वोट चोरी का सिस्टम: चुनाव आयोग के भीतर गड़बड़ी की कहानी

मामला क्या है?

वोट चोरी का सिस्टम पकड़ा गया है। यह सिस्टम कहीं और नहीं, चुनाव आयोग के भीतर पकड़ा गया है। इसी को लेकर इंडियन एक्सप्रेस में बड़ी रिपोर्ट छपी है। जब किसी अखबार में पहले पन्ने पर चुनाव आयोग से जुड़ी चार-चार खबरें छप जाएं, तो समझ लीजिए खतरे की घंटी बज गई है। अपने कानों में तेल मत डालिए। सीट बेल्ट खोल लीजिए और लोकतंत्र को बचाने मैदान में उतर आइए।

रतिका चोपड़ा और दामिनी नाथ की पहली ही रिपोर्ट 1932 शब्दों की है। एक-एक शब्द इस चोरी की तरफ इशारा कर रहा है। वोटर लिस्ट को मैनेज करने वाले सॉफ्टवेयर को कौन छेड़ रहा है? इसकी कहानी सुनेंगे तो पांव ठंडे पड़ जाएंगे। गेट योर कॉफी रेडी।

चुनाव आयुक्तों की असहमति: 10 महीने में 14 बार

आयोग के भीतर कोई देख रहा था कि वोटर लिस्ट में डांका पड़ रहा है, छेड़छाड़ की जा रही है। मगर जो देख रहा था, उसने एफआईआर नहीं कराई, इस्तीफा नहीं दिया, जनता को बताया भी नहीं। मगर फाइलों में दर्ज करता चला गया। यही प्रक्रिया है, नियम है और शायद इतनी ही हिम्मत बची होगी। वो भी कम नहीं, काबिले तारीफ है। तभी तो आप वो सारी फाइलें वोट की डकैती के सबूत के तौर पर देख पा रहे हैं।

10 महीने में 14 बार दो-दो चुनाव आयुक्तों ने मुख्य चुनाव आयुक्त से असहमति जाहिर की है। इस कहानी के तीन किरदार हैं—चुनाव आयुक्त एस एस संधू, चुनाव आयुक्त वी के जोशी। दोनों पहले अपनी संस्था के मुखिया मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार से शिकायत करते हैं। फाइलों में अपनी असहमति दर्ज कराते हैं। यह भी लिख देते हैं कि अवैध रूप से काम हो रहा है, अनऑथराइज्ड काम हो रहा है।

फॉर्म सिक्स का मुद्दा

फॉर्म सिक्स को लेकर दोनों ने लिखा—इसमें जो बदलाव हुआ, अवैध और गैरकानूनी है। फॉर्म सिक्स में जोड़े गए सवाल अवैध हैं। मतदाता या उसके माता-पिता को पिछले एसआईआर से लिंक करने वाला सवाल गैरकानूनी है। यह सवाल बिना कानून में संशोधन किए नहीं पूछा जा सकता। यह बदलाव मतदाता की पहचान को संदेह में डालता है। तब फिर बिना कानूनी प्रक्रियाओं का पालन किए हुए इसे कैसे जोड़ दिया गया? आज तक यह सवाल फॉर्म सिक्स में बना हुआ है। कुछ नहीं हुआ।

कैबिनेट सचिव को पत्र: चौथा किरदार

फिर दोनों इन्हें पत्र लिखते हैं और यह इस कहानी के चौथे किरदार हैं—टीवी सोमनाथन, कैबिनेट सचिव, भारत का कैबिनेट सचिव। प्रधानमंत्री का दरवाजा होता है, आंख, कान, नाक होता है। जवाबदेही इनसे भी मांगी जानी चाहिए। लेकिन इसी साल इनकी नौकरी एक साल के लिए बढ़ा दी गई है। कुर्सी चाहिए, कुर्सी मिल गई, लोकतंत्र लूट गया। उसका क्या?

चार लोगों के बीच कुर्सियां बांटकर भारत का लोकतंत्र क्या लूटा जा सकता है? क्या चार लोग कुर्सी की खातिर लोकतंत्र को बेच सकते हैं? दिमाग में तरह-तरह के सवाल गूंजने लगे हैं। पूरा वीडियो ध्यान से देखिएगा। शक इन दोनों पर है—मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार, कैबिनेट सचिव टीवी सोमनाथन। एक लोकतंत्र का चौकीदार, एक सरकार का पहरेदार और चौकीदार चोर है—का नारा भारत की राजनीति में इस बार सिस्टम के दरवाजे लौट आया है। इस बार आयोग के दफ्तर के सामने चीख रहा है।

राहुल गांधी की प्रेस कॉन्फ्रेंस: पहले से उठाए सवाल

7 अगस्त 2025 को राहुल गांधी वोट चोरी की पहली प्रेस कॉन्फ्रेंस दिल्ली में करते हैं। कर्नाटका के महादेवपुरा में वोट जोड़े जाने की बात करते हैं, सवाल उठाते हैं। 1 महीने बाद आलंद विधानसभा की सीट को लेकर प्रेस कॉन्फ्रेंस करते हैं। इस सीट पर कांग्रेस जीत गई है। फिर भी यहां अचानक जिस तरह से वोट काटे गए, उसी पर राहुल सवाल उठाते हैं। और 1 साल बाद अलग-अलग तरीके से यही बात चुनाव आयुक्त एस एस संधू और वी के जोशी करने लग जाते हैं। अपने पत्रों में सवाल उठाते हैं, मुख्य चुनाव आयुक्त को लिखते हैं, मोदी सरकार के कैबिनेट सचिव को लिखते हैं।

दोनों का कहना है—चुनाव आयोग के पास वोटर लिस्ट मैनेज करने का जो सॉफ्टवेयर है, जिस सॉफ्टवेयर पर देश के पहरेदार यानी वोटर का डाटा होता है, उसकी सुरक्षा पर उन्हें शक हो रहा है। इसी शक को एक साल पहले राहुल ने साफ-साफ शब्दों में और उनके अनुसार सबूतों के साथ रख दिया था।

सेंट्रलाइज्ड सिस्टम से वोटर डिलीशन

अगस्त 2025 की प्रेस कॉन्फ्रेंस के बाद राहुल 18 सितंबर 2025 को प्रेस कॉन्फ्रेंस करते हैं। आज क्या है? 23 सितंबर 2026, इंडियन एक्सप्रेस के पहले पन्ने पर केवल इन्हीं सब बातों की रिपोर्ट छपी है। राहुल गांधी सेंट्रलाइज तरीके से वोटर के नाम गायब करने की बात कर रहे थे। कर्नाटका में कांग्रेस की जीत हुई थी। इस डकैती को सामने लाने का फर्ज अदा कर रहे थे। मीडिया राहुल का मजाक उड़ाता है।

वोटर लिस्ट का सॉफ्टवेयर कॉम्प्रोमाइज हो गया है। जिस तरह से उसका केंद्रीयकरण हुआ है, वह रिगिंग के खिलाफ बनाए गए सभी सुरक्षा सिस्टम को कमजोर कर रहा है। चुनाव आयुक्त ही इसे लेकर सवाल उठा रहे हैं। क्या आप इसका मतलब समझते हैं?

राहुल ने कहा था—अचानक से नाम जोड़ दिए गए, अचानक से नाम गायब कर दिए गए। नागराज जी, इन्होंने दो एप्लीकेशन 36 सेकंड में फाइल कर दी और मजे की बात देखिए, ये 4:00 सुबह उठके फाइल कर रहे हैं। पता नहीं क्या हुआ। 4:00 बजे सुबह कहा कि भैया मैं दो वोटर को डिलीट करूंगा और कितने 36 सेकंड में डिलीट कर दे, फिर सो गए।

हमारे माइंड में पहले सवाल था कि क्या इलेक्शन कमीशन भी सो रहा है। मगर नहीं। सोया कोई नहीं है। जगे हुए हैं। सिस्टमैटिकली मदद हो रही है। और टारगेट करके कांग्रेस वोटर्स को डिलीट किया गया। ये गोदाबाई जी हैं। इनके नाम पर 12 वोटर्स डिलीट किए गए। इनको मालूम ही नहीं, इनको पता ही नहीं कि इन्होंने 12 वोटर्स डिलीट किए।

मुख्य चुनाव आयुक्त का ड्रामा

एक साल पहले जब राहुल गांधी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस की थी, तब मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने एक ड्रामा किया। क्या ड्रामा? इस तरह से बात की जैसे दुनिया को लगे ज्ञानेश कुमार सही हैं, राहुल गांधी गलत हैं। ज्ञानेश ने राहुल से कहा—देश से माफी मांगो। राहुल ने माफी नहीं मांगी। बात भुला दी गई। हलफनामा देना होगा या देश से माफी मांगनी होगी। तीसरा विकल्प नहीं है।

एक्सप्रेस की रिपोर्ट के बाद देश से किसे माफी मांगनी चाहिए? किसे इस्तीफा देना चाहिए? स्वतंत्र जांच की मांग को आमंत्रित करना चाहिए। किसे? डू यू गेट माय पॉइंट? और स्टिल प्रिटेंडिंग टू नॉट गेटिंग माय पॉइंट।

ईसीआई नेट का लॉन्च: 22 जनवरी 2026

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, 22 जनवरी को चुनाव आयोग ईसीआई नेट लॉन्च करता है। 1 अरब मतदाताओं के लिए डाटा बेस लाया जाता है। आयोग के 40 से ज्यादा ऐप और पोर्टल ईसीआई नेट में शामिल कर दिए जाते हैं। सेंट्रलाइज हो जाता है। लॉन्च के समय ज्ञानेश कुमार कहते हैं—ईसीआई नेट का निर्माण कानून के दायरे में हुआ है। आयोग में आईटी विंग की निदेशक सीमा खन्ना कहती हैं—ईसीआई नेट पूरे सिस्टम की पारदर्शिता बढ़ाएगा, लोगों का विश्वास मजबूत करेगा।

सीमा खन्ना कौन है? इंडियन एक्सप्रेस किस सीमा खन्ना की बात कर रहा है? हमने चुनाव आयोग के YouTube चैनल पर जाकर सीमा खन्ना को खोजा। आप भी इन्हें पहचानिए। सीमा खन्ना ने इसी साल जनवरी में इस नए सिस्टम को लॉन्च करते हुए आपको कितने सपने दिखाए, वही सपने अब सवालों के घेरे में एक्सप्रेस के पन्ने पर नजर आ रहे हैं।

ईआरओ का एक्सेस रोका गया

ईसीआई नेट के लॉन्च के वक्त ज्ञानेश कुमार ने कहा—ईसीआई नेट, इफ आई हैव टू पुट इट इन वन वर्ड, इट इज़ समथिंग व्हिच इज़ वॉकिंग, रनिंग एंड फ्लाइंग। ऑल एट द सेम टाइम। इट इज़ बीइंग यूटिलाइज्ड बाय द इलेक्टर्स, द इलेक्शन ऑफिशियल्स, द मीडिया एंड द सिटीजंस एट लार्ज ऑल एट द सेम टाइम।

इसी को लेकर कितने सवाल अब आपके सामने हैं। आपको बताया गया—नागरिक इसका इस्तेमाल कर रहा है। लेकिन यह नहीं बताया गया—इस सिस्टम का पीछे से कौन इस्तेमाल कर रहा है, किसके लिए कर रहा है।

जिले से चुनाव व्यवस्था से जुड़े अधिकारी, जिन्हें आप ईआरओ कहते हैं, शिकायत कर रहे हैं। राज्यों में हर विधानसभा के स्तर पर एसडीएम इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर का काम करता है। ईआरओ को कानून के तहत मतदाता सूची में नाम जोड़ने और हटाने का अधिकार होता है। वही अधिकारी सेंट्रलाइज सिस्टम को एक्सेस नहीं कर पा रहा। उन्हीं के लिए दरवाजा बंद कर दिया गया। उन्हें पता नहीं चल रहा बंद दरवाजे के भीतर क्या हो रहा है। यानी जमीन से जो अधिकारी डाटा डाल रहे हैं, वही नहीं देख पा रहे कि उनका डाला गया डाटा उड़ गया या शामिल है। वो आयोग के सिस्टम के भीतर के आदमी हैं, मगर इस सॉफ्टवेयर के सिस्टम से बाहर कर दिए गए हैं।

इसी को लेकर दो-दो चुनाव आयुक्त कहते हैं—दिल्ली में सीमा खन्ना की टीम ईआरओ का एक्सेस रोक देती है। दोनों ने इसे लेकर ज्ञानेश कुमार से तीन-तीन बार शिकायत की।

ऑडिट की मांग

29 मई 2026 को चुनाव आयुक्त विवेक जोशी और चुनाव आयुक्त एस एस संधू, मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयोग में डिप्टी सेक्रेटरी संजय कुमार को पत्र लिखते हैं कि पूरे सिस्टम की ऑडिट की जाए। आईआईटी से एक्सपर्ट बुलाए जाएं ताकि यह सर्टिफाई हो सके कि उचित अधिकारी के अलावा कोई भी वोटर के डेटाबेस में बदलाव नहीं कर सके। इस समय जोशी और संधू प्रस्ताव देते हैं कि ऐसी समितियां बनाई जाएं जो इस बात को चेक करती रहें कि उचित अधिकारी ही वोटर डेटाबेस में बदलाव कर पाए।

तो आज यह तय हो गया है कि मेजॉरिटी ज्ञानेश कुमार के साथ नहीं थी। ज्ञानेश कुमार अपनी मनमर्जी से फैसले करते थे। किस तरह इलेक्शन चलाना है, क्या ईआरओ को करना है, कौन सा फॉर्म फाइल करना है—यह तय करते थे ज्ञानेश कुमार। जोशी साहब और संधू साहब, जो इलेक्शन कमिश्नर्स हैं, कई बार उन्होंने विरोध किया कि जो आप कर रहे हो, ज्ञानेश कुमार जी, यह संवैधानिक नहीं है, कानून के मुताबिक नहीं है। लगभग 14 बार 10 महीने में विरोध किया।

कितना गंभीर आरोप है, सवाल है। आयोग के किसी सूत्र पर भरोसा मत कीजिए। सामने आकर जवाब का इंतजार कीजिए। गोदी मीडिया सूत्रों के हवाले से माहौल बनाएगा, इस डकैती की खबर को मैनेज करेगा। जिस तरह से राम मंदिर में हुई डकैती की खबर मैनेज कर ली गई। इस बार आप मैनेज मत होना।

चुनाव आयोग का बचाव

जब सूत्रों को लेकर सवाल उठने लगे, तब चुनाव आयोग को बयान जारी करना पड़ा और इस पर भी दस्तखत डिप्टी निदेशक पी पवन के हैं। इनका कहना है कि आयोग के जो भी एक्शन हैं, कानून और आयोग के निर्देशों के तहत लिए गए हैं। 2023 के कानून के तहत फैसले लिए गए। ड्राफ्ट के स्तर पर कमीशन का कोई भी सदस्य सवाल कर सकता है। यह सामान्य प्रक्रिया है। जो भी सुझाव दिए गए, चुनावी प्रक्रिया को सुधारने के लिए दिए गए। मतभेद होना नॉर्मल बात है। 10 महीने के अंतराल में मतभेदों को हाईलाइट किया जा रहा है, मगर सहमतियां भी हैं। इससे एक ही तस्वीर सामने आती है—ईसीआई नेट का प्रोटोकॉल एकदम सख्त है, कोई छेड़खानी नहीं कर सकता।

चुनाव आयोग के इस जवाब में जलेबी बनाई गई है। तीन चुनाव आयुक्तों के अधिकार बराबर के होते हैं। इनमें से दो सवाल उठा रहे हैं। यानी बहुमत विरोध में है, सवाल के पक्ष में है। आयोग इन्हें रूटीन बताकर खारिज कर रहा है। मगर यह सारे सवाल दोनों चुनाव आयुक्तों के रूटीन नहीं हैं।

डाटा के केंद्रीकरण का मतलब

डाटा के केंद्रीकरण (सेंट्रलाइजेशन) होने का आप क्या मतलब समझेंगे? यह काम एक्सप्रेस की रिपोर्टर रतिका चोपड़ा ने आपके लिए आसान कर दिया है। समझिए, उन्होंने लिखा है—आपको क्यों इस खबर को लेकर चिंतित होना चाहिए? क्योंकि वोटर लिस्ट में आने के लिए आप योग्य हैं, सभी शर्तों को पूरा करते हैं, सभी तरह की पात्रता रखते हैं। यही काफी नहीं। इसके बाद भी आपका नाम वोटर लिस्ट से उड़ा दिया जा सकता है। जैसे गोवा में हुआ। 97 लोगों ने साबित कर दिया कि वोटर लिस्ट में उनका नाम होना चाहिए क्योंकि वे सभी शर्तों को पूरा करते हैं। जिस अधिकारी के सामने दावा किया, वो मान भी गया, लेकिन दिल्ली से कंट्रोल हो रहा सॉफ्टवेयर उनका नाम वोटर लिस्ट में नहीं जोड़ता है।

और इसका मतलब यह हुआ कि जो आईटी सेल है, जिसमें कोई भी अधिकारी बैठा हुआ है, ज्ञानेश कुमार के अधीन, वो तय करेगा कि कौन डिलीट होगा और कौन ऐड होगा। यह हो रहा है इलेक्शन कमीशन में। पहली बात तो यह। दूसरी बात, सारे फैसले बाय मेजरिटी होने चाहिए। और अगर दो इलेक्शन कमिश्नर ने विरोध किया है इस बात का कि आप ऐसा नहीं करना, आपको ऐसा करना चाहिए, तो उसको नजरअंदाज किया गया और यह मामले इलेक्शन कमीशन के सामने आए ही नहीं।

रतिका बताती हैं कि आप इस बात पर भरोसा करते हैं कि वोटर लिस्ट कोई नहीं बदल सकता, उस पर किसी का कंट्रोल नहीं होता। हर विधानसभा में एक अफसर होता है। देश भर में हजारों अफसर होते हैं। इतना कोई मैनेज नहीं कर पाएगा। लेकिन सेंट्रलाइज सिस्टम से हजारों-हजारों अफसरों का भी अधिकार छीन लिया गया। जो अफसर आपके वोट के अधिकार की रक्षा के लिए बनाए गए हैं। अब जाकर समझ आ रहा है कि क्यों चुनाव आयोग ने दशकों से मतदाता सूची को अपडेट करने के काम का केंद्रीयकरण नहीं किया। एक आदमी, एक सॉफ्टवेयर के हवाले नहीं किया।

ईआरओ का एक्सेस और आईटी विभाग का नियंत्रण

अब जो दूसरा प्रश्न माननीय संधू जी और जोशी जी ने पूछा कि लिखित रूप से मेरे को तो भयानक लगता है सुनके कि हजारों एआरओ ने कंप्लेंट की है कि हम अपने चुनाव आयोग के पोर्टल को एक्सेस नहीं कर पा रहे। उसका नाम है ईआरओ नेट पोर्टल। क्यों? क्योंकि एक माननीय महिला को आदेश मिला है, निश्चित रूप से आदेश ही रहा होगा, जो आईटी डिपार्टमेंट की हेड है चुनाव आयोग में, कि ईआरओस को रिस्ट्रिक्टेड एक्सेस दिया जाए। यह अगस्त में चिट्ठी लिखी। कहा कि यह कैसे हो सकता है? कहा कि सबको दिया जाए। जवाब चुप्पी। रूल्स रेगुलेशन में कोई बदलाव नहीं है। यह माननीय मुख्य चुनाव आयुक्त का तानाशाही का एक दूसरा या तीसरा उदाहरण है। इसका दुष्प्रभाव सोचिए। लाखों ईआरओ अंतिम बदलाव अगर इंक्लूड करते हैं, इस महिला को या इस व्यक्ति को खुद नहीं कर सकते। कहीं न कहीं उसको रुकावट है। ये लिखित है। मैं नहीं बोल रहा हूं।

रतिका चोपड़ा कहती हैं कि जब यह सिस्टम लाया गया, ईआरओ के अधिकार को कुचलने का, तो तीन चुनाव आयुक्तों में दो का पता ही नहीं। यह डकैती है, यह डरावना है, यह शर्मनाक है कि भारत जैसे महान लोकतंत्र में हुआ हो रहा है। भारत के लोकतंत्र की महानता को हर लिया गया। उसका चीर हरण हो गया है।

संधू के पत्र: 4 नवंबर 2025

4 नवंबर 2025 को चुनाव आयुक्त एस एस संधू के कहने पर डिप्टी चुनाव आयुक्त संजय कुमार, सीमा खन्ना और आयोग के वरिष्ठ अधिकारियों को एक पत्र लिखते हैं कि ईआरओ, डीईओ और सीईओ के कानूनी दायित्व का निर्वाह उनके अलावा और कोई नहीं कर सकता। यानी उनका काम कोई और नहीं कर सकता। आईटी सिस्टम को सख्ती से कानून का पालन करना होगा। इसमें किसी को छूट नहीं दी जा सकती।

5 महीने बाद 16 अप्रैल 2026 को चुनाव आयुक्त एस एस संधू इस बात को दर्ज करते हैं ऑन रिकॉर्ड कि आईटी डिवीजन ने पिछले कुछ महीनों में बहुत से नए मॉड्यूल और पोर्टल बना लिए हैं, जिन्हें आयोग की जानकारी में नहीं लाया गया। ऐसे संधू यहां तक लिखते हैं—मुझे इन नए-नए बदलाव के बारे में मीडिया से पता चल रहा है। चुनाव आयोग के आयुक्त कहते हैं नए बदलाव के बारे में उन्हें मीडिया से पता चल रहा है। फिर किस लिए हैं? इतना अंधेरा किस लिए? कौन से गुनाह को छुपाने के लिए? ज्ञानेश कुमार की जवाबदेही अभी तय होनी चाहिए। चुनाव आयोग के आईटी विभाग की कहानी रहस्य की तरह क्यों नजर आ रही है? वहां सब कुछ ठीक नहीं लगता। संदेह ही संदेह नजर आता है।

मनीष गर्ग का मामला

28 जुलाई को सीनियर डिप्टी चुनाव आयुक्त मनीष गर्ग को प्रशासन का अतिरिक्त भार दे दिया जाता है। कुछ ही घंटे में मनीष गर्ग काम के बंटवारे में बदलाव कर देते हैं। आयोग से राय मशवरा किए बिना डिप्टी चुनाव आयुक्त संजय कुमार को आईटी विभाग के डीजी की निगरानी के काम से हटा देते हैं। चुनाव आयुक्त एस एस संधू और विवेक जोशी जिस निगरानी की चैन की मांग कर रहे थे, वही चैन हटा दी जाती है। अगले ही दिन 29 जुलाई को दोनों कैबिनेट सचिव टीवी सोमनाथन को पत्र लिखते हैं कि गर्ग का आर्डर अवैध था। मनीष गर्ग के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए और 30 जुलाई को संधू और जोशी गर्ग के आर्डर को रद्द कर देते हैं।

14 अगस्त 2026: संधू का खुलासा

टीवी सोमनाथन को पत्र लिखने के 2 हफ्ते के बाद 14 अगस्त 2026 को एस एस संधू इस बात को रिकॉर्ड पर ले आते हैं कि मतदाता सूची को मेंटेन करने की कानूनी जिम्मेदारी राज्यों में मुख्य निर्वाचन अधिकारी, जिला निर्वाचन अधिकारी यानी डीएम और ईआरओ यानी एसडीएम की है। लेकिन इनमें से कई ने उन्हें बताया है कि उनके पास ईआरओ नेट का पूरा एक्सेस नहीं है। वे अपना काम ठीक से नहीं कर पा रहे। दिल्ली में आयोग के आईटी विभाग के डीजी के स्तर पर ईआरओ नेट के केंद्रीयकरण के कारण उनकी शक्तियां कम हो गई हैं।

संधू लिखते हैं—यह बहुत अजीब बात है कि एक्सेस का सारा कंट्रोल आईटी के पास है, जबकि आईटी विभाग के डीजी के पास इसका कोई कानूनी अधिकार नहीं कि वह किसी का एक्सेस रोक सके। इतना अवैध काम चुनाव आयोग के भीतर कैसे हो सकता है?

आपके लिए यह जानना जरूरी है

आपके लिए यह जानना बहुत जरूरी है। आपकी विधानसभा में जो ईआरओ होता है, उसी के पास अधिकार होता है जांचने का कि आप सही वोटर हैं या नहीं। आप उसका नाम जानते हैं, दफ्तर का पता जानते हैं, उसके पास जा सकते हैं। वह सहमत हो सकता है, सुधार कर सकता है। लेकिन इसके बाद भी सेंट्रलाइज्ड सिस्टम से आपका नाम कट सकता है। ईआरओ आपके वोट के अधिकार की रक्षा नहीं कर सकता। कागज पर आज भी ईआरओ ही हर नाम पर फैसला ले रहा है। मगर पिछले 10 महीने में ऐसे कई मौके सामने आए जब ईआरओ सॉफ्टवेयर के साथ बेसिक काम नहीं कर पाए। लोगों का नाम नहीं जोड़ पाए, हटा नहीं पाए। किसी फैसले को पलट नहीं पाए। किसी की अपील प्रोसेस नहीं हो पाई।

निष्कर्ष

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट एक नहीं है, चार-चार हैं और एक ही पन्ने पर छपी हैं और सभी में अलग-अलग सवाल उठाए गए हैं। आयोग जर्जर नजर आ रहा है। उसके भीतर की दीवारों से सफेदी दरक चुकी है। आपके लोकतंत्र का और आपका भविष्य खतरे में है।

एक वीडियो में सारी खबरों को समेटना संभव नहीं। एसआईआर पर आपने ध्यान न देकर बहुत बड़ी गलती कर दी। मीडिया ने भी 13 करोड़ लोगों का चेहरा गायब कर दिया। उनकी कहानी ऐसे गायब कर दी जैसे रातोंरात 13 करोड़ लोग अपने बिस्तर से उठे और समंदर में समा गए। उन्हीं सब की कहानी लौट आई है। यह खबर बताते हुए अच्छा नहीं लगा। हम जिस पर भरोसा करते थे, भरोसा टूट गया।

लोकतंत्र लुट गया। आप चुप कैसे रह सकते हैं?

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