विकसित भारत या वसूली का तंत्र?

विकसित भारत के वादों और धरातल पर आम आदमी की जेब से हो रही लगातार वसूली के तंत्र के बीच आज एक गहरी खाई बन चुकी है। करप्शन अब चौंकाता नहीं, सत्ता की लूट अब विचलित नहीं करती और जनविरोधी नीतियाँ भी विकास के नाम पर स्वीकार कराई जा रही हैं। देश में एक ऐसा आर्थिक ढाँचा खड़ा किया जा रहा है, जिसमें सरकार की आमदनी बढ़ती है, कॉरपोरेट का मुनाफा बढ़ता है, लेकिन आम आदमी की जेब लगातार खाली होती जाती है। सवाल यह है कि आखिर किस कीमत पर बनेगा विकसित भारत?

विकसित भारत या वसूली का नया तंत्र? जनता की जेब पर सत्ता और कॉरपोरेट का साझा प्रहार

करप्शन अब चौंकाता नहीं, सत्ता की लूट अब विचलित नहीं करती और जनविरोधी नीतियाँ भी विकास के नाम पर स्वीकार कराई जा रही हैं। देश में एक ऐसा आर्थिक ढाँचा खड़ा किया जा रहा है, जिसमें सरकार की आमदनी बढ़ती है, कॉरपोरेट का मुनाफा बढ़ता है, लेकिन आम आदमी की जेब लगातार खाली होती जाती है। सवाल यह है कि आखिर किस कीमत पर बनेगा विकसित भारत?

अब इस देश में भ्रष्टाचार चौंकाता नहीं है। सत्ता के संरक्षण में होने वाली लूट चौंकाती नहीं है। जनता की जेब खाली करने वाली नीतियाँ भी आश्चर्य पैदा नहीं करतीं। आश्चर्य तो इस बात पर होता है कि इन सबको विकास का नाम देकर जनता के सामने इस तरह परोसा जा रहा है, मानो देश को विकसित बनाने का एकमात्र रास्ता यही हो।

कल तक जिस वेलफेयर स्टेट की अवधारणा के तहत सरकारें नागरिकों को शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, परिवहन और सामाजिक सुरक्षा जैसी सुविधाएँ उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी निभाती थीं, आज उसी अवधारणा को धीरे-धीरे पीछे धकेला जा रहा है। सरकार की भूमिका सुविधाएँ देने से अधिक राजस्व वसूलने और निजी क्षेत्र के लिए रास्ते खोलने तक सिमटती दिखाई दे रही है।

कर, सेस, सर्विस चार्ज, टोल, बैंकिंग शुल्क और निजीकरण के अलग-अलग रास्तों से नागरिकों पर आर्थिक बोझ बढ़ता जा रहा है। यह सब अलग-अलग घटनाएँ नहीं हैं। इनके पीछे एक व्यापक आर्थिक दृष्टिकोण दिखाई देता है, जिसे समझना जरूरी है।

दीपावली और धनतेरस पर जब लोग अपनी बचत, सोने-चाँदी की कीमतों और खरीदारी का हिसाब लगाते हैं, तब उन्हें यह भी समझना चाहिए कि पिछले बारह वर्षों में उनकी जेब से कितने अलग-अलग रास्तों से पैसा निकाला गया है। और आने वाले वर्षों में यह वसूली कितनी बढ़ सकती है।

1. बैंक में आपका पैसा, लेकिन वसूली के रास्ते अनेक

सबसे पहले अपने बैंक खाते से शुरुआत कीजिए। पैसा आपका है, बैंक में जमा भी आपका है, लेकिन उस पैसे को रखने और इस्तेमाल करने के लिए आपको बैंक को लगातार शुल्क देना पड़ता है।

खाता खुलवाने के बाद से ही वसूली के अलग-अलग रास्ते शुरू हो जाते हैं। न्यूनतम बैलेंस नहीं रखा तो जुर्माना, डेबिट कार्ड का वार्षिक शुल्क, क्रेडिट कार्ड का शुल्क, एटीएम से निर्धारित सीमा से अधिक निकासी पर चार्ज, एसएमएस अलर्ट का शुल्क, चेक बुक का शुल्क, चेक बाउंस होने पर जुर्माना, लोन की ईएमआई देर से चुकाने पर पेनल्टी और सेविंग तथा करंट अकाउंट के अलग-अलग सर्विस चार्ज।

यानी बैंक में अपना पैसा रखने के लिए भी आपको लगातार भुगतान करना पड़ता है।

न्यूनतम बैलेंस के नाम पर बैंकों की वसूली को लेकर समय-समय पर सवाल उठते रहे हैं। सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों ने न्यूनतम बैलेंस की शर्तों के उल्लंघन पर हजारों करोड़ रुपये का शुल्क वसूला है। संसद में भी इस विषय पर सवाल उठाए गए हैं। इसी तरह एसएमएस अलर्ट और अन्य बैंकिंग सेवाओं के नाम पर भी ग्राहकों से बड़ी रकम वसूली जाती है।

यहाँ सवाल केवल किसी एक बैंक का नहीं है। सवाल उस व्यवस्था का है जिसमें आम नागरिक अपनी मेहनत की कमाई बैंक में सुरक्षित रखने के लिए भी लगातार कीमत चुकाता है।

कभी सरकारी बैंक जनता की बचत को सुरक्षित रखने और आर्थिक गतिविधियों को प्रोत्साहित करने का माध्यम हुआ करते थे। आज बैंकिंग सेवाओं के व्यावसायीकरण ने ग्राहक और बैंक के संबंध को काफी हद तक बदल दिया है।

सरकारी बैंकों का विलय, बैंकिंग क्षेत्र का निजीकरण और कमजोर वित्तीय संस्थानों को निजी हाथों में सौंपने की प्रक्रिया इसी व्यापक बदलाव का हिस्सा है। आईडीबीआई बैंक इसका एक प्रमुख उदाहरण है।

दूसरी तरफ सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों से मिलने वाले लाभांश को सरकार अपने राजस्व का हिस्सा बनाती है। सरकारी वित्तीय संस्थाओं से रिकॉर्ड लाभांश प्राप्त होने पर सरकार इसे अपनी उपलब्धि बताती है, लेकिन यह सवाल अपनी जगह बना रहता है कि बैंकिंग व्यवस्था का वास्तविक लाभ आखिर किसे मिल रहा है—जमाकर्ता को या सरकार और वित्तीय संस्थानों को?

2. इथेनॉल ब्लेंडिंग: पर्यावरण और आयात घटाने के नाम पर किसकी जेब कट रही है?

अब पेट्रोल की तरफ आइए।

सरकार ने पेट्रोल में इथेनॉल मिलाने की नीति को बड़े उत्साह के साथ प्रचारित किया। इसे विदेशी मुद्रा बचाने, कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता घटाने और पर्यावरण संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया गया।

सैद्धांतिक रूप से इस नीति के अपने लाभ हो सकते हैं। लेकिन किसी भी नीति की सफलता केवल सरकार के खाते में होने वाली बचत से तय नहीं होती। यह भी देखना पड़ता है कि उसका खर्च कौन उठा रहा है और उसका वास्तविक लाभ किसे मिल रहा है।

ई20 यानी 20 प्रतिशत इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल के संदर्भ में सबसे महत्वपूर्ण सवाल वाहनों की अनुकूलता का है। इथेनॉल में पेट्रोल की तुलना में प्रति लीटर ऊर्जा कम होती है। इसलिए वाहन के माइलेज पर असर पड़ सकता है। पुराने या पर्याप्त रूप से अनुकूलित नहीं किए गए वाहनों में ईंधन प्रणाली के कुछ हिस्सों पर अतिरिक्त दबाव पड़ने की आशंका भी रहती है।

माइलेज में कमी, रखरखाव का बढ़ता खर्च और वाहन के कुछ पुर्जों की समय से पहले मरम्मत—इन सबका आर्थिक बोझ अंततः वाहन मालिक को उठाना पड़ता है।

कर्नाटक सरकार की ओर से इस विषय पर उठाए गए सवालों ने बहस को और गंभीर बनाया है। राज्य सरकार ने इथेनॉल मिश्रण के कारण वाहन मालिकों को होने वाले संभावित नुकसान, माइलेज में कमी और रखरखाव के अतिरिक्त खर्च की ओर ध्यान दिलाया है।

यहाँ मूल सवाल है कि यदि सरकार को इथेनॉल मिश्रण से विदेशी मुद्रा की बचत और आर्थिक लाभ हो रहा है, तो वाहन मालिकों को होने वाले अतिरिक्त खर्च का हिसाब कौन देगा?

सरकार आयात कम करने की उपलब्धि गिनाती है, लेकिन उपभोक्ता के माइलेज में कमी और वाहन के रखरखाव पर होने वाले अतिरिक्त खर्च को कौन गिनेगा?

इथेनॉल उत्पादन के लिए गन्ने और मक्के की मांग बढ़ने का एक दूसरा पहलू भी है। इसका असर कृषि भूमि, खाद्यान्न उत्पादन, पानी की उपलब्धता और भूजल संसाधनों पर पड़ सकता है। विशेषकर ऐसे क्षेत्रों में जहाँ सिंचाई पहले से ही भूजल पर निर्भर है, वहाँ इस नीति के दीर्घकालिक पर्यावरणीय प्रभावों का गंभीर अध्ययन आवश्यक है।

ब्राजील का उदाहरण दिया जाता है, जहाँ इथेनॉल मिश्रण की मात्रा काफी अधिक है। लेकिन यह नहीं बताया जाता कि ब्राजील ने 1975 में इस दिशा में शुरुआत करने के बाद दशकों तक वाहन तकनीक, ईंधन व्यवस्था और आवश्यक बुनियादी ढाँचे को विकसित किया। वहाँ की परिस्थितियों और भारत की परिस्थितियों में भी अंतर है।

नीति लागू करने से पहले वाहनों को अनुकूल बनाना, उपभोक्ताओं को पर्याप्त जानकारी देना और आवश्यक तकनीकी ढाँचा तैयार करना जरूरी था।

भारत में सवाल यही है कि क्या हम पहले ईंधन का मिश्रण बढ़ा रहे हैं और बाद में वाहनों तथा बुनियादी ढाँचे को उसके अनुकूल बनाने की कोशिश कर रहे हैं?

विकास का अर्थ यह नहीं हो सकता कि सरकार की बचत बढ़े और नागरिक का खर्च बढ़ जाए।

संसद में पेश की गई आधिकारिक रिपोर्ट और सरकारी डेटा पढ़ें।

http://NITI Aayog – Roadmap for Ethanol Blending in India 2020–25

3. सड़कें बढ़ीं, लेकिन टोल की वसूली उससे कहीं तेज बढ़ी

अब सड़कों की बात कीजिए।

2014 के आसपास राष्ट्रीय राजमार्गों की लंबाई लगभग 92 हजार किलोमीटर के आसपास थी। बाद के वर्षों में इसमें उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। सड़क निर्माण विकास का महत्वपूर्ण हिस्सा है और बेहतर सड़कों की आवश्यकता से इनकार नहीं किया जा सकता।

लेकिन सवाल यह है कि सड़क निर्माण के नाम पर जनता से कितनी वसूली हो रही है?

वर्ष 2014 में राष्ट्रीय राजमार्गों पर टोल वसूली लगभग छह हजार करोड़ रुपये के आसपास बताई जाती थी। बाद के वर्षों में यह रकम बढ़कर कई गुना हो गई। उपलब्ध सरकारी आंकड़ों के अनुसार 2024-25 में टोल संग्रह लगभग 70 हजार करोड़ रुपये के स्तर तक पहुँच गया।

यानी टोल वसूली में असाधारण वृद्धि हुई है।

सरकार कह सकती है कि सड़कें बढ़ी हैं, राजमार्गों का विस्तार हुआ है और बेहतर सुविधाएँ उपलब्ध कराई गई हैं। यह तर्क अपनी जगह सही हो सकता है। लेकिन सड़क नेटवर्क की वृद्धि और टोल वसूली की वृद्धि का तुलनात्मक अध्ययन भी जरूरी है।

क्या टोल दरों में वृद्धि, नई सड़कों पर टोल और मौजूदा सड़कों पर लगातार वसूली का पूरा हिसाब जनता के सामने रखा जाता है?

नागरिक पेट्रोल पर टैक्स देता है, वाहन खरीदते समय टैक्स देता है, सड़क पर निकलता है तो टोल देता है और वाहन के रखरखाव पर भी खर्च करता है।

आखिर सड़क पर चलने की कीमत इतनी अधिक क्यों होती जा रही है? संसद में पेश की गई आधिकारिक रिपोर्ट और सरकारी डेटा पढ़ें। http://National Highways Toll Collection Data Parliamentary Data: National Highways Toll Collection 2020–21 to 2024–25

4. सरकारी सुविधाओं से निजी मुनाफे तक: विकसित भारत का नया मॉडल?

अब जरा इस पूरी व्यवस्था को व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखिए।

शिक्षा, स्वास्थ्य, परिवहन, ऊर्जा, संचार और बुनियादी ढाँचा किसी भी कल्याणकारी राज्य की मूल जिम्मेदारियों में आते हैं। लेकिन पिछले वर्षों में इन क्षेत्रों में निजी क्षेत्र की भूमिका लगातार बढ़ी है।

सरकारी संस्थानों की क्षमता बढ़ाने के बजाय कई क्षेत्रों में निजी निवेश और निजी संचालन को विकास का प्रमुख आधार बनाया जा रहा है।

एयरपोर्ट, बंदरगाह, ऊर्जा परियोजनाएँ, सड़कें और अन्य सार्वजनिक परिसंपत्तियाँ निजी भागीदारी के लिए खोली जा रही हैं। सरकार का तर्क है कि इससे निवेश आएगा, दक्षता बढ़ेगी और बुनियादी ढाँचे का विकास होगा।

लेकिन इसके साथ एक बुनियादी प्रश्न भी जुड़ा है—जब सार्वजनिक परिसंपत्तियों का संचालन और उनसे होने वाला लाभ कुछ बड़े व्यावसायिक समूहों के हाथों में केंद्रित होता जाएगा, तब आम नागरिक के हितों की रक्षा कौन करेगा?

हवाई यात्रा महँगी होती है, रेल यात्रा का खर्च बढ़ता है, बिजली के बिल में नए-नए शुल्क जुड़ते हैं और शिक्षा तथा स्वास्थ्य का खर्च आम परिवार की क्षमता से बाहर जाने लगता है।

निजी क्षेत्र की भागीदारी अपने आप में गलत नहीं है। समस्या तब पैदा होती है जब सार्वजनिक हित की कीमत पर निजी मुनाफे को प्राथमिकता मिलने लगे।

किसी भी सरकार की सफलता का मूल्यांकन इस आधार पर होना चाहिए कि उसने नागरिकों को कितनी बेहतर और सस्ती सुविधाएँ उपलब्ध कराईं, न कि इस आधार पर कि उसने कितनी सार्वजनिक परिसंपत्तियों को निजी निवेश के लिए खोल दिया।

5. आय में 27 प्रतिशत वृद्धि और खर्च में 72 प्रतिशत बढ़ोतरी: आम आदमी का गणित

अब उस गणित पर आइए जो इस पूरे विमर्श का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है।

किसी भी परिवार की आर्थिक स्थिति समझने के लिए केवल उसकी आय में हुई वृद्धि देखना पर्याप्त नहीं है। यह भी देखना पड़ता है कि उस आय से वह पहले की तुलना में कितना सामान खरीद पा रहा है।

मान लीजिए किसी व्यक्ति की आय में 27 प्रतिशत वृद्धि हुई। लेकिन यदि उसकी रोजमर्रा की जरूरतों, सेवाओं और सुविधाओं की कीमतों में औसतन 72 प्रतिशत वृद्धि हो गई, तो आय में हुई बढ़ोतरी वास्तविक राहत नहीं देगी।

यहाँ 27 और 72 प्रतिशत के आंकड़ों को व्यापक आर्थिक दावे के रूप में प्रस्तुत करने से पहले उनकी गणना और स्रोत स्पष्ट होना जरूरी है। लेकिन इस तुलना का मूल संदेश बिल्कुल स्पष्ट है—आय और खर्च की वृद्धि में बड़ा अंतर हो तो नागरिक की वास्तविक क्रयशक्ति घटती है।

दिहाड़ी मजदूर की मजदूरी हो, दुकान चलाने वाले की कमाई हो, किसी निजी कंपनी में काम करने वाले कर्मचारी का वेतन हो या सफेदपोश नौकरी करने वाले व्यक्ति की आय—यदि आमदनी की वृद्धि महँगाई और सेवाओं के बढ़ते खर्च से पीछे रह जाती है, तो आर्थिक विकास का लाभ आम आदमी तक नहीं पहुँचता।

वह कागज पर विकास देखता है, लेकिन अपने घर के बजट में गिरावट महसूस करता है।

6. किसान: उत्पादन का जोखिम किसान का, मुनाफे का बड़ा हिस्सा कंपनियों का

कृषि क्षेत्र की स्थिति भी इसी आर्थिक मॉडल की एक महत्वपूर्ण कड़ी है।

किसान फसल उगाता है, मौसम का जोखिम उठाता है, महँगे बीज, खाद, डीजल और बिजली का खर्च करता है। फसल खराब होने पर नुकसान भी उसी का होता है।

सरकार किसानों को फसल बीमा का लाभ देने की बात करती है। लेकिन फसल बीमा योजनाओं में निजी बीमा कंपनियों की भूमिका, उनके प्रीमियम संग्रह, दावों के भुगतान और वास्तविक लाभ के बीच के अंतर पर लगातार सवाल उठते रहे हैं।

किसान को मुआवजा मिलने में देरी होती है, कई बार दावा अस्वीकार कर दिया जाता है, जबकि बीमा कंपनियों के कारोबार और वित्तीय स्थिति का विस्तार होता रहता है।

यहाँ यह देखना जरूरी है कि किसानों के नाम पर संचालित योजनाओं में सार्वजनिक धन का कितना हिस्सा वास्तव में किसानों तक पहुँचता है और कितना बीमा कंपनियों के राजस्व तथा मुनाफे में चला जाता है।

किसान को उचित मूल्य नहीं मिलता, प्राकृतिक आपदा पर पर्याप्त मुआवजा नहीं मिलता और कृषि लागत लगातार बढ़ती जाती है। दूसरी ओर, कृषि से जुड़े कारोबार में निजी कंपनियों की भूमिका बढ़ती जाती है।

यही वह विरोधाभास है जिसे समझे बिना कृषि सुधारों की वास्तविक तस्वीर सामने नहीं आ सकती।

7. लाभार्थी बनाम नागरिक: कल्याणकारी राज्य की अवधारणा पर चोट

अब एक क्षण के लिए उस व्यक्ति को याद कीजिए जो सरकार से अपनी मेहनत का उचित मूल्य चाहता है।

किसान को उसकी फसल का उचित मूल्य चाहिए, लेकिन उसे कभी-कभी दो हजार रुपये की किस्त देकर लाभार्थी बना दिया जाता है।

मजदूर को नियमित रोजगार चाहिए, लेकिन उसे पाँच किलो अनाज देकर लाभार्थी की श्रेणी में खड़ा कर दिया जाता है।

ग्रामीण परिवार को स्थायी आजीविका चाहिए, लेकिन रोजगार गारंटी की योजनाओं का बजट और उनका प्रभावी क्रियान्वयन लगातार सवालों के घेरे में रहता है।

मनरेगा जैसी योजना, जिसका उद्देश्य ग्रामीण परिवारों को काम का कानूनी अधिकार देना था, अब नए नाम और नई व्यवस्था के साथ सामने है। सवाल यह है कि क्या नाम बदलने से रोजगार की समस्या हल हो जाएगी?

पाँच किलो अनाज किसी गरीब परिवार के लिए जरूरी सहायता हो सकती है। सरकारी सहायता का विरोध करने का कोई कारण नहीं है। लेकिन सहायता को नागरिक के अधिकार और सम्मानजनक आजीविका का विकल्प बना देना खतरनाक है।

नागरिक को रोजगार चाहिए, शिक्षा चाहिए, स्वास्थ्य सुविधाएँ चाहिए, सामाजिक सुरक्षा चाहिए और अपने श्रम का उचित मूल्य चाहिए।

उसे हमेशा सरकारी सहायता की कतार में खड़ा रहने वाला लाभार्थी बनाकर नहीं रखा जा सकता।

कल्याणकारी राज्य नागरिक को आत्मनिर्भर बनाता है; लाभार्थी-केंद्रित राजनीति उसे सरकारी सहायता पर निर्भर बनाए रखने का जोखिम पैदा करती है।

8. शिक्षा और स्वास्थ्य: आम परिवार की पहुँच से बाहर होती बुनियादी सुविधाएँ

इस आर्थिक व्यवस्था का सबसे गंभीर असर शिक्षा और स्वास्थ्य पर दिखाई देता है।

जो माता-पिता अपने बच्चों को विश्वविद्यालय भेजना चाहते हैं, आईआईटी और आईआईएम में पढ़ाना चाहते हैं, मेडिकल शिक्षा दिलाना चाहते हैं या उच्च शिक्षा के माध्यम से उनका भविष्य सुरक्षित करना चाहते हैं, उनके सामने लगातार बढ़ती फीस और अन्य खर्च बड़ी चुनौती बनते जा रहे हैं।

सरकारी शिक्षा संस्थानों की गुणवत्ता और क्षमता बढ़ाना सरकार की प्राथमिकता होनी चाहिए। लेकिन यदि अच्छी शिक्षा का रास्ता लगातार निजी संस्थानों की ओर जाता है, तो आर्थिक रूप से कमजोर और मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए अवसर सीमित होते जाएँगे।

यही स्थिति स्वास्थ्य क्षेत्र में भी है।

बीमारी किसी की आर्थिक स्थिति देखकर नहीं आती। लेकिन इलाज का खर्च व्यक्ति की आर्थिक स्थिति को पूरी तरह बदल सकता है। निजी अस्पतालों में इलाज, जाँच, दवाइयाँ और अस्पताल में भर्ती होने का खर्च अनेक परिवारों को कर्ज के जाल में धकेल देता है।

सरकार का दायित्व केवल स्वास्थ्य बीमा योजनाओं की घोषणा करना नहीं, बल्कि ऐसी सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था विकसित करना है जिसमें हर नागरिक को सस्ता और गुणवत्तापूर्ण इलाज मिल सके।

शिक्षा और स्वास्थ्य को बाजार के भरोसे छोड़ देने वाला देश आर्थिक रूप से कुछ लोगों को समृद्ध तो बना सकता है, लेकिन सामाजिक रूप से विकसित नहीं हो सकता।

9. रोजगार, एआई और तकनीकी निर्भरता: भविष्य की चुनौतियों के लिए हम कितने तैयार हैं?

देश के सामने रोजगार का संकट भी उतना ही गंभीर है।

एक तरफ पर्याप्त रोजगार के अवसर उपलब्ध नहीं हैं। दूसरी तरफ जिन लोगों के पास रोजगार है, उनकी वास्तविक आय में अपेक्षित वृद्धि नहीं हो रही है।

अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई के कारण रोजगार के अनेक पारंपरिक क्षेत्रों में बदलाव आने वाला है। इससे सफेदपोश नौकरियों, सेवा क्षेत्र, बैंकिंग, आईटी और अन्य पेशों में नई चुनौतियाँ पैदा होंगी।

लेकिन सवाल है कि क्या भारत ने इस बदलाव के लिए पर्याप्त तैयारी की है?

ऑटोमोबाइल उद्योग से लेकर इलेक्ट्रॉनिक्स और रक्षा उत्पादन तक, आधुनिक तकनीक के लिए सेमीकंडक्टर चिप्स और रेयर अर्थ मिनरल्स की महत्वपूर्ण भूमिका है। इन क्षेत्रों में भारत की आयात पर निर्भरता और घरेलू उत्पादन क्षमता की सीमाएँ अभी भी गंभीर चुनौती हैं।

ऊर्जा, गैस, उर्वरक, इलेक्ट्रॉनिक्स और उच्च तकनीक के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता के दावों के साथ यह भी देखना होगा कि देश वास्तव में अपनी उत्पादन क्षमता कितनी बढ़ा पाया है।

केवल विदेशी कंपनियों को आमंत्रित कर देना आत्मनिर्भरता नहीं है। आत्मनिर्भरता का अर्थ है घरेलू तकनीक, अनुसंधान, उत्पादन, कुशल मानव संसाधन और रोजगार का विस्तार।

10. कॉरपोरेट का बढ़ता प्रभाव और सत्ता के साथ बनता नया गठजोड़

इस पूरे आर्थिक मॉडल में एक और सवाल लगातार सामने आता है—देश की आर्थिक शक्ति आखिर कितने हाथों में केंद्रित होती जा रही है?

बड़े कॉरपोरेट समूहों का विस्तार अपने आप में असामान्य नहीं है। लेकिन जब अर्थव्यवस्था के महत्वपूर्ण क्षेत्रों में कुछ चुनिंदा कंपनियों का प्रभाव बहुत अधिक बढ़ने लगे, तब प्रतिस्पर्धा, पारदर्शिता और सार्वजनिक हित को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है।

एयरपोर्ट, बंदरगाह, ऊर्जा, दूरसंचार, खनन और बुनियादी ढाँचे जैसे क्षेत्रों में बाजार की शक्ति का केंद्रीकरण किसी भी लोकतंत्र के लिए चिंता का विषय होना चाहिए।

सवाल यह भी है कि क्या सरकार निजी निवेश को प्रोत्साहित करते हुए प्रतिस्पर्धा और जवाबदेही सुनिश्चित कर रही है?

जब किसी बड़े कारोबारी समूह का आर्थिक प्रभाव इतना बढ़ जाए कि वह राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक विमर्श में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाने लगे, तब यह केवल कारोबार का मामला नहीं रह जाता। यह लोकतांत्रिक जवाबदेही और आर्थिक शक्ति के संतुलन का प्रश्न बन जाता है।

किसी भी लोकतंत्र में सरकार को कॉरपोरेट के सामने नहीं, बल्कि नागरिकों के प्रति जवाबदेह होना चाहिए।

देश की अर्थव्यवस्था का उद्देश्य कुछ कारोबारी समूहों को इतना शक्तिशाली बनाना नहीं हो सकता कि सार्वजनिक नीतियाँ उनके हितों के इर्द-गिर्द घूमने लगें।

11. अमेरिका के साथ व्यापार समझौते से लेकर घरेलू उद्योग तक: किसके हित सुरक्षित हैं?

भारत की अंतरराष्ट्रीय व्यापार नीति भी इसी परिप्रेक्ष्य में देखी जानी चाहिए।

अमेरिका सहित विभिन्न देशों के साथ व्यापार समझौतों पर बातचीत होती है। इन समझौतों से निर्यात, निवेश और बाजार के नए अवसर पैदा हो सकते हैं। लेकिन इनके प्रभाव का आकलन केवल बड़े उद्योगों के दृष्टिकोण से नहीं किया जा सकता।

भारतीय किसान, छोटे व्यापारी और सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम यानी एमएसएमई भी इस अर्थव्यवस्था के महत्वपूर्ण आधार हैं।

यदि किसी व्यापार समझौते के कारण विदेशी उत्पादों को घरेलू बाजार में अधिक प्रतिस्पर्धात्मक लाभ मिलता है, तो छोटे घरेलू उत्पादकों पर दबाव बढ़ सकता है।

इसी तरह ऊर्जा और खनन क्षेत्र में आयातित संसाधनों की बढ़ती उपलब्धता का असर घरेलू उद्योग और रोजगार पर पड़ सकता है।

सरकार को यह स्पष्ट करना चाहिए कि व्यापार समझौतों में भारतीय किसानों, घरेलू उद्योगों और छोटे उद्यमों के हितों की रक्षा के लिए क्या प्रावधान किए जा रहे हैं।

वैश्विक बाजार से जुड़ना जरूरी है, लेकिन अपने घरेलू उत्पादकों की कीमत पर नहीं।

12. आर्थिक केंद्रीकरण के साथ लोकतांत्रिक संस्थाओं की जवाबदेही भी कमजोर नहीं होनी चाहिए

इस पूरे विमर्श का सबसे गंभीर पहलू केवल अर्थव्यवस्था तक सीमित नहीं है।

लोकतंत्र में संसद, न्यायपालिका, निर्वाचन आयोग और अन्य संवैधानिक संस्थाओं की स्वतंत्रता तथा जवाबदेही उतनी ही महत्वपूर्ण है जितनी आर्थिक नीतियों की पारदर्शिता।

जब जनता के सामने रोजगार, महँगाई, आरक्षण, शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक सुरक्षा जैसे गंभीर प्रश्न खड़े हों, तब सरकार को इनका जवाब देना चाहिए।

मतदाता सूची, नागरिकता से जुड़े दस्तावेजों और मतदान के अधिकार जैसे विषय भी अत्यंत संवेदनशील हैं। किसी भी नागरिक को उसके संवैधानिक अधिकारों से वंचित करने की प्रक्रिया पारदर्शी, न्यायसंगत और कानून के अनुरूप होनी चाहिए।

निर्वाचन आयोग की भूमिका, न्यायपालिका की निगरानी और संसद की जवाबदेही लोकतंत्र की बुनियादी शर्तें हैं।

यदि राजनीतिक सत्ता, आर्थिक शक्ति और सार्वजनिक संस्थाओं के बीच संतुलन कमजोर पड़ता है, तो लोकतंत्र केवल चुनाव कराने तक सीमित रह सकता है।

लोकतंत्र का अर्थ केवल पाँच साल में एक बार वोट डालना नहीं है। इसका अर्थ है कि सरकार हर दिन जनता के प्रति जवाबदेह रहे।

किसी मंत्री का कोई गीत गाना या राजनीतिक बयान देना अपने आप में बड़ा प्रश्न नहीं है। बड़ा प्रश्न यह है कि कानून और संस्थाओं का संचालन संविधान के अनुसार हो रहा है या राजनीतिक सत्ता की इच्छाओं के अनुसार।

13. विकसित भारत की असली कसौटी क्या है?

अब मूल प्रश्न पर लौटिए।

क्या विकसित भारत का अर्थ यह है कि सरकार का राजस्व लगातार बढ़ता जाए, कॉरपोरेट का मुनाफा रिकॉर्ड स्तर पर पहुँच जाए, सार्वजनिक परिसंपत्तियों का निजीकरण होता रहे और आम नागरिक अपनी हर बुनियादी जरूरत के लिए बाजार पर निर्भर होता जाए?

क्या विकास का अर्थ यह है कि बैंक में अपना पैसा रखने के लिए शुल्क देना पड़े, सड़क पर चलने के लिए टोल देना पड़े, पेट्रोल खरीदने के बाद वाहन के रखरखाव का अतिरिक्त खर्च उठाना पड़े, शिक्षा के लिए कर्ज लेना पड़े और बीमारी के इलाज के लिए अपनी जीवनभर की बचत खर्च करनी पड़े?

यदि यही विकास है तो फिर इस विकास की कीमत कौन चुका रहा है?

किसी देश की अर्थव्यवस्था तभी मजबूत मानी जा सकती है जब उसकी जनता आर्थिक रूप से मजबूत हो। जब किसान कर्ज और अनिश्चितता से मुक्त हो, मजदूर को सम्मानजनक मजदूरी मिले, युवाओं को रोजगार मिले, बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिले और नागरिकों को सस्ता तथा सुलभ स्वास्थ्य उपलब्ध हो।

विकसित देश वह नहीं होता जहाँ कुछ कंपनियों की संपत्ति लगातार बढ़ती रहे। विकसित देश वह होता है जहाँ आम नागरिक की क्रयशक्ति बढ़े, आर्थिक असमानता कम हो और सार्वजनिक सुविधाएँ हर व्यक्ति की पहुँच में हों।

विचारवाणी पर पूर्व में प्रकाशित एक अन्य लेख भी यहाँ पढ़ सकते हैं।

https://vicharvani.com/vikasit-bharat-2047/

निष्कर्ष: जनता नागरिक है, केवल लाभार्थी नहीं

पिछले बारह वर्षों की आर्थिक नीतियों का मूल्यांकन केवल जीडीपी, राजस्व संग्रह, शेयर बाजार और कॉरपोरेट मुनाफे के आधार पर नहीं किया जा सकता। यह देखना होगा कि आम नागरिक की जिंदगी कितनी आसान हुई है।

उसके बैंक खाते में कितना पैसा बचा है? उसकी आय की तुलना में खर्च कितना बढ़ा है? उसके बच्चों की शिक्षा कितनी सुलभ हुई है? उसे इलाज के लिए कितनी कीमत चुकानी पड़ रही है? किसान की आमदनी कितनी बढ़ी है? युवाओं को कितने रोजगार मिले हैं? और सबसे महत्वपूर्ण, देश की आर्थिक शक्ति का लाभ कितने लोगों तक पहुँच रहा है?

यदि इन सवालों के जवाब संतोषजनक नहीं हैं, तो केवल विकसित भारत का नारा वास्तविक विकास का प्रमाण नहीं बन सकता।

सरकार का काम जनता से अधिक से अधिक राजस्व वसूलना भर नहीं है। उसका दायित्व नागरिकों के जीवन को बेहतर बनाना है। बाजार को बढ़ावा देना सरकार की नीति हो सकती है, लेकिन बाजार को जनता के अधिकारों से ऊपर नहीं रखा जा सकता।

आज आवश्यकता इस बात की है कि विपक्ष केवल सत्ता की राजनीतिक गलतियों पर सवाल उठाने तक सीमित न रहे। उसे एक वैकल्पिक आर्थिक दृष्टि प्रस्तुत करनी होगी। ऐसी दृष्टि जिसमें सार्वजनिक शिक्षा और स्वास्थ्य मजबूत हों, रोजगार के अवसर बढ़ें, किसानों को उचित मूल्य मिले, एमएसएमई सुरक्षित रहें, बैंकिंग सेवाएँ आम नागरिक के लिए सुलभ हों और निजी निवेश के साथ सार्वजनिक जवाबदेही भी सुनिश्चित हो।

कर्नाटक, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश या किसी अन्य राज्य में यदि बेहतर आर्थिक और सामाजिक मॉडल विकसित हो रहा है, तो उसे राष्ट्रीय बहस का हिस्सा बनाया जाना चाहिए। केवल दिल्ली की सत्ता और राजनीतिक बयानबाजी के इर्द-गिर्द विपक्ष की राजनीति सीमित नहीं रह सकती।

क्योंकि असली सवाल सत्ता में कौन बैठा है, केवल इतना नहीं है। असली सवाल यह है कि सत्ता किसके लिए काम कर रही है?

इस दीपावली पर जब आप अपने घर में लक्ष्मी पूजा करें, अपनी बचत गिनें और भविष्य की योजनाएँ बनाएँ, तो एक बार यह हिसाब भी जरूर लगाइएगा कि पिछले बारह वर्षों में आपकी जेब से कितने रास्तों से पैसा निकला है और आने वाले बारह वर्षों में इसकी कीमत कितनी हो सकती है।

आखिर जनता ने सरकार इसलिए नहीं चुनी थी कि वह हर कदम पर उससे वसूली करे। जनता ने सरकार इसलिए चुनी थी कि वह उसके जीवन को बेहतर बनाए।

विकसित भारत का सपना जनता की समृद्धि से पूरा होगा, जनता की जेब खाली करके नहीं।

और यही इस पूरे आर्थिक मॉडल के सामने सबसे बड़ा सवाल है—क्या भारत विकसित हो रहा है, या भारत की जनता को विकसित होने की कीमत चुकाने के लिए मजबूर किया जा रहा है?

 

सरकार नागरिक को अधिकार देने के बजाय लाभार्थी बना रही है और सार्वजनिक संसाधनों से निजी आर्थिक शक्ति का विस्तार हो रहा है। बैंकिंग वसूली से शुरू होकर इथेनॉल, टोल, निजीकरण, कृषि, शिक्षा, स्वास्थ्य और लोकतांत्रिक जवाबदेही तक पहुँचने वाली इसकी व्यापकता है। यही विचार पूरे आलेख को एक सामान्य राजनीतिक आलोचना से उठाकर एक गंभीर आर्थिक और जनपक्षीय संपादकीय बनाता है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *