विकसित भारत 2047 का सपना और उच्च शिक्षा का 2026 का सच : खाली कुर्सियां, पंगु नियामक और निजीकरण की तैयारी
14,617 रिक्त शिक्षकीय पद, नेतृत्वविहीन नियामक संस्थाएं और परीक्षा व्यवस्था में निजी निवेश की तैयारी—क्या 2047 का विकसित भारत इसी आधार पर बनेगा?
जब सरकार वर्तमान की जवाबदेही से बचना चाहती है, तो वह भविष्य के सुनहरे सपने दिखाने लगती है। आज भारत में ‘विकसित भारत 2047’ का नारा इसी राजनीतिक सुविधा का सबसे बड़ा उदाहरण बनता दिखाई दे रहा है।
किसी देश का भविष्य केवल नारों, पोस्टरों और राजनीतिक भाषणों से नहीं बनता। उसका निर्माण उन स्कूलों, विश्वविद्यालयों, प्रयोगशालाओं, अस्पतालों और शोध संस्थानों में होता है, जहां नई पीढ़ी ज्ञान और वैज्ञानिक दृष्टिकोण अर्जित करती है। लेकिन विडंबना देखिए कि जिस सरकार ने 2047 तक विकसित भारत बनाने का लक्ष्य निर्धारित किया है, उसके कार्यकाल में उच्च शिक्षा की बुनियादी संस्थागत व्यवस्था ही गंभीर संकट से गुजर रही है।
2047 का सपना दिखाकर 2026 की जवाबदेही से बचा नहीं जा सकता। इसलिए आइए, सरकारी प्रचार के पोस्टरों से बाहर निकलकर संसद के रिकॉर्ड, आरटीआई से प्राप्त आंकड़ों और उच्च शिक्षा संस्थानों की वास्तविक स्थिति पर नजर डालें।
उच्च शिक्षा : एक तिहाई शिक्षकीय पद खाली
संसद में जब केंद्रीय विश्वविद्यालयों, आईआईटी और एम्स जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में स्वीकृत और रिक्त फैकल्टी पदों की जानकारी मांगी गई, तब सरकार की ओर से रिक्त पदों का समग्र आंकड़ा प्रस्तुत करने के बजाय नियुक्तियों की संख्या बताने पर अधिक जोर दिखाई दिया।
यह अपने आप में पारदर्शिता और संसदीय जवाबदेही से जुड़ा गंभीर प्रश्न है। किसी विभाग ने कितनी नियुक्तियां कीं, यह बताना पर्याप्त नहीं है। नागरिकों को यह जानने का भी अधिकार है कि कुल कितने पद स्वीकृत हैं, उनमें से कितने भरे हुए हैं और कितने वर्षों से खाली पड़े हैं।
संसद में जिस जानकारी का समुचित उत्तर नहीं मिला, वह आरटीआई के माध्यम से सामने आई।
प्राप्त आंकड़ों के अनुसार, देश के प्रमुख केंद्रीय उच्च शिक्षण संस्थानों में कुल 46,151 स्वीकृत फैकल्टी पदों में से कम से कम 14,617 पद खाली हैं। यानी लगभग 31.7 प्रतिशत शिक्षकीय पद रिक्त हैं।
इसका सीधा अर्थ है कि देश के प्रतिष्ठित उच्च शिक्षण संस्थानों में लगभग एक तिहाई स्वीकृत शिक्षकीय क्षमता का उपयोग ही नहीं हो रहा है।
यह केवल कुछ खाली कुर्सियों का मामला नहीं है। इसका असर विद्यार्थियों की पढ़ाई, शोध कार्य, प्रयोगशालाओं, अकादमिक मार्गदर्शन और संस्थानों की गुणवत्ता पर पड़ता है।
और विडंबना यह है कि जिस शिक्षा मंत्रालय पर इस पूरी व्यवस्था को संचालित करने की जिम्मेदारी है, उसकी अपनी प्रशासनिक व्यवस्था भी अस्थिरता से गुजर रही है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, जुलाई में नियुक्ति के बाद शिक्षा मंत्री के पास अतिरिक्त प्रभार की व्यवस्था रही और उच्च शिक्षा विभाग में महज तीन सप्ताह के भीतर तीन सचिव बदल दिए गए।
सवाल है कि जब मंत्रालय का नेतृत्व और प्रशासनिक व्यवस्था ही स्थिर नहीं है, तो उच्च शिक्षा संस्थानों की समस्याओं का समाधान किसके भरोसे होगा?
सबसे प्रतिष्ठित संस्थान भी संकट से अछूते नहीं
आम तौर पर सरकारी शिक्षा व्यवस्था की बदहाली की चर्चा होती है तो लोगों के दिमाग में दूरदराज के सामान्य डिग्री कॉलेज आते हैं। लेकिन आरटीआई से सामने आए आंकड़ों का अधिक चिंताजनक पहलू यह है कि रिक्तियों का संकट उन संस्थानों में भी गहरा है जिन्हें भारत की तकनीकी, वैज्ञानिक और प्रबंधकीय क्षमता का प्रतिनिधि माना जाता है।
विभिन्न संस्थानों में रिक्त फैकल्टी पदों की स्थिति देखिए :
- आईआईटी : लगभग 38 प्रतिशत पद रिक्त।
- ट्रिपल आईटी : लगभग 54 प्रतिशत पद रिक्त।
- एम्स : लगभग 35 प्रतिशत पद रिक्त।
- आईआईएम : लगभग 32 प्रतिशत पद रिक्त।
- एनआईटी : लगभग 28 प्रतिशत पद रिक्त।
- केंद्रीय विश्वविद्यालय : लगभग 26 प्रतिशत पद रिक्त।
ये आंकड़े केवल प्रशासनिक लापरवाही का संकेत नहीं हैं। ये भारत की ज्ञान-व्यवस्था, वैज्ञानिक अनुसंधान और भविष्य की तकनीकी क्षमता पर मंडराते संकट की तस्वीर हैं।
विशेष रूप से ट्रिपल आईटी में 54 प्रतिशत पदों का खाली होना गंभीर चिंता का विषय है। जिन संस्थानों से देश को सॉफ्टवेयर, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और उन्नत तकनीक के विशेषज्ञ मिलने चाहिए, वहां आधे से अधिक स्वीकृत शिक्षकीय पद खाली हैं।
सवाल यह नहीं है कि भारत में योग्य पीएचडी धारकों, वैज्ञानिकों और शिक्षाविदों की कमी है या नहीं। असली सवाल यह है कि योग्य लोगों की उपलब्धता के बावजूद स्थायी नियुक्तियां करने की राजनीतिक और प्रशासनिक इच्छाशक्ति कहां है?
नियामक संस्थाओं को स्थायी नेतृत्व क्यों नहीं?
इस संकट की जड़ें केवल विश्वविद्यालयों तक सीमित नहीं हैं। उच्च शिक्षा को नियंत्रित और संचालित करने वाली नियामक संस्थाओं की स्थिति भी चिंताजनक है।
सरकार ने यूजीसी, एआईसीटीई और एनसीटीई जैसे मौजूदा नियामकों के स्थान पर एक नई व्यवस्था बनाने के उद्देश्य से विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान विधेयक (VBSA Bill) प्रस्तुत किया। लेकिन यह विधेयक संयुक्त संसदीय समिति (JPC) के पास भेजे जाने के बाद लंबी प्रक्रिया में उलझ गया। समिति की समय-सीमा बढ़ाई गई, रिपोर्ट को अपनाने वाली बैठकें रद्द हुईं और मानसून सत्र भी बिना किसी निर्णायक प्रगति के समाप्त हो गया।
किसी कानून पर विचार-विमर्श और संसदीय जांच लोकतांत्रिक प्रक्रिया का आवश्यक हिस्सा है। लेकिन समस्या तब पैदा होती है जब प्रस्तावित नई व्यवस्था के नाम पर मौजूदा संस्थाओं को स्थायी नेतृत्व से वंचित छोड़ दिया जाए।
इसे समझने के लिए तीन महत्वपूर्ण संस्थाओं की स्थिति देखिए।
पहला, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC)। पिछले 19 महीनों से पूर्णकालिक अध्यक्ष की नियुक्ति नहीं हुई है। इससे भी गंभीर बात यह है कि यूजीसी अधिनियम की व्यवस्था सरकारी अधिकारियों को आयोग का अध्यक्ष बनने से रोकती है, ताकि विश्वविद्यालयों की अकादमिक स्वायत्तता और नियामक स्वतंत्रता सुरक्षित रह सके। इसके बावजूद शिक्षा मंत्रालय के सचिव को यूजीसी का अतिरिक्त प्रभार दिए जाने की स्थिति बनी हुई है।
दूसरा, AICTE। तकनीकी शिक्षा के इस महत्वपूर्ण नियामक में भी पिछले 10 महीनों से अंतरिम नेतृत्व के सहारे काम चलाया जा रहा है।
तीसरा, कानूनी शिक्षा का नियमन करने वाली बार काउंसिल। यहां भी नेतृत्व और संस्थागत जवाबदेही से जुड़े गंभीर प्रश्न लंबे समय से उठते रहे हैं।
अब इन स्थितियों को एक साथ रखकर देखिए। शिक्षा मंत्रालय में नेतृत्व की अस्थिरता, उच्च शिक्षा विभाग में सचिवों का बार-बार बदलना और नियामक संस्थाओं में स्थायी नियुक्तियों का अभाव—क्या यह सब एक स्वस्थ उच्च शिक्षा व्यवस्था के लक्षण हैं?
जब नियामक संस्थाएं ही स्थायी और स्वतंत्र नेतृत्व से वंचित होंगी, तो विश्वविद्यालयों में नियुक्तियों, अकादमिक गुणवत्ता और संस्थागत सुधारों की निगरानी कौन करेगा?
परीक्षा व्यवस्था की विफलता और कमेटियों का अंतहीन सिलसिला
इस प्रशासनिक अव्यवस्था का सबसे सीधा और गंभीर प्रभाव देश के करोड़ों विद्यार्थियों पर पड़ता है।
जुलाई 2026 में NEET-UG परीक्षा को लेकर पैदा हुआ विवाद इसका बड़ा उदाहरण है। परीक्षा में गंभीर अनियमितताओं और विवादों के बाद मूल परीक्षा रद्द करनी पड़ी तथा दोबारा परीक्षा आयोजित करनी पड़ी। लाखों विद्यार्थियों और उनके परिवारों को मानसिक, आर्थिक और शैक्षणिक अनिश्चितता का सामना करना पड़ा।
उस समय देशव्यापी आक्रोश के बीच सरकार ने नंदन नीलेकणि की अध्यक्षता में परीक्षा सुधारों के लिए छह सदस्यीय टास्क फोर्स गठित की।
समिति ने अनेक बैठकें और परामर्श किए। उसे अक्टूबर के अंत तक रिपोर्ट देनी थी, लेकिन अब उसका कार्यकाल जनवरी 2027 तक बढ़ा दिया गया है। प्रधानमंत्री कार्यालय ने रोडमैप को अंतिम रूप देने से पहले राज्यों के मुख्यमंत्रियों और मुख्य सचिवों से भी परामर्श मांगा है।
व्यापक परामर्श करना गलत नहीं है। परीक्षा व्यवस्था में सुधार के लिए राज्यों, विशेषज्ञों और संबंधित संस्थाओं की भागीदारी आवश्यक है। लेकिन प्रश्न यह है कि जिन विद्यार्थियों का भविष्य हर वर्ष प्रतियोगी परीक्षाओं पर निर्भर करता है, उन्हें अनिश्चितता से कब मुक्ति मिलेगी?
NEET-UG 2027 के लिए हाइब्रिड परीक्षा प्रारूप पर विचार किया जा रहा है, जबकि कंप्यूटर आधारित परीक्षा व्यवस्था में व्यापक बदलाव 2028 तक टलता दिखाई दे रहा है।
इसका अर्थ है कि परीक्षा व्यवस्था की गंभीर विफलताओं के बाद भी स्थायी समाधान के लिए विद्यार्थियों को लंबा इंतजार करना पड़ सकता है।
सरकारी विफलता से निजी निवेश का रास्ता?
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे महत्वपूर्ण आर्थिक पहलू परीक्षा केंद्रों के निर्माण और संचालन से जुड़ा है।
प्रस्तावित सुधारों में देशभर में कंप्यूटर आधारित परीक्षा केंद्रों (CBT Centres) का नेटवर्क विकसित करने के लिए केंद्र और राज्य सरकारों के साथ निजी निवेश की भागीदारी का विचार शामिल है।
इसके साथ परीक्षा प्रक्रिया की जिम्मेदारियों को अलग-अलग एजेंसियों में बांटने यानी डीबंडलिंग की योजना भी सामने आई है। पेपर तैयार करना, परीक्षा आयोजित करना, परीक्षा केंद्रों का संचालन और सुरक्षा जैसी जिम्मेदारियां अलग-अलग ऑपरेटरों को सौंपी जा सकती हैं।
NTA, SSC, IBPS और रेलवे भर्ती बोर्ड जैसी संस्थाओं के लिए जिला स्तर पर परीक्षा केंद्रों और साझा परीक्षा कैलेंडर की व्यवस्था बनाने की बात भी की जा रही है।
यहां एक महत्वपूर्ण विरोधाभास सामने आता है।
अक्टूबर में संसदीय समिति की रिपोर्ट ने जिलों में सुरक्षित और सरकारी नियंत्रण वाले परीक्षा केंद्र विकसित करने की सिफारिश की थी। लेकिन अब परीक्षा इंफ्रास्ट्रक्चर के निर्माण में निजी पूंजी और विभिन्न निजी ऑपरेटरों की भागीदारी का रास्ता तैयार किया जा रहा है।
निजी क्षेत्र की तकनीकी क्षमता और निवेश का उपयोग अपने आप में अनुचित नहीं है। लेकिन जब परीक्षा जैसी संवेदनशील सार्वजनिक व्यवस्था में निजी भागीदारी बढ़ाई जाती है, तो यह सुनिश्चित करना सरकार की जिम्मेदारी है कि परीक्षा की निष्पक्षता, सुरक्षा, पारदर्शिता और जवाबदेही किसी व्यावसायिक हित के अधीन न हो जाए।
आखिर प्रतियोगी परीक्षाएं कोई सामान्य व्यावसायिक सेवा नहीं हैं। ये करोड़ों युवाओं के भविष्य, अवसरों की समानता और सार्वजनिक संस्थाओं पर नागरिकों के विश्वास से जुड़ी हुई हैं।
इसलिए प्रश्न निजी निवेश के विरुद्ध होने का नहीं, बल्कि सार्वजनिक जिम्मेदारी को निजी कारोबार में बदल देने के खतरे का है।
खाली सरकारी कुर्सियां और निजी शिक्षा का बढ़ता बाजार
अब इस पूरी तस्वीर को उच्च शिक्षा के आर्थिक ढांचे से जोड़कर देखिए।
सातवें वेतन आयोग के अनुसार एक स्थायी प्रोफेसर के वेतन, भत्तों और पेंशन संबंधी दायित्वों पर सरकार को प्रतिवर्ष लगभग 20 से 28 लाख रुपये तक खर्च करने पड़ सकते हैं।
सरकारी संस्थानों में स्थायी नियुक्तियां नहीं होंगी, शिक्षकों की कमी बनी रहेगी, शोध और अकादमिक गुणवत्ता प्रभावित होगी तथा परीक्षा व्यवस्था बार-बार विवादों में घिरेगी, तो स्वाभाविक रूप से सरकारी शिक्षा व्यवस्था पर नागरिकों का विश्वास कमजोर होगा।
इसका लाभ किसे मिलेगा?
एक ओर देश में महंगी निजी यूनिवर्सिटीज का बाजार लगातार विस्तार कर रहा है, जहां एक डिग्री की लागत 15 से 25 लाख रुपये तक पहुंच सकती है। दूसरी ओर विदेशी विश्वविद्यालयों में पढ़ने के लिए भारतीय परिवार हर वर्ष भारी धनराशि खर्च कर रहे हैं। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, विदेश में शिक्षा पर भारत से लगभग 4 से 5 लाख करोड़ रुपये, यानी करीब 50 अरब डॉलर तक का व्यय हो रहा है।
इसका बोझ अंततः आम और मध्यमवर्गीय परिवारों पर पड़ता है। अनेक परिवार बच्चों की शिक्षा के लिए बैंक से कर्ज लेते हैं, जमीन बेचते हैं या अपनी बचत समाप्त कर देते हैं।
इस प्रकार सरकारी शिक्षा व्यवस्था की कमजोरी केवल शैक्षणिक समस्या नहीं रह जाती। यह आर्थिक असमानता को बढ़ाने वाला कारक भी बन जाती है।
एक तरफ सार्वजनिक संस्थानों में शिक्षकों के हजारों पद खाली हैं, दूसरी तरफ निजी शिक्षा और शिक्षा ऋण का बाजार फैल रहा है।
यहां एक बुनियादी सवाल उठता है : क्या सरकार सार्वजनिक शिक्षा को मजबूत करने के बजाय उसकी कमजोरियों के कारण पैदा होने वाली निजी बाजार की मांग को बढ़ने दे रही है?
यह कहना उचित नहीं होगा कि प्रत्येक रिक्त पद जानबूझकर निजी क्षेत्र को लाभ पहुंचाने के लिए खाली रखा गया है। लेकिन नीतियों के परिणामों का मूल्यांकन केवल सरकार की मंशा से नहीं, बल्कि उनसे पैदा होने वाले वास्तविक लाभ और नुकसान से भी किया जाना चाहिए।
सरकार के तर्क और कुछ असुविधाजनक सवाल
सरकार के पक्ष में दो प्रमुख तर्क दिए जा सकते हैं।
पहला, पिछले एक दशक में नए आईआईटी, एम्स और ट्रिपल आईटी जैसे संस्थानों की संख्या बढ़ी है। इसलिए सभी संस्थानों में स्वीकृत पदों को भरने में समय लगना स्वाभाविक है।
दूसरा, परीक्षा सुधारों के लिए टास्क फोर्स का कार्यकाल बढ़ाने और राज्यों से परामर्श लेने का उद्देश्य व्यापक और व्यावहारिक रोडमैप तैयार करना बताया जा रहा है।
इन तर्कों को पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता। लेकिन इनसे सरकार की बुनियादी जवाबदेही समाप्त नहीं हो जाती।
कुछ सीधे सवाल हैं, जिनका जवाब देश को मिलना चाहिए।
पहला सवाल : यदि रिक्त पदों की समस्या मुख्यतः नए संस्थानों के विस्तार के कारण है, तो संसद में कुल स्वीकृत और रिक्त पदों का स्पष्ट तथा नियमित संस्थानवार विवरण देने में परेशानी क्यों है? पारदर्शिता से परहेज क्यों?
दूसरा सवाल : यदि राज्यों के मुख्यमंत्रियों और मुख्य सचिवों से परामर्श करना आवश्यक है, तो यूजीसी में पिछले 19 महीनों से पूर्णकालिक अध्यक्ष की नियुक्ति क्यों नहीं की गई? एआईसीटीई को स्थायी नेतृत्व देने में क्या बाधा है?
तीसरा सवाल : जब भारत का अनुसंधान एवं विकास (R&D) पर खर्च सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का लगभग 0.64 प्रतिशत है, तब आईआईटी में 38 प्रतिशत और ट्रिपल आईटी में 54 प्रतिशत शिक्षकीय पद खाली रखकर हम विश्वस्तरीय शोध और नवाचार की अपेक्षा कैसे कर सकते हैं?
चौथा सवाल : परीक्षा व्यवस्था की विफलता के बाद समाधान के नाम पर निजी निवेश और निजी ऑपरेटरों की भागीदारी बढ़ाने से पहले सरकारी नियंत्रण वाले सुरक्षित परीक्षा केंद्रों की व्यवस्था को प्राथमिकता क्यों नहीं दी जा रही?
इन सवालों का उत्तर किसी 2047 के रोडमैप में नहीं, बल्कि आज की सरकारी नीतियों और निर्णयों में मिलना चाहिए।
विकसित भारत का निर्माण पोस्टरों से नहीं, संस्थानों से होगा
आज भारत की उच्च शिक्षा जिस संकट से गुजर रही है, उसमें तीन प्रवृत्तियां विशेष रूप से दिखाई देती हैं—अत्यधिक केंद्रीकरण, संस्थागत नेतृत्व का कमजोर होना और सार्वजनिक व्यवस्था में निजी भागीदारी का बढ़ता विस्तार।
नीतिगत फैसले शीर्ष राजनीतिक और प्रशासनिक स्तर पर केंद्रित होते जा रहे हैं, जबकि उन्हें लागू करने वाली संस्थाओं में स्थायी नेतृत्व और पर्याप्त मानव संसाधन का अभाव है।
मंत्रालय में नेतृत्व की अस्थिरता, नियामक संस्थाओं में स्थायी नियुक्तियों का अभाव, विश्वविद्यालयों में हजारों रिक्त पद और परीक्षा व्यवस्था पर लगातार उठते सवाल—ये सभी अलग-अलग घटनाएं नहीं हैं। इन्हें एक व्यापक संस्थागत संकट के रूप में समझने की जरूरत है।
लोकतंत्र में सरकार से सवाल पूछना विरोध नहीं, नागरिक अधिकार है। संसद में आंकड़े मांगना, आरटीआई के माध्यम से जानकारी हासिल करना और सरकारी नीतियों की आलोचनात्मक समीक्षा करना स्वस्थ लोकतंत्र की बुनियादी शर्तें हैं।
लेकिन जब संसद में पूरी जानकारी उपलब्ध न हो, नियामक संस्थाएं कमजोर हों और नागरिकों को अपने अधिकारों के लिए लगातार संघर्ष करना पड़े, तब लोकतांत्रिक जवाबदेही स्वयं एक चुनौती बन जाती है।
हमें यह भी समझना होगा कि 2047 में विकसित भारत का निर्माण आज के विश्वविद्यालयों, प्रयोगशालाओं और शोध संस्थानों में ही हो रहा है। आज जिन विद्यार्थियों के पास पर्याप्त शिक्षक नहीं हैं, जिन शोधार्थियों को मार्गदर्शन नहीं मिल रहा और जिन युवाओं का भविष्य अनिश्चित परीक्षा व्यवस्था पर निर्भर है, वही आने वाले भारत की बौद्धिक और वैज्ञानिक क्षमता का निर्माण करेंगे।
यदि आज उन्हें गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, समान अवसर और स्वतंत्र चिंतन का वातावरण नहीं दिया गया, तो 2047 में विकसित भारत का सपना केवल एक राजनीतिक नारा बनकर रह जाएगा।
सरकार को बताना होगा कि 2047 में भारत को विकसित बनाने का दावा करने से पहले वह 2026 में उसकी शिक्षा व्यवस्था को मजबूत करने के लिए क्या कर रही है।
कितने शिक्षकों की नियुक्तियां होंगी? कितने रिक्त पद भरे जाएंगे? यूजीसी और एआईसीटीई जैसे नियामकों को स्थायी नेतृत्व कब मिलेगा? सरकारी विश्वविद्यालयों में शोध और नवाचार के लिए बजट कितना बढ़ेगा? प्रतियोगी परीक्षाओं को पारदर्शी और विश्वसनीय बनाने की समयबद्ध योजना क्या है?
इन सवालों के स्पष्ट उत्तर और उन पर अमल ही विकसित भारत की वास्तविक शुरुआत होगी।
याद रखिए, किसी देश का भविष्य उसके विज्ञापनों में नहीं, उसकी शिक्षा व्यवस्था की गुणवत्ता में दिखाई देता है। 2047 में विकसित भारत का सपना देखने से पहले यह सुनिश्चित करना होगा कि 2026 में हमारे विश्वविद्यालयों की कुर्सियां खाली न रहें, प्रयोगशालाएं संसाधनों के अभाव में बंद न हों और विद्यार्थियों का भविष्य सरकारी लापरवाही की भेंट न चढ़े।
क्योंकि जिस देश की सरकार वर्तमान पीढ़ी को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा नहीं दे सकती, वह आने वाली पीढ़ी को विकसित भारत का भरोसा किस आधार पर दे रही है?
यह केवल शिक्षा मंत्रालय से जुड़ा सवाल नहीं है। यह देश के करोड़ों विद्यार्थियों, उनके अभिभावकों और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य का सवाल है।
अब समय है कि 2047 के पोस्टरों पर ताली बजाने के बजाय 2026 की खाली कुर्सियों का हिसाब मांगा जाए।
“14,617 रिक्त शिक्षकीय पद, नेतृत्वविहीन नियामक संस्थाएं और परीक्षा व्यवस्था में निजी निवेश की तैयारी—क्या 2047 का विकसित भारत इसी आधार पर बनेगा?”

