राहुल गांधी का ज्ञानेश कुमार को सरकारी गवाह बनने का सुझाव
मुख्य बयान और सलाह
राहुल गांधी ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को पद छोड़कर सरकारी गवाह बनने की सलाह दी है। राहुल ने कहा किज्ञानेश ने देश के साथ गद्दारी की है और इसकी सजा यही है कि वे पद छोड़ दें, सरकारी गवाह बन जाएं और मुकदमे मेंसहयोग करें। उनके खिलाफ देशद्रोह का मुकदमा चलेगा और साथ–साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तथा गृह मंत्री अमित शाह केखिलाफ भी जांच की जाएगी।
कांग्रेस की प्रतिबद्धता
राहुल गांधी ने स्पष्ट किया कि कांग्रेस पार्टी चुप नहीं रहेगी और न ही चुप बैठ सकती है। उन्होंने कहा कि ज्ञानेश कुमार कोबात समझ लेनी चाहिए। उनके दो जूनियर अधिकारियों ने बहुत अच्छा काम किया है और एक प्रकार से उन्होंने यह स्वीकारकर लिया है कि चुनाव चोरी किए जा रहे हैं। राहुल ने कहा, “यह एक अपराध है। ज्ञानेश कुमार को सरकारी गवाह बन जानाचाहिए, क्योंकि देर हो चुकी है। मैं आपको बता दूं कि इसके परिणाम होंगे।“
चेतावनी और संकल्प
राहुल गांधी ने चेतावनी दी कि यह मत सोचिए कि कांग्रेस पार्टी और विपक्ष हिंदुस्तान के वोट को, बीजेपी को, नरेंद्र मोदी जीको, ज्ञानेश कुमार जी को, नेशनल फ्रेमवर्क को, लीगल स्ट्रक्चर को खत्म होने देगा। हम यहां बैठे चुप नहीं रहेंगे। हमारी पार्टीआजादी के लिए लड़ी थी। हम नहीं चुप बैठेंगे। सब लोगों को सोच–समझकर काम लेना है।
देशद्रोहियों को सजा मिलेगी
राहुल गांधी ने कहा कि देशद्रोहियों को सजा मिलेगी। हमारे पास पहले से ही पर्याप्त जानकारी है। चिंता न करें, आप अगलेदो–तीन–चार महीनों में देखेंगे कि क्या होने वाला है, क्योंकि जानकारी हमारे पास उपलब्ध है। मैं भारत की जनता, कांग्रेसपार्टी और विपक्ष की ओर से यह प्रतिबद्धता जता रहा हूं कि मिस्टर मोदी और मिस्टर शाह की इस अपराध के लिए जांच होगी।चाहे कुछ भी हो जाए, हम इस अपराध को अनुत्तरित नहीं जाने देंगे।
वोट की पवित्रता और संविधान
राहुल गांधी ने बताया कि वोट भारत की बुनियाद है। सब कुछ वोट पर टिका है—संविधान भी, जिससे कानून बनता है, औरजिस कानून से हमारी संस्थाएं चलती हैं। अगर वोट ही पवित्र नहीं रहा और वोट चोरी हो रही है, तो चोरी से चुनाव जीतकर जोसांसद और विधायक बन रहे हैं, वे जो भी कानून बना रहे हैं, वे सारे कानून अवैध हैं। उनके बनाए कानून और नियमों से चलनेवाली संस्थाएं तथा उन संस्थाओं के पद पर बैठे लोग अवैध हैं।
राहुल ने विस्तार से समझाया कि वोट से संविधान को शक्ति मिलती है। संविधान कहता है कि हर व्यक्ति के पास एक वोटहै। जब हम वोट डालते हैं, तो हम संविधान में ऊर्जा और शक्ति डालते हैं। संविधान से कानून बनते हैं, वोट से कानून बनते हैं।राज्यसभा और विधानसभाओं में जो लोग बैठते हैं, वे वोट से आते हैं। यह एक श्रृंखला है—संविधान, संविधान से कानून, कानून से हमारी सब संस्थाएं। अगर आपने वोट खत्म कर दिया, तो न संविधान का कोई मतलब है, न कानून का, न हिंदुस्तानकी किसी संस्था का।
वोट चोरी की साजिश
राहुल गांधी ने कहा कि अब पूरे देश को पता चल रहा है कि हमारे वोट को नष्ट कर दिया गया है। यह काम किसने किया? यह जो सात तस्वीरें हैं, इन लोगों ने किया है। ऊपर साजिशकर्ता हैं क्योंकि यह साजिश है, देश के खिलाफ साजिश है। ऊपरसाजिशकर्ता हैं, नीचे मोहरे हैं। साजिशकर्ताओं ने वोट चोरी की, वोट चोरी से कानून चोरी की, और कानून चोरी के बाद संस्थाचोरी की और संस्थाओं में सारे आरएसएस के लोग भर दिए—शिक्षा प्रणाली में, नौकरशाही में, न्यायपालिका में। यह वोट चोरीके बिना कभी नहीं हो सकता था।
चुनाव आयोग पर सवाल
राहुल गांधी ने कहा कि वोटर लिस्ट पर चुनाव आयोग का नियंत्रण खत्म हो चुका है और वोटर लिस्ट की साख मिट चुकी है।कांग्रेस पार्टी 2023 से यह सवाल उठा रही है। ज्ञानेश कुमार की नियुक्ति से लेकर उसके बाद के तमाम चुनावों के बाद कांग्रेसने प्रेस कॉन्फ्रेंस की और वोट चोरी के सबूत दिए। मगर इस बार चुनाव आयोग के भीतर से ही उन्हीं बातों को कहा जा रहा है।
राहुल ने कहा कि वे तीन साल से यह कह रहे हैं और हर बार सबूत दिए हैं—हरियाणा में, महाराष्ट्र में, कर्नाटक में। दिसंबर2023 में प्रधानमंत्री ने एक नया कानून बनाया जो ज्ञानेश कुमार को इम्युनिटी देता है और उन्हें कानूनी प्रणाली से बाहर करदेता है। यह किसने किया? हिंदुस्तान के प्रधानमंत्री ने किया। क्यों किया? क्योंकि ज्ञानेश कुमार उनके लिए कोई काम कररहे थे, जो दो चुनाव आयुक्तों ने स्पष्ट रूप से बता दिया है।
समयरेखा और सबूत
राहुल गांधी ने समयरेखा प्रस्तुत की। 7 फरवरी और 17 फरवरी को उन्होंने प्रधानमंत्री को पत्र और डिसेंट नोट दिया कि हमज्ञानेश कुमार को चुनाव आयुक्त के रूप में स्वीकार नहीं करते। उनकी राय को बायपास कर दिया गया और प्रधानमंत्री तथागृह मंत्री ने ज्ञानेश कुमार को चुना। राहुल ने दोहराया कि ज्ञानेश कुमार पर नियंत्रक हैं और वे स्वतंत्र रूप से काम नहीं कर रहेहैं।
अपने पत्र में राहुल ने लिखा कि स्वतंत्र चुनाव आयोग का सबसे मौलिक पहलू यह है कि चुनाव आयुक्त और मुख्य चुनावआयुक्त के चयन की प्रक्रिया कार्यपालिका से स्वतंत्र होनी चाहिए। यह प्रक्रिया निष्पक्ष होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि यहप्रक्रिया स्वतंत्र नहीं है और इस पर प्रधानमंत्री तथा गृह मंत्री का दबाव है।
इसके बाद महादेवपुरा का वोट चोरी प्रेजेंटेशन हुआ, 15 दिन की वोट चोरी यात्रा हुई, और फिर आलंद में वोट चोरी काप्रेजेंटेशन दिया गया जिसमें दिखाया गया कि यह केंद्रीकृत तरीके से कराया जा रहा है और चुनाव आयोग ही करा रहा है।
दो चुनाव आयुक्तों का पत्र
इसके बाद दो चुनाव आयुक्तों ने पत्र लिखना शुरू किया। राहुल ने कहा कि वे यह समयरेखा इसलिए दे रहे हैं क्योंकि इससेपहले इन दोनों ने कुछ नहीं कहा—न महाराष्ट्र प्रेस कॉन्फ्रेंस पर, न इम्युनिटी कानून पर, न डिसेंट नोट पर, न माधेपुरा वोटचोरी पर, न वोट अधिकार यात्रा पर, न आलन वोट चोरी पर। उसके बाद पत्र शुरू हुए, क्योंकि उन्हें बात समझ आ रही थी कियह खेल कहां खत्म होगा।
रोचक बात यह है कि हरियाणा वोट चोरी के प्रेस कॉन्फ्रेंस की घोषणा उसी दिन थी जिस दिन उन्होंने पत्र लिखना शुरू किया।आज इंडियन एक्सप्रेस में एक्सपोज आया है कि 14 बार, 10 महीनों में दो चुनाव आयुक्तों ने रिकॉर्ड में मुख्य चुनाव आयुक्त केबारे में नाम जोड़ने और हटाने पर आपत्ति जताई, जो कांग्रेस का मूल सवाल था। किसी ने जवाब नहीं दिया। प्रेस कॉन्फ्रेंस मेंतीनों बैठे थे और कहा कि इसमें कुछ नहीं है।
लोकतंत्र पर आक्रमण
राहुल गांधी ने कहा कि देश एक नई जगह पहुंच गया है। हमारे इतिहास में इस प्रकार से लोकतंत्र पर ऐसा आक्रमण नहीं हुआहै। उनकी प्रेस कॉन्फ्रेंस सुनकर अफसोस हो रहा था कि हमारा देश यहां क्यों पहुंचा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जीत पर इतनेगंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। दुनिया क्या कहेगी कि जिस भारत ने वोट से प्रधानमंत्री चुना जब उसके पास घर में जलाने के लिएलालटेन तक नहीं थी, आज उस भारत में बिजली है, सब कुछ है, और बीजेपी तथा प्रधानमंत्री मोदी पर वोट चोरी से चुनावजीतने के आरोप लग रहे हैं।
इस बात से हर किसी का मन दुखी होना चाहिए। सबसे ज्यादा बीजेपी के समर्थकों और कार्यकर्ताओं को अफसोस होनाचाहिए। एक जमाना था जब चुनाव जीतने पर बीजेपी के कार्यकर्ताओं की मेहनत और रणनीति की तारीफ होती थी। आजउन्हीं कार्यकर्ताओं की बात नहीं हो रही, बल्कि चुनावी जीत पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। क्या बीजेपी के समर्थकों को यहजानकर अच्छा लग रहा है कि एसआईआर के जरिए वोट चोरी से चुनाव जीते जा रहे हैं? बीजेपी के कार्यकर्ता को भी स्वीकारकरना मुश्किल होगा और करना भी नहीं चाहिए। उन्हें भी सवाल करना चाहिए कि क्या उनकी पार्टी वोट चोरी से जीत रही है, एसआईआर के जरिए विरोधी वोटों को काटकर चुनाव जीत रही है। वर्तमान में और इतिहास में बीजेपी के कार्यकर्ताओं औरसमर्थकों के लिए इस तरह की जीत का बोझ ढोना बहुत मुश्किल हो जाएगा।
एंटी–इनकंबेंसी का रहस्य
राहुल गांधी ने अपनी प्रेस कॉन्फ्रेंस में गृह मंत्री अमित शाह के पुराने बयान चलाए जिनमें वे दावा करते हैं कि वे 30 साल, 50 साल तक सत्ता में रहेंगे। राहुल ने कहा कि कोई भी नेता ऐसा दावा नहीं कर सकता। वे राजनीतिक परिवार से आते हैं और 50 साल से राजनीति देख रहे हैं। कोई भी नेता इस देश में यह बात नहीं कर सकता।
उन्होंने उदाहरण दिए कि इंदिरा गांधी बांग्लादेश का युद्ध जीतती हैं, देश की सबसे लोकप्रिय प्रधानमंत्री हैं, फिर भी दो–तीनसाल में भयंकर एंटी–इनकंबेंसी आती है। वाजपेई जी के खिलाफ, मनमोहन सिंह जी के खिलाफ, राजीव गांधी के खिलाफ—कोई ऐसा प्रधानमंत्री नहीं है जिसके खिलाफ एंटी–इनकंबेंसी नहीं आई हो। नॉन–बीजेपी मुख्यमंत्री भी नहीं मिलेगा जिसकेखिलाफ एंटी–इनकंबेंसी न आई हो। तमिलनाडु में डीएमके आती थी तो एडीएमके आती है। यूपी में सपा आती है फिर बसपाआती है। हरियाणा में एक के बाद एक पार्टियां बदलती हैं। मगर बीजेपी के खिलाफ, नरेंद्र मोदी के खिलाफ एंटी–इनकंबेंसी हैही नहीं, गायब हो गई।
2014 में जीतते हैं, 5 साल बाद उससे बड़े धमाके से जीतते हैं, उसके 5 साल बाद फिर जीतते हैं। गुजरात में नॉनस्टॉप सरकारचली जा रही है, मध्य प्रदेश में, हरियाणा में एंटी–इनकंबेंसी गायब हो गई। इसका क्या कारण है? सालों से हम यह सवाल पूछरहे हैं कि यह जो हिंदुस्तान की सबसे पावरफुल राजनीतिक शक्ति है, नरेंद्र मोदी और अमित शाह पर एंटी–इनकंबेंसी क्यों नहींलगती? जवाब दो दिन पहले दो चुनाव आयुक्तों ने दिया।
विपक्ष की एकजुटता
राहुल गांधी ने कहा कि विपक्ष वोट चोरी को लेकर 100% सहमत है, कोई विरोध नहीं। फिर भी राहुल गांधी ने आंदोलन काऐलान नहीं किया। कांग्रेस पार्टी और विपक्ष वोट चोरी नहीं होने देगी। उन्होंने कहा कि बीजेपी के भीतर भी लोग वोट चोरी कीबात स्वीकार करने लगे हैं।
चंडीगढ़ मेयर चुनाव का उदाहरण
सुधांशु त्रिवेदी बूथ लूटने का उदाहरण दे रहे थे, जबकि उन्हें चंडीगढ़ के मेयर के चुनाव का उदाहरण देना चाहिए था—कैसे वहचुनाव लूटा गया जबकि सब कुछ सीसीटीवी कैमरे में रिकॉर्ड हुआ था और उस लूट के साथ कौन लोग खड़े थे, उनका नामसुधांशु त्रिवेदी को बताना चाहिए था।
चुनाव आयोग का मौन
जिस दिन रतिका चोपड़ा की रिपोर्ट आई, उस दिन चुनाव आयोग ने एक बयान जारी किया। उसमें रिपोर्ट में उठाए गए सवालोंका कहीं भी खंडन नहीं किया गया। यह तक नहीं कहा गया कि इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट गलत और भ्रामक है। क्यों नहींकिया गया? यह सवाल सुधांशु त्रिवेदी को चुनाव आयोग से पूछना चाहिए। आरोप चुनाव आयोग पर लगता है, तो सुधांशुत्रिवेदी क्यों प्रेस कॉन्फ्रेंस करते हैं? यह सवाल उन्हें खुद से और बीजेपी से पूछना चाहिए और बीजेपी को चुनाव आयोग सेपूछना चाहिए कि आयोग क्यों चुप है? आप पर इतने आरोप लग रहे हैं।
सुधांशु त्रिवेदी इस तरह की बात क्यों कर रहे हैं कि अखबार में चुनाव आयुक्तों के बयान नहीं हैं, इसलिए उस बयान के आधारपर राहुल गांधी का कहा हुआ हर बात गलत है। आयुक्तों के पत्रों के आधार पर इंडियन एक्सप्रेस ने अपनी रिपोर्ट लिखी है।वही पत्र तो बयान है। दोनों चुनाव आयुक्तों ने बाहर आकर नहीं कहा कि पत्र गलत है, हमने ऐसा कोई पत्र नहीं लिखा।इंडियन एक्सप्रेस ने बयान के लिए उन्हें ईमेल भी किया, जवाब नहीं आया। अगर आयोग जवाब नहीं देगा तो क्या स्टोरीबेमानी हो जाएगी?
यह कांग्रेस बनाम बीजेपी का मामला नहीं
यह मामला कांग्रेस बनाम बीजेपी का नहीं है। पिछले साल दिसंबर में अभिषेक बनर्जी ने चुनाव आयोग की आईटी विभाग कीमहानिदेशक सीमा खन्ना पर गंभीर आरोप लगाए थे। फरवरी 2025 के दिल्ली चुनाव में अरविंद केजरीवाल ने हजारों वोटरोंके नाम काटे जाने को लेकर आरोप लगाए थे। आयोग पर बहुत आरोप लगे। चिंता बीजेपी को भी करनी चाहिए।
एसआईआर और वोट कटौती
एसआईआर में 13 करोड़ लोगों के वोट कट गए। पश्चिम बंगाल में 27 लाख वोटरों को वोट नहीं देने दिया गया, उनके वोट काअधिकार छीन लिया गया। इसका फायदा किसे हुआ होगा? इन सब सवालों का जवाब यह नहीं हो सकता कि किसी जमानेमें बूथ लूटा जाता था।
इतिहास बोध
जब कोई मुख्य चुनाव आयुक्त बनता है, वह यही समझता है कि भारत के इतिहास का हिस्सा हो रहा है। क्या ज्ञानेश कुमार केभीतर यह इतिहास बोध नहीं रहा होगा? क्या यह इतिहास बोध मिट चुका है? उन्हें एहसास है कि किस पद पर हैं और इस पदपर पहुंचकर जनता के बीच उनके बारे में किस तरह की बातें हो रही हैं।
मसला यह नहीं कि ज्ञानेश को फर्क पड़ता है या नहीं। मसला यह है कि जनता को फर्क पड़ रहा है। वह संदेह करने लगी है।सवाल उसके मन में उठ रहे हैं। मुख्य चुनाव आयुक्त को लेकर ऐसी बातें क्यों हो रही हैं? वह जानना चाहती है।

