिक बयान था। न उन्होंने बयान वापस लिया, न बिना शर्त माफी मांगी और न ही भाजपा ने इसे पार्टी का आधिकारिक बयान माना। उसे उनकी व्यक्तिगत राय बताकर पल्ला झाड़ लिया गया।
केरल कांग्रेस अवमानना प्रकरण – 6 नवंबर 2026
http://LiveLaw – Supreme Court Issues Contempt Notice to Kerala Congress Office-bearers
एक वकील ने इस बयान को लेकर अवमानना की याचिका दायर की।
5 मई 2025 को तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना और जस्टिस संजय कुमार की पीठ ने याचिका खारिज कर दी। अदालत ने निशिकांत दुबे की टिप्पणियों को अत्यधिक उत्तेजक, बेतुका और संवैधानिक अदालतों की भूमिका के प्रति अज्ञानता प्रदर्शित करने वाला बताया। लेकिन साथ ही एक अत्यंत महत्वपूर्ण टिप्पणी की—अदालतें इतनी नाजुक नहीं हैं कि ऐसी बेतुकी बातों से मुरझा जाएं।
पीठ ने स्पष्ट किया कि अपने निर्णयों का बचाव करने के लिए न्यायालय को अवमानना की शक्ति का सहारा लेने की जरूरत नहीं है। न्यायिक फैसलों की आलोचना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के दायरे में संरक्षित है। न्यायाधीशों के कंधे इतने चौड़े होने चाहिए कि वे आलोचना का बोझ सहन कर सकें।
अब जरा दोनों मामलों की तुलना कीजिए।
एक तरफ सत्तारूढ़ दल का सांसद मुख्य न्यायाधीश को देश में सिविल वॉर के लिए जिम्मेदार बताता है, संसद और विधानसभाओं को बंद करने की बात करता है। अदालत उसे बेतुका कहकर भी अवमानना की कार्रवाई आवश्यक नहीं समझती।
दूसरी तरफ केरल कांग्रेस के एक आधिकारिक सोशल मीडिया हैंडल से मुख्य न्यायाधीश को इस्तीफा देने की सलाह दी जाती है। पोस्ट हटता है, बिना शर्त माफी मांगी जाती है, लेकिन 40-50 पदाधिकारियों को अवमानना का नोटिस जारी हो जाता है।
निशिकांत दुबे के मामले में अदालत कहती है—हम फूल नहीं हैं। केरल कांग्रेस के मामले में संदेश मिलता है—हमारी अथॉरिटी को चुनौती दी तो आयरन हैंड से निपटेंगे।
क्या यह न्यायिक दृष्टिकोण का स्वाभाविक अंतर है या आलोचना करने वालों की राजनीतिक पहचान के आधार पर बदलता हुआ न्यायिक मापदंड?
संविधान का अनुच्छेद 129 दोनों मामलों में समान रूप से लागू होता है। न्यायपालिका की गरिमा भी दोनों मामलों में समान रूप से महत्वपूर्ण है। फिर न्यायिक सहनशीलता का स्तर इतना अलग क्यों दिखाई देता है?
अवमानना की शक्ति और आलोचना का संवैधानिक अधिकार
न्यायालय की अवमानना रोकने की शक्ति का संवैधानिक उद्देश्य न्यायिक संस्थाओं को व्यक्तिगत आलोचना से बचाना नहीं, बल्कि न्याय के प्रशासन को बाधित होने से बचाना है।
संविधान का अनुच्छेद 19(1)(a) नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है। यह स्वतंत्रता असीमित नहीं है। अनुच्छेद 19(2) के अंतर्गत न्यायालय की अवमानना सहित कुछ आधारों पर उचित प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि न्यायपालिका की आलोचना को ही अवमानना मान लिया जाए।
अदालत के फैसलों से असहमति, न्यायाधीशों के सार्वजनिक वक्तव्यों पर सवाल, न्यायिक सक्रियता की आलोचना और न्यायपालिका की जवाबदेही की मांग—ये सभी लोकतांत्रिक विमर्श के आवश्यक हिस्से हैं।
किसी न्यायाधीश का पद उसे आलोचना से ऊपर नहीं रखता। न्यायपालिका की स्वतंत्रता का अर्थ यह नहीं कि न्यायपालिका सार्वजनिक जवाबदेही से भी मुक्त हो जाए।
यहां एक बुनियादी अंतर समझना होगा। न्यायालय के काम में बाधा डालना, न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित करना और किसी न्यायिक निर्णय की आलोचना करना तीन अलग-अलग बातें हैं। इनके बीच की संवैधानिक सीमा को धुंधला नहीं किया जाना चाहिए।
यदि हर तीखी टिप्पणी को न्यायपालिका की प्रतिष्ठा पर हमला माना जाने लगेगा, तो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का दायरा धीरे-धीरे सिकुड़ता जाएगा। इससे न्यायपालिका की प्रतिष्ठा बढ़ेगी नहीं, बल्कि उसके प्रति नागरिकों का भरोसा कमजोर हो सकता है।
40-50 लोगों को नोटिस: न्यायिक गरिमा का प्रश्न या शक्ति प्रदर्शन?
केरल प्रदेश कांग्रेस कमेटी ने अदालत में अपना पक्ष रखते हुए कहा कि पोस्ट पदाधिकारियों की सहमति और अनुमति के बिना प्रकाशित हुआ था। पोस्ट हटाया जा चुका है और बिना शर्त माफी मांगी जा रही है।
इसके बावजूद अदालत ने नोटिस केवल प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष तक सीमित रखने की मांग स्वीकार नहीं की। सभी पदाधिकारियों को नोटिस जारी करने का निर्णय लिया गया।
अदालत का यह कहना कि 40-50 लोग कोई बड़ी संख्या नहीं हैं, अपने आप में कोई कानूनी कसौटी नहीं हो सकता। असली सवाल यह है कि इन सभी व्यक्तियों की व्यक्तिगत जिम्मेदारी क्या है? किसने पोस्ट किया? किसने उसे अनुमोदित किया? किसने उसका समर्थन किया? किसकी भूमिका न्यायिक अवमानना के आवश्यक तत्वों को पूरा करती है?
किसी संगठन के पदाधिकारी होने मात्र से प्रत्येक व्यक्ति को किसी पोस्ट के लिए समान रूप से जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। आपराधिक और अर्ध-न्यायिक जवाबदेही में व्यक्तिगत भूमिका और प्रमाण का महत्व होता है।
अदालत ने अभी यह स्पष्ट किया है कि उसने मामले के गुण-दोष पर कोई राय नहीं बनाई है। इसलिए नोटिस को दोषसिद्धि मानना गलत होगा। लेकिन नोटिस जारी करने के दायरे और उसके औचित्य पर सवाल उठाना भी उतना ही वैध है।
माफीनामे की सत्यता की जांच अदालत का अधिकार हो सकती है, लेकिन यह अधिकार विवेकपूर्ण और समान रूप से इस्तेमाल होना चाहिए। न्यायिक गरिमा किसी व्यक्ति के दिल में माफी की गहराई नापने से नहीं, बल्कि कानून के निष्पक्ष अनुप्रयोग से स्थापित होती है।
न्यायिक नियुक्तियों और न्यायिक जवाबदेही के सवाल
इस मामले की सुनवाई कर रही पीठ के दोनों न्यायाधीशों की पृष्ठभूमि भी सार्वजनिक विमर्श में चर्चा का विषय बनी है।
जस्टिस अरविंद कुमार की पीठ ने 5 जनवरी 2026 को उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत याचिकाएं खारिज की थीं। दोनों 2020 के दिल्ली दंगों से संबंधित UAPA मामले में पांच वर्ष से अधिक समय से जेल में थे और मुकदमे का ट्रायल शुरू नहीं हुआ था। उसी मामले में कुछ अन्य आरोपियों को जमानत दी गई थी। बाद में समीक्षा याचिकाएं भी खारिज हुईं।
यहां सवाल यह नहीं कि जमानत मिलनी ही चाहिए थी या नहीं। सवाल यह है कि जब किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता वर्षों तक मुकदमे के बिना प्रभावित रहती है, तब न्यायिक विवेक और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के संवैधानिक सिद्धांतों को कितनी प्राथमिकता मिलती है?
जस्टिस विपुल एम. पंचोली की सुप्रीम कोर्ट में नियुक्ति को लेकर भी कॉलेजियम के भीतर असहमति सामने आई थी। अगस्त 2025 में उनकी नियुक्ति की सिफारिश के समय जस्टिस बी.वी. नागरत्ना ने लिखित असहमति व्यक्त की थी। उन्होंने वरिष्ठता और चयन प्रक्रिया से संबंधित गंभीर प्रश्न उठाए थे। उनसे वरिष्ठ अनेक न्यायाधीशों को छोड़कर उनकी नियुक्ति की सिफारिश करने के निर्णय पर भी सार्वजनिक बहस हुई थी।
इन तथ्यों के आधार पर किसी न्यायाधीश की निष्पक्षता पर व्यक्तिगत निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा। लेकिन न्यायपालिका की नियुक्ति प्रक्रिया, कॉलेजियम की पारदर्शिता और न्यायिक जवाबदेही पर सवाल उठाना लोकतांत्रिक अधिकार है।
जो संस्था दूसरों से पारदर्शिता और जवाबदेही की अपेक्षा करती है, उसे अपने संस्थागत निर्णयों को भी आलोचनात्मक जांच के लिए खुला रखना चाहिए।
न्यायपालिका की प्रतिष्ठा आलोचना दबाने से नहीं, न्याय करने से बनती है
आज देश में न्यायपालिका से जुड़े अनेक महत्वपूर्ण प्रश्न नागरिकों के सामने हैं। चुनाव आयोग की निष्पक्षता, SIR के दौरान मतदाताओं के अधिकार, शांतिपूर्ण प्रदर्शन का संवैधानिक अधिकार, हिरासत की वैधता और सत्ता के दुरुपयोग के विरुद्ध न्यायिक हस्तक्षेप—ये ऐसे मुद्दे हैं जिन पर नागरिक सुप्रीम कोर्ट से स्पष्ट और प्रभावी संवैधानिक भूमिका की अपेक्षा करते हैं।
जब नागरिक किसी न्यायालय की आलोचना करते हैं, तो उस आलोचना का जवाब अवमानना की शक्ति से नहीं, बल्कि न्यायपूर्ण निर्णयों और पारदर्शी आचरण से दिया जाना चाहिए।
न्यायपालिका की स्वतंत्रता का अर्थ केवल इतना नहीं कि सरकार उसके काम में हस्तक्षेप न करे। इसका अर्थ यह भी है कि न्यायपालिका स्वयं राजनीतिक प्रभावों, संस्थागत पूर्वाग्रहों और सार्वजनिक आलोचना के दबाव से मुक्त रहकर काम करे।
और यही कारण है कि न्यायपालिका के दो अलग-अलग मामलों में दिखाई देने वाले दृष्टिकोण के अंतर पर सवाल उठना चाहिए।
आखिर दोहरे मापदंड क्यों?
इस पूरे प्रकरण में तीन सवाल लोकतंत्र और न्यायिक विश्वसनीयता के सामने खड़े हैं।
पहला सवाल
जब भाजपा सांसद निशिकांत दुबे ने तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश पर देश में सिविल वॉर का जिम्मेदार होने का आरोप लगाया, तब सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि न्यायाधीश इतने नाजुक नहीं हैं कि बेतुकी टिप्पणियों से मुरझा जाएं। लेकिन जब केरल कांग्रेस के हैंडल से मुख्य न्यायाधीश के अपने सार्वजनिक बयान पर अशिष्ट प्रतिक्रिया आई, पोस्ट हटा लिया गया और बिना शर्त माफी मांग ली गई, तब 40-50 पदाधिकारियों को नोटिस देने की जरूरत क्यों पड़ी? क्या न्यायिक सहनशीलता का पैमाना आलोचक की राजनीतिक पहचान से निर्धारित होगा?
दूसरा सवाल
जिस पोस्ट को लेकर अवमानना की कार्रवाई हो रही है, उसी पोस्ट पर 15 अक्टूबर को तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश की पीठ ने अवमानना संबंधी मांग पर नोटिस जारी नहीं किया था। बाद में 30 अक्टूबर को मामला दूसरी पीठ के सामने पहुंचा और उसने कार्रवाई शुरू कर दी। यह कानूनी रूप से संभव हो सकता है, लेकिन क्या इस अंतर के पीछे के कारणों को सार्वजनिक रूप से स्पष्ट नहीं किया जाना चाहिए? न्यायिक संस्थाओं में पारदर्शिता का तकाजा यही है।
तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण सवाल
क्या एक डिलीट किए गए पोस्ट और बिना शर्त माफी के बाद 40-50 पदाधिकारियों के विरुद्ध अवमानना की कार्यवाही शुरू करने से मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की प्रतिष्ठा बढ़ेगी? क्या न्यायपालिका की गरिमा इतनी कमजोर है कि उसे एक राजनीतिक सोशल मीडिया पोस्ट से बचाने के लिए आयरन हैंड की जरूरत पड़ जाए?
अदालत संविधान से बड़ी नहीं है
यह याद रखना जरूरी है कि संविधान किसी न्यायाधीश, प्रधानमंत्री, सांसद, राजनीतिक दल या संस्था की निजी संपत्ति नहीं है। संविधान सर्वोपरि है। न्यायपालिका उसकी संरक्षक संस्थाओं में से एक है, स्वयं संविधान से ऊपर नहीं।
न्यायपालिका को सम्मान इसलिए नहीं मिलता कि उसके पास अवमानना की शक्ति है। उसे सम्मान इसलिए मिलता है कि वह नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करती है, सत्ता को जवाबदेह बनाती है और कमजोर व्यक्ति को भी शक्तिशाली के विरुद्ध न्याय पाने का भरोसा देती है।
यदि कोई राजनीतिक संगठन न्यायाधीश के प्रति अभद्र भाषा का इस्तेमाल करता है तो उसकी आलोचना होनी चाहिए। लेकिन यदि सत्तारूढ़ दल का सांसद न्यायपालिका के विरुद्ध कहीं अधिक गंभीर और उत्तेजक टिप्पणी करता है, तो उसके लिए भी वही संवैधानिक कसौटी लागू होनी चाहिए।
न्यायपालिका की गरिमा के नाम पर चयनात्मक कठोरता और चयनात्मक उदारता दोनों ही उसकी निष्पक्षता पर सवाल खड़े करती हैं।
न्यायाधीशों के कंधे सचमुच इतने चौड़े होने चाहिए कि वे आलोचना सह सकें। और न्यायपालिका का चरित्र इतना मजबूत होना चाहिए कि वह आलोचना करने वाले की राजनीतिक पहचान देखकर अपना रवैया न बदले।
15 दिसंबर 2026 को इस मामले की अगली सुनवाई होगी। संभव है कि कांग्रेस के पदाधिकारी फिर माफी मांगें और अदालत यह जांचे कि वह माफी कितनी ईमानदार है। लेकिन देश के नागरिकों के मन में उठ रहे सवालों का जवाब किसी शपथपत्र से नहीं मिलेगा।
उनका जवाब न्यायपालिका को अपने आचरण से देना होगा।
क्योंकि अंततः सवाल केरल कांग्रेस के एक पोस्ट का नहीं है। सवाल यह है कि क्या भारत की सर्वोच्च अदालत आलोचना के प्रति वही उदारता दिखा सकती है, जिसकी अपेक्षा वह लोकतंत्र के अन्य संस्थानों से करती है?
न्यायपालिका की प्रतिष्ठा उसके सामने झुकने वाले लोगों की संख्या से नहीं, उसके सामने न्याय पाने वाले नागरिकों के भरोसे से मापी जाती है। अदालत को आयरन हैंड दिखाने की नहीं, न्याय का मजबूत हाथ बढ़ाने की जरूरत है।
मेरी संपादकीय दृष्टि में लेख की सबसे प्रभावशाली पंक्ति यही है:

