कारखाने अमेरिका में, सपना विकसित भारत का!

भारत 2047 में विकसित राष्ट्र बनेगा—यह सपना हमें लगातार दिखाया जा रहा है। तारीख भी तय है, लक्ष्य भी तय है और भाषणों में विकास की तस्वीर भी खूब चमकाई जाती है। लेकिन विकास की तस्वीर में एक छोटा-सा सवाल लगातार गायब दिखाई देता है— इस विकसित भारत के कारखाने आखिर लग कहां रहे हैं? क्योंकि सामने जो तस्वीर उभर रही है, वह कुछ अलग कहानी कहती है।

 

रिपोर्ट के अनुसार, पिछले लगभग दो वर्षों में अनेक भारतीय कंपनियों ने अमेरिका में बड़े पैमाने पर निवेश किया है। स्टील, खनन, ऊर्जा, फार्मा, टेक्नोलॉजी और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस—लगभग हर महत्वपूर्ण क्षेत्र में भारतीय कंपनियां अमेरिकी धरती पर अपनी उपस्थिति मजबूत कर रही हैं। भारतीय पूंजी वहां जा रही है। उत्पादन वहां होगा। रोजगार वहां पैदा होंगे। सप्लाई चेन वहां बनेगी। और बाजार का लाभ भी वहां की अर्थव्यवस्था को मिलेगा। तो फिर एक मासूम-सा सवाल पूछना क्या गुनाह है? अगर भारतीय कंपनियों के पास निवेश करने के लिए इतना पैसा है, तो भारत में निवेश का मौसम कब आएगा?

 

विकसित भारत का रास्ता अमेरिका होकर?

किसी कंपनी का अमेरिका में निवेश करना कोई असामान्य बात नहीं। आज की अर्थव्यवस्था वैश्विक है। भारतीय कंपनियां दुनिया भर में जाएंगी, अधिग्रहण करेंगी, कारखाने लगाएंगी और वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धा करेंगी। बल्कि यह भारत की कारोबारी क्षमता का प्रमाण भी है। लेकिन जब कोई भारतीय कंपनी अमेरिका में अरबों डॉलर का स्टील प्लांट लगाने का फैसला करती है, खदान खरीदती है और वहां बड़े पैमाने पर उत्पादन तथा रोजगार की योजना बनाती है, तब भारत के नीति-निर्माताओं को आईना देखने की जरूरत जरूर पड़ती है।

सवाल यह नहीं कि कंपनी अमेरिका क्यों गई।

सवाल यह है—

भारत ने उसे यहां क्यों नहीं बुलाया?

और अगर वह यहां भी निवेश कर सकती थी, तो उसे वहां निवेश करना अधिक सुविधाजनक या लाभदायक क्यों लगा?

यही वह सवाल है जिसका जवाब “भारत तेजी से विकसित हो रहा है” कहकर नहीं दिया जा सकता।

क्योंकि विकास की प्रेस कॉन्फ्रेंस और विकास का कारखाना—दो अलग चीजें हैं।

भाषणों में Manufacturing, निवेश में America

पिछले वर्षों में भारत में Manufacturing बढ़ाने, Make in India को मजबूत करने और उत्पादन आधारित प्रोत्साहन देने की बातें हुईं। उद्योगों को रियायतें मिलीं, योजनाएं बनीं और निवेश आकर्षित करने के लिए अनेक घोषणाएं हुईं।

लेकिन किसी भी नीति का असली Report Card भाषण नहीं होता।

उसका Report Card होता है—

कितने कारखाने लगे?

कितने रोजगार बने?

कितनी नई तकनीक आई?

R&D कितना बढ़ा?

निर्यात कितना बढ़ा?

भारत की उत्पादन क्षमता कितनी मजबूत हुई?

और यदि इन सवालों के जवाब उम्मीद के मुताबिक नहीं हैं, तो फिर यह पूछना भी जरूरी है कि आखिर कमी कहां है।

क्या नीति में?

क्या क्रियान्वयन में?

क्या नियमन में?

या फिर उस कारोबारी वातावरण में जिसमें निवेशक अपना पैसा लगाता है?

पूंजी भावनाओं से नहीं चलती

यहां एक बात साफ समझनी होगी।

उद्योगपति राष्ट्रभक्ति के भाषण सुनकर अरबों रुपये का निवेश नहीं करता। वह भावनाओं से नहीं, Business Model से चलता है।

जहां बाजार मिलेगा, वहां जाएगा।

जहां उत्पादन सस्ता और कुशल होगा, वहां जाएगा।

जहां टैक्स और नियमन पूर्वानुमेय होंगे, वहां जाएगा।

जहां infrastructure मिलेगा, वहां जाएगा।

जहां राजनीतिक और आर्थिक अनिश्चितता कम होगी, वहां जाएगा।

और जहां उसे लगेगा कि निवेश की सुरक्षा और भविष्य का प्रतिफल बेहतर है, वहां पूंजी पहुंच जाएगी।

पूंजी की कोई विचारधारा नहीं होती।

उसका एक ही सिद्धांत होता है—Return on Investment.

इसलिए यदि भारतीय पूंजी अमेरिका जा रही है, तो सबसे पहले पूंजी को दोष देने के बजाय उस वातावरण को समझना चाहिए जो उसे वहां आकर्षित कर रहा है।

लेकिन क्या यह सरकार पर अविश्वास है?

यहां सावधानी जरूरी है।

किसी कंपनी के अमेरिका में निवेश को सीधे-सीधे नरेंद्र मोदी सरकार के प्रति अविश्वास का प्रमाण मान लेना आर्थिक विश्लेषण नहीं होगा। कंपनियां टैरिफ, बाजार, सप्लाई चेन, कच्चे माल, ऊर्जा, तकनीक और स्थानीय मांग जैसे अनेक कारणों से विदेश में निवेश करती हैं।

लेकिन दूसरी तरफ, इस संभावना को पूरी तरह नकार देना भी ठीक नहीं कि नीतिगत अनिश्चितता, नियामकीय बाधाएं या घरेलू निवेश वातावरण की कमियां निवेश के फैसलों को प्रभावित कर सकती हैं।

यही कारण है कि सरकार को आलोचना से बचने के बजाय आंकड़ों के साथ जवाब देना चाहिए।

यदि भारत का निवेश वातावरण इतना शानदार है, तो घरेलू निजी निवेश की गति क्या कहती है?

यदि भारत Manufacturing का वैश्विक केंद्र बन रहा है, तो नई बड़ी परियोजनाओं का भूगोल क्या कहता है?

यदि भारतीय उद्योग को भारत में अपार संभावनाएं दिखाई दे रही हैं, तो विदेशों में हो रहे निवेश का तुलनात्मक अध्ययन क्या बताता है?

सवालों का जवाब विज्ञापन से नहीं, आंकड़ों से होना चाहिए।

और फिर आता है 2047

2047 अभी दूर दिखाई देता है।

लेकिन विकसित राष्ट्र 2047 में अचानक पैदा नहीं होगा।

वह 2026, 2027, 2028 और आने वाले हर साल के निवेश से बनेगा।

आज लगाया गया कारखाना कल उत्पादन करेगा।

आज बनाया गया Research Centre कल तकनीक देगा।

आज प्रशिक्षित किया गया श्रमिक कल उत्पादकता बढ़ाएगा।

आज लगाया गया infrastructure अगले कई दशकों तक अर्थव्यवस्था को गति देगा।

इसलिए 2047 का सपना असल में आज के निवेश का सवाल है।

अगर पूंजी आज बाहर जा रही है और घरेलू निवेश पर्याप्त गति से नहीं बढ़ रहा, तो 2047 की तारीख अपने आप विकास की गारंटी नहीं बन सकती।

कैलेंडर बदलने से अर्थव्यवस्था विकसित नहीं होती।

विदेशी निवेशक भी देख रहे हैं

रिपोर्ट में विदेशी निवेशकों द्वारा भारतीय बाजार से बड़ी मात्रा में पूंजी निकालने का भी उल्लेख है। भारतीय कंपनियों का विदेश में निवेश और विदेशी निवेशकों का भारत से पैसा निकालना दो अलग-अलग घटनाएं हैं। इन्हें एक ही कारण से जोड़ना उचित नहीं होगा।

लेकिन दोनों को साथ रखकर देखना एक महत्वपूर्ण आर्थिक संकेत जरूर दे सकता है।

जब देश की मुद्रा पर दबाव हो, आयात महंगा हो, ऊर्जा और उर्वरक जैसी आवश्यक वस्तुओं के लिए बाहरी निर्भरता बनी रहे और विदेशी पूंजी का व्यवहार भी सावधानीपूर्ण हो, तब सरकार के सामने केवल एक चुनौती नहीं होती।

उसे निवेश, उत्पादन, निर्यात और विदेशी मुद्रा—चारों मोर्चों पर काम करना पड़ता है।

क्योंकि आयात के लिए डॉलर चाहिए।

डॉलर कमाने के लिए निर्यात चाहिए।

निर्यात के लिए प्रतिस्पर्धी उत्पादन चाहिए।

और प्रतिस्पर्धी उत्पादन के लिए निवेश चाहिए।

यानी कहानी घूम-फिरकर फिर उसी जगह आ जाती है—

निवेश।

सरकार को असली चुनौती यहीं स्वीकार करनी होगी

भारत को यह नहीं सोचना चाहिए कि भारतीय कंपनियां अमेरिका क्यों जा रही हैं।

उसे यह देखना चाहिए कि वे अमेरिका में क्या खोज रही हैं जो उन्हें भारत में पर्याप्त मात्रा में नहीं मिल रहा।

क्या बेहतर बाजार?

क्या स्थिर नीति?

क्या कम टैरिफ जोखिम?

क्या बेहतर infrastructure?

क्या कच्चे माल तक आसान पहुंच?

क्या तकनीकी ecosystem?

क्या वैश्विक supply chain?

या इन सबका मिश्रण?

यही अध्ययन भारत की औद्योगिक नीति की अगली दिशा तय कर सकता है।

सरकार चाहे तो इसे आलोचना मान सकती है।

लेकिन बेहतर होगा कि इसे Economic Feedback माने।

क्योंकि निवेशक मतदान केंद्र पर भाषण नहीं देता।

वह अपनी पूंजी से संकेत देता है।

आखिर में सबसे असुविधाजनक सवाल

भारत की समस्या यह नहीं कि भारतीय कंपनियां वैश्विक हो रही हैं।

यह तो अच्छी बात है।

समस्या तब होगी जब भारतीय कंपनियां वैश्विक होकर भारत में अपनी अगली बड़ी छलांग लगाने से हिचकने लगें।

हमें ऐसा भारत चाहिए जहां भारतीय कंपनी अमेरिका में स्टील प्लांट लगाए तो भारत में भी एक बड़ा प्लांट लगाने की योजना बनाए।

जहां भारतीय फार्मा कंपनी अमेरिका के बाजार में जाए तो भारत में भी उसका अगला Research Centre खुले।

जहां AI कंपनी Silicon Valley में जाए तो उसका अगला innovation hub Bengaluru, Hyderabad, Chennai, Pune या किसी छोटे भारतीय शहर में भी बने।

जहां भारतीय पूंजी दुनिया जीते—लेकिन उसकी जड़ें भारत में और मजबूत होती जाएं।

क्योंकि विकसित भारत का अर्थ यह नहीं कि भारत की कंपनियां दुनिया में पहुंच जाएं।

विकसित भारत का अर्थ यह है कि दुनिया भारत में निवेश करने आए, भारतीय कंपनियां भारत में निवेश करने को प्राथमिकता दें और उस निवेश से देश के नागरिकों के लिए बेहतर रोजगार, बेहतर आय और बेहतर जीवन के अवसर पैदा हों।

इसलिए अब असली सवाल यह नहीं है—

“भारतीय कंपनियां अमेरिका क्यों जा रही हैं?”

असली सवाल इससे कहीं अधिक कठोर है—

“भारत ऐसा क्या कर रहा है कि उसकी अपनी पूंजी को अपना भविष्य भारत में दिखाई दे?”

2047 का जवाब इसी सवाल से निकलेगा।

और इस सवाल का जवाब किसी भाषण में नहीं मिलेगा।

वह कारखानों की चिमनियों से निकलेगा, नई नौकरियों में दिखाई देगा और देश की उत्पादन क्षमता के आंकड़ों में पढ़ा जाएगा।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *