जब आपका दोस्त प्रधानमंत्री हो, तो क्या होता है?
जब आपका दोस्त प्रधानमंत्री हो, तो क्या होता है? 17 मार्च 2026 को एनसीएलटी, इलाहाबाद के एक कोर्ट रूम में एक आदेश पारित होता है, और भारत के कॉर्पोरेट इतिहास की पूरी टाइमलाइन दो हिस्सों में बँट जाती है।
टेबल पर फाइल थी—जयप्रकाश एसोसिएट्स, शॉर्ट में जे.ए.एल. की। एक ऐसी कंपनी, जिस पर बैंकों का ₹57,000 करोड़ बकाया था। नियम सीधा होना चाहिए था: जो कंपनी दिवालिया हुई है, उसे नीलाम कर दो; जो सबसे ज्यादा पैसे दे, उसे वह कंपनी बेच दो।
वेदांता ने करीब ₹12,505 करोड़ की नेट प्रेजेंट वैल्यू यानी एनपीवी की बोली लगाई। लेकिन विजेता घोषित कौन हुआ? अडानी एंटरप्राइजेज। प्लान 93.81% वोटों से पास हुआ। क्यों? क्योंकि एक संस्था है—एनएआरसीएल—जिसके पास अकेले 82% से ज्यादा वोटिंग पावर थी। उसने तय किया कि क्वालिटेटिव स्कोर और अपफ्रंट कैश, वेदांता के ऊँचे एनपीवी से ज्यादा जरूरी हैं।
मीडिया का नैरेटिव और न्यूज़लॉन्ड्री की रिपोर्ट
आपने न्यूज़ चैनल खोले, जिनमें एक अडानी जी का भी चैनल है। आपको बताया गया कि भारत का पावर और इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर रिवाइव हो रहा है। फँसी हुई कंपनियों को एक मसीहा मिल गया है। लेकिन आज हम उस नैरेटिव को पीच से फाड़ने की कोशिश करेंगे।
मेरे पास उन 26 कंपनियों के इनसॉल्वेंसी डेटा का एक स्ट्रक्चर है। न्यूज़लॉन्ड्री ने अभी उस पर एक रिपोर्ट पब्लिश की है, जिनके जरिए एक ग्रुप ने भारत के दिवालिया बाजार से 61.5% का स्ट्राइक रेट हासिल किया। औसतन ₹1.31 लाख करोड़ के दावों के बदले बैंकों को सिर्फ ₹33,000 करोड़ मिले हैं। बाकी ₹97,700 करोड़ हेयर कट बन गए।
आज के इस एपिसोड के आखिर तक आप यह जान पाएंगे कि कमेटी ऑफ क्रेडिटर्स का वह कौन-सा गुप्त कमरा है, जहाँ देश की जनता का ₹97,000 करोड़ एक लीगल वेल्थ ट्रांसफर के जरिए मोनोपोली में बदल दिया गया। हम आपको आईबीसी की धारा 30 के सब-सेक्शन (5) का वह क्लॉज भी दिखाने की कोशिश करेंगे, जिसने इस पूरे खेल को संवैधानिक लॉन्ड्री मशीन बना दिया।
आईबीसी का वादा और कमर्शियल विजडम का जन्म
अगर बीमारी समझनी है, तो उस दिन में जाना होगा जब यह वायरस लैब में बना था। साल 2016 में भारत के सरकारी बैंक एनपीए यानी नॉन-परफॉर्मिंग एसेट के बोझ तले अपनी आखिरी साँसें गिन रहे थे। तब संसद में मोदी जी इनसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड यानी आईबीसी लेकर आए।
उस वक्त के गजट नोटिफिकेशन और संसदीय बहसों को अगर आप पलटेंगे, तो वादा किया गया था कि जो प्रमोटर बैंकों का पैसा खाकर बैठे हैं, उनसे कंपनी छीन ली जाएगी। पारदर्शी नीलामी होगी और बैंकों को उनका ज्यादा से ज्यादा पैसा वापस मिलेगा—वैल्यू मैक्सिमाइजेशन।
लेकिन जब यह कानून जमीन पर उतरा, तो इसने एक नया कानूनी टर्म जन्म दिया—कमर्शियल विजडम। सुप्रीम कोर्ट ने के. शशिधर और एसआर स्टील जैसे ऐतिहासिक फैसलों में एक अवैध दीवार खड़ी कर दी। कोर्ट ने कहा कि दिवालिया कंपनी को कितने में बेचना है, यह तय करने का एकाधिकार सिर्फ और सिर्फ लेनदारों की समिति यानी सीओसी का है। जब तक धारा 30(2) का कोई तकनीकी उल्लंघन न हो, वह ट्रिब्यूनल यह पूछ ही नहीं सकता कि हजारों करोड़ की संपत्ति कौड़ियों के दाम में क्यों बेची जा रही है।
मेनस्ट्रीम मीडिया इस कमर्शियल विजडम के अंधेरे को कभी नहीं दिखाएगा। वह आपको कॉर्पोरेट रेस्क्यू की पीआर स्टोरी बेचता रहता है, सुबह से लेकर शाम तक। लेकिन हकीकत यह है कि यह रेस्क्यू नहीं है। यह कैपिटलिज्म का श्मशान घाट है, जहाँ मुर्दों के कफन बेचकर नया साम्राज्य खड़ा किया जा रहा है।
विदर्भ पावर प्लांट: स्विस चैलेंज और एकल सीओसी
इस थ्योरी को जमीन पर टेस्ट करते हैं। पहले नागपुर जाइए। विदर्भ इंडस्ट्रीज पावर प्लांट—600 मेगावाट का यह प्लांट कभी रिलायंस पावर का हुआ करता था। सितंबर 2024 में इसे नीलाम करने की प्रक्रिया शुरू होती है। लेकिन यहाँ नीलामी सामान्य नहीं होती। यहाँ स्विस चैलेंज मॉडल लाया जाता है और अडानी पावर को एंकर बिडर घोषित कर दिया जाता है।
जानते हैं एंकर बिडर का मतलब क्या होता है? इसका मतलब है कि अगर कोई और कंपनी इसे खरीदना चाहती है, तो उसे अडानी से कम से कम ₹50 करोड़ ऊपर की बोली लगानी है। और अगर कोई लगा भी दे, तो अंत में अडानी को उस बोली को मैच करने का मैचिंग राइट मिलेगा। यह ऐसा रेस ट्रैक है, जहाँ एक धावक को फिनिश लाइन से सिर्फ 10 मीटर पहले खड़ा कर दिया गया है।
लेकिन ज़रा रुककर सोचिए: क्या कहानी यहीं खत्म हो गई? नहीं। इस ₹4,000 करोड़ के प्लान को पास करने के लिए जो कमेटी यानी सीओसी बैठी थी, उसमें कितने सदस्य थे? 10-20 नहीं, सिर्फ एक—सीएफएम एसेट रीकंस्ट्रक्शन। जब पूरी कमेटी में वोटर ही एक है, तो रेजोल्यूशन प्लान 100% वोट से ही पास होगा।
भ्रष्टाचार नहीं, लेजिटिमेसी? और जनता पर पड़ने वाला बिल
आप स्क्रीन के इस पार बैठे हैं। आपके दिमाग में एक ही शब्द गूँज रहा होगा—भ्रष्टाचार। आपको लग रहा होगा कि कोई मंत्री किसी अधिकारी को फोन कर रहा है। सूटकेस इधर से उधर हो रहे हैं।
अगर आप इस पूरी क्रोनोलॉजी को क्रोनी कैपिटलिज्म या सूटकेस वाला भ्रष्टाचार कह रहे हैं, तो आप इस सिस्टम की बौद्धिक क्षमता का अपमान कर रहे हैं; बेइज्जत कर रहे हैं। भ्रष्टाचार रिस्की होता है। उसमें डर होता है कि कहीं पकड़े न जाएँ। जो यह हो रहा है, वह भ्रष्टाचार नहीं है। यह लेजिटिमेसी है। यह 100% लीगल है।
और इसका असर सिर्फ किसी दूर नागपुर के पावर प्लांट पर ही नहीं पड़ता। जब बैंक ₹57,700 करोड़ का हेयर कट लेते हैं, तो वह घाटा उनकी बैलेंस शीट पर आता है। उस घाटे को पाटने के लिए बैंक क्या करते हैं? वे आपके सेविंग अकाउंट का इंटरेस्ट रेट गिराते हैं। वे आपके होम लोन की ईएमआई बढ़ाते हैं। सरकार उन बैंकों को बचाने के लिए टैक्स के पैसे से रिकैपिटलाइजेशन करती है।
यानी जब एक पावर प्लांट कौड़ियों के भाव में बिकता है और अडानी उसे खरीदते हैं, तो उसका इनडायरेक्ट बिल आप चुकाते हैं—छोटी-छोटी चीजें खरीदकर।
एचडीआईएल और बीकेसी: कम कीमत पर रेजोल्यूशन
अगर विदर्भ का केस आपको लीगल लगता है, तो अब हम उस लक्ष्मण रेखा को पार करने वाले हैं, जहाँ नैतिकता पूरी तरह खत्म हो चुकी है; पूरी तरह दम तोड़ चुकी है।
मुंबई की एचडीआईएल कंपनी 2019 से बैंकरप्सी में फँसी हुई थी। कुल दावे करीब ₹7,800 करोड़। दांव पर मुंबई की प्राइम रियल एस्टेट—बांद्रा-कुर्ला कॉम्प्लेक्स (BKC) और शहाद/कल्याण की जमीनें—हैं। मार्केट में इन जमीनों की वैल्यू हजारों करोड़ की है।
लेकिन एनसीएलटी के पास जो अप्रूवल आता है, उसमें BKC के रेजोल्यूशन प्लान की कीमत कितनी है, जानते हैं? मात्र ₹3 करोड़; और कल्याण की जमीन की करीब ₹64 करोड़। और इस इकलौते आईबीसी कंप्लायंट यानी बोलीदाता का नाम क्या है, जानते हैं? अडानी प्रॉपर्टीज। 66.08% वोटों से यह प्लान पास हो गया। जो लेनदार इस डील के खिलाफ थे, उन्हें कई जगह शून्य या लिक्विडेशन वैल्यू के बराबर पैसा मिला।
धारा 30(5) और धारा 35: बोलीदाता का ही वोट?
अब मैं आपको एक डार्क मैटर दिखाने जा रहा हूँ, जिसके बारे में कोई बात नहीं करता। आईबीसी की धारा 30 का सब-सेक्शन (5)। यह कानून एक ऐसी अजीबोगरीब खिड़की खोलता है, जिसकी आप कल्पना भी नहीं कर सकते।
मान लीजिए कि मैं एक कंपनी खरीद रहा हूँ। लेकिन उस डूबती हुई कंपनी में मैंने पहले से कुछ पैसा उधार दिया हुआ है। धारा 35 मुझे यह अधिकार देती है कि मैं एक रेजोल्यूशन एप्लीकेंट होते हुए भी कमेटी ऑफ क्रेडिटर्स में बैठ सकता हूँ और अपने ही प्लान के पक्ष में वोट डाल सकता हूँ। जी हाँ, आपने बिल्कुल सही सुना। बोली लगाने वाला खुद अपनी बोली को पास करने के लिए वोट कर सकता है।
अभी न्यूज़लॉन्ड्री की रिपोर्ट आई है, वह बताती है कि एक मामले में अगर उसका खुद का वोट नहीं होता, तो प्लान फेल हो जाता। एनसीएलएटी ने इसे भी कानूनी तौर पर सही माना है।
अडानी का बचाव और रेस्क्यू की हकीकत
अब एक पल रुकिए और सोचिए: अगर कोई सरकारी नुमाइंदा या कॉर्पोरेट पीआर इस रिपोर्ट को देख रहा है, तो वह क्या तर्क देगा? अडानी क्या तर्क दे रहे हैं? वे लगातार कह रहे हैं कि सिर्फ हेयर कट को मत देखिए। यह भी देखिए कि ये संपत्तियाँ खराब हो रही थीं, सड़ रही थीं, अदालत के चक्कर काट रही थीं। पुरानी कंपनियों के प्रमोटर्स ने पैसा डुबोया था। कम से कम अडानी ग्रुप आया, अपफ्रंट कैश दे रहा है, रुकी हुई मशीनों को चालू कर रहा है, पावर सप्लाई बहाल कर रहा है और देश की इकोनॉमी में नौकरियाँ पैदा कर रहा है।
कितना बड़ा काम कर रहे हैं अडानी जी! लिक्विडेशन यानी कम भाव में बेचने से तो 30% रिकवरी भी बेहतर है ना। कितना महान काम किया अडानी जी ने!
सुनने में यह तर्क शुरू में बुलेटप्रूफ लगेगा। दिमाग में नेशन-बिल्डिंग का साउंडट्रैक बजने लगेगा कि नहीं यार, गलत सोच रहे हैं; अडानी जी बहुत अच्छे हैं। लेकिन इस रेस्क्यू की हकीकत कभी देखिए। आप जीएमआर, छत्तीसगढ़ कोरबा, बेस्ट, एसआर पावर, एमपी लैंको, अमरकंटक, कोस्टल एनर्जी… यह सिर्फ कंपनियों की लिस्ट नहीं है। यह एक रणनीति है।
आज भारत में एक नया ग्रीनफील्ड थर्मल पावर प्लांट लगाने का खर्च ₹10 से ₹12 करोड़ प्रति मेगावाट आता है। आपको जमीन लेनी है, पर्यावरण की मंजूरी लेनी है, सालों इंतजार करना पड़ता है। लेकिन अगर आप यही पावर प्लांट आईबीसी के रास्ते खरीदते हैं, तो यह आपको ग्रीनफील्ड लागत के एक-तिहाई से भी कम दाम पर मिलता है। ₹9,700 करोड़ का जो नुकसान बैंकों ने उठाया, वह असल में एक प्राइवेट कॉर्पोरेशन की सब्सिडी बन गया है।
वेदांता जैसी कंपनियाँ जब ज्यादा एनपीवी लेकर आती हैं, तो नियम बीच में बदल दिए जाते हैं या मूल्यांकन के मैट्रिक्स में कैश को तरजीह दी जाती है। यह कॉर्पोरेट रेस्क्यू नहीं है। यह भारत के पावर और इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर में एक अवैध मोनोपोली बनाने का वह मास्टरक्लास है, जिसे देश के नागरिक फाइनेंस कर रहे हैं।
निष्कर्ष: ₹9,700 करोड़ की कीमत और एक दोस्ती
आखिर में हमारे सामने क्या बचता है? हमने एक ऐसा सिस्टम डिज़ाइन किया है, जिसने बड़े एसेट्स को कुछ चुनिंदा हाथों में सौंपना संस्थागत बना दिया है। अगर आपकी बैलेंस शीट छोटी है, तो आप इस गेम में शामिल ही नहीं हो सकते। यहाँ नियम बोली खुलने के बाद बदले जा सकते हैं। यहाँ विजेता घोषित होने के बाद चैलेंज दोबारा खोला जा सकता है। और यहाँ महज एक या दो लेनदारों की कमर्शियल विजडम हजारों करोड़ की संपत्ति का भविष्य तय कर सकती है, और देश का कोई जज उस फैसले पर सवाल नहीं उठा सकता।
आपने जो ₹9,700 करोड़ का आंकड़ा टाइटल में देखा, वह सिर्फ एक नंबर नहीं है। यह इस गणतंत्र की कीमत है, जो एनसीएलटी के बंद कमरों में नीलाम हो रही है।
हम आपसे यह नहीं कहेंगे कि आप इस स्टोरी को लाइक करें, चैनल को सब्सक्राइब करें। हम बस इतना कहेंगे कि अगली बार जब आप अपने बैंक जाएँ और आपको बताया जाए कि आपके खाते पर सर्विस चार्ज बढ़ा दिया गया है, तो याद रखिएगा कि आपका वह ₹50 किसी ₹4,000 करोड़ की डील का अपफ्रंट कैश बन रहा है।
और ऐसी बहुत सी कहानियाँ हैं। अभी गंगा एक्सप्रेसवे पर ही जो इतनी बारिश के बाद तालाब बन गया, उसकी एक अलग कहानी है। मैंने उस पर एक विस्तृत वीडियो भी की है। तो ज़रा सोचकर देखिए कि कितना खूबसूरत डिज़ाइन है और कितना ज़रूरी होता है अच्छे दोस्त बनाना। जैसे अडानी जी ने एक अच्छा दोस्त बनाया है। इस दोस्ती पर आप क्या कहना चाहेंगे?

