SIR, चुनाव आयोग और लोकतंत्र का असली सवाल

आर. के. सिंह का Open Letter सिर्फ चुनाव आयोग पर आरोप-पत्र नहीं, बल्कि चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता पर उठे सवालों की एक लंबी सूची है

भारत में चुनाव केवल मतदान का दिन नहीं है। चुनाव उससे बहुत पहले शुरू हो जाता है—मतदाता सूची तैयार होने से, नाम जुड़ने और हटने से, आपत्तियों और अपीलों से और अंततः इस सवाल से कि मतदान के दिन किस नागरिक का नाम सूची में मौजूद है और किसका नहीं।

इसीलिए पूर्व केंद्रीय गृह सचिव और पूर्व केंद्रीय मंत्री आर. के. सिंह का 28 सितंबर का Open Letter गंभीर सार्वजनिक विमर्श की मांग करता है। सिंह ने Special Intensive Revision यानी SIR की प्रक्रिया, मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की भूमिका, मतदाता सूची में नाम जोड़ने-हटाने की प्रक्रिया, Form 6 में जोड़े गए अतिरिक्त declaration, ECINET के केंद्रीकरण, पश्चिम बंगाल में लगभग 16 लाख मतदाताओं से जुड़े मामलों, EVM और यहां तक कि सुप्रीम कोर्ट के SIR संबंधी निर्णय पर भी सवाल उठाए हैं।

लेकिन इस पत्र को पढ़ने का सही तरीका यह नहीं है कि सिंह के प्रत्येक आरोप को स्वतः सत्य मान लिया जाए। उतना ही महत्वपूर्ण यह भी है कि निर्वाचन आयोग के उत्तर और न्यायिक रिकॉर्ड को सामने रखकर देखा जाए कि कौन-सा प्रश्न तथ्यात्मक है, कौन-सा कानूनी विवाद है और कौन-सा सिंह का अपना निष्कर्ष है। यही इस पूरे विवाद का असली महत्व है।

 

सवाल SIR का नहीं, प्रक्रिया का है

मतदाता सूची को अद्यतन करना लोकतांत्रिक व्यवस्था की सामान्य आवश्यकता है। मृत व्यक्तियों, डुप्लीकेट entries, स्थान बदल चुके मतदाताओं और अन्य अयोग्य entries को हटाना आवश्यक है। निर्वाचन आयोग भी SIR को इसी उद्देश्य से जोड़ता रहा है।

विवाद वहां पैदा होता है जहां eligible voter को अपना नाम बचाने या फिर से दर्ज कराने के लिए ऐसी प्रक्रिया से गुजरना पड़े जो उसके लिए कठिन, अस्पष्ट या अनुपातहीन हो।

आर. के. सिंह का मुख्य तर्क यही है। उनका कहना है कि SIR की प्रक्रिया में कानून द्वारा निर्धारित जिम्मेदारियों और व्यवहार में अपनाई गई प्रक्रिया के बीच अंतर पैदा हुआ है। वे Representation of the People Act, 1950 की Sections 21 और 22 का हवाला देते हुए कहते हैं कि मतदाता सूची में बदलाव के लिए निर्धारित statutory procedure का पालन होना चाहिए और नाम हटाने से पहले inquiry तथा affected voter को अवसर मिलना चाहिए।

यहां एक महत्वपूर्ण सावधानी आवश्यक है। सिंह का कानूनी interpretation अंतिम न्यायिक निष्कर्ष नहीं है। SIR की वैधानिकता पर न्यायालय का अपना रिकॉर्ड मौजूद है और उसे सिंह के interpretation के साथ अलग से पढ़ना होगा।

इसलिए मूल प्रश्न यह होना चाहिए:

क्या SIR की प्रत्येक कार्रवाई कानून में उपलब्ध शक्ति के भीतर, निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार और प्रत्येक मतदाता को पर्याप्त अवसर देते हुए की गई?

यह सवाल किसी राजनीतिक दल का नहीं, चुनावी प्रशासन का सवाल है।

 

Form 6: विवाद का सबसे ठोस उदाहरण

पूरे विवाद में Form 6 का मामला विशेष रूप से महत्वपूर्ण है।

Form 6 नए मतदाता को electoral roll में शामिल करने का statutory application है। जुलाई में Indian Express ने रिपोर्ट किया कि ECINET पर उपलब्ध online Form 6 में एक अतिरिक्त declaration जोड़ा गया था, जिसमें applicant से उसके अथवा उसके माता-पिता के पिछले SIR roll में शामिल होने की जानकारी मांगी जा रही थी। यह अतिरिक्त हिस्सा statutory Form 6 में औपचारिक amendment किए बिना online process में दिखाई दे रहा था। (The Indian Express⁠)

यही वह मुद्दा है जिसे आर. के. सिंह ने अपने पत्र में उठाया। उनका प्रश्न था कि यदि Form 6 statutory rules के तहत prescribed form है तो उसके भीतर अतिरिक्त declaration जोड़ने का अधिकार किसके पास है।

यह सवाल इसलिए और महत्वपूर्ण हो गया क्योंकि 30 सितंबर को निर्वाचन आयोग ने SIR पूरा हो चुके राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में online Form 6 से यह अतिरिक्त SIR declaration हटा दिया। अब वहां नए मतदाताओं के लिए Registration of Electors Rules, 1960 के तहत निर्धारित statutory Form 6 इस्तेमाल किया जा रहा है। (Hindustan Times)

इस घटनाक्रम को किसी एक पक्ष के आरोप की पुष्टि के रूप में पढ़ना जल्दबाजी होगी। लेकिन यह जरूर दिखाता है कि Form 6 को लेकर उठे प्रश्न महज काल्पनिक नहीं थे; स्वयं निर्वाचन आयोग ने 26 सितंबर को स्पष्ट किया था कि non-SIR period में statutory forms का उपयोग होगा। (Press Information Bureau⁠)

यानी एक महत्वपूर्ण प्रश्न अब भी सार्वजनिक स्पष्टीकरण मांगता है:

SIR के दौरान statutory Form 6 के साथ अतिरिक्त declaration जोड़ने की कानूनी और प्रशासनिक आधार-व्यवस्था क्या थी?

 

16 लाख मतदाता और appeals का प्रश्न

आर. के. सिंह ने पश्चिम बंगाल में लगभग 16 लाख मतदाताओं के मामलों को लेकर भी सवाल उठाया है। उनका दावा है कि EROs द्वारा valid पाए गए लोगों के नाम appeals के कारण final roll में शामिल नहीं हुए और उन्होंने पूछा कि इन appeals को किसने अधिकृत किया।

यहां तथ्य और आरोप के बीच अंतर रखना आवश्यक है।

यह तथ्य-जांच का विषय है कि कितने मामलों में किस अधिकारी ने क्या आदेश दिया, appeal किसने दायर की, किस statutory provision के तहत दायर की और उस appeal पर किस authority ने निर्णय लिया।

यदि किसी मतदाता का नाम हटाया गया, उसने appeal की, appeal लंबित रही और इस बीच revised roll का इस्तेमाल चुनाव में हो गया—तो उसका कानूनी प्रभाव स्पष्ट होना चाहिए।

यदि यह प्रक्रिया कानून के अनुरूप थी, तो निर्वाचन आयोग के पास प्रत्येक चरण का documentary record होना चाहिए।

और यदि कहीं procedural error हुआ था, तो उसकी पहचान और correction भी संभव होनी चाहिए।

यही पारदर्शिता विवाद को कम कर सकती है।

 

13 करोड़ नाम हटने का दावा: आंकड़े को सावधानी से पढ़ना होगा

आर. के. सिंह ने लगभग 13 करोड़ names deleted होने का आंकड़ा सामने रखा है और इसे 2024 के लोकसभा चुनाव में विभिन्न गठबंधनों के vote-share difference से जोड़कर चुनावी महत्व का तर्क दिया है। (Hindustan Times⁠)

लेकिन इस आंकड़े की व्याख्या करते समय एक महत्वपूर्ण अंतर समझना होगा।

मतदाता सूची से deletion और स्थायी disenfranchisement एक ही चीज नहीं हैं।

Deletion में मृत मतदाता, duplicate entries, स्थान बदल चुके लोग, verification में समस्या वाले records और अन्य categories शामिल हो सकती हैं। इसके अलावा claims, objections और inclusion की प्रक्रियाएं भी मौजूद हैं।

इसलिए “13 करोड़ नाम हटे” को सीधे “13 करोड़ लोगों का मतदान अधिकार समाप्त हो गया” में बदल देना तथ्यात्मक रूप से उचित नहीं होगा।

लेकिन इसका दूसरा पहलू भी उतना ही महत्वपूर्ण है:

यदि deletion की प्रक्रिया में वास्तविक eligible voters भी बड़ी संख्या में बाहर रह जाते हैं, तो केवल यह कहना पर्याप्त नहीं कि “वे बाद में Form 6 भर सकते हैं।”

लोकतंत्र में सवाल यह भी है कि कितने लोग उस प्रक्रिया को पूरा कर पाए और कितने लोग प्रक्रिया की कठिनाई के कारण बाहर रह गए।

यहीं independent audit की आवश्यकता दिखाई देती है।

 

गरीब और migrant मतदाता सबसे बड़ा परीक्षण

आर. के. सिंह ने विशेष रूप से गरीबों, मजदूरों और migrant workers की कठिनाइयों का प्रश्न उठाया है।

यह तर्क किसी एक दल के पक्ष या विपक्ष का प्रश्न नहीं है।

भारत में लाखों लोग काम के लिए अपना गांव या राज्य बदलते हैं। कई परिवारों के पास पुराने दस्तावेज सीमित हो सकते हैं। पुराने electoral rolls में दर्ज जानकारी और वर्तमान दस्तावेजों में उम्र या नाम की spelling अलग हो सकती है।

इसीलिए 2026 में चुनावी प्रणाली का सबसे महत्वपूर्ण परीक्षण यह होना चाहिए कि क्या technology और verification व्यवस्था नागरिक के लिए प्रक्रिया आसान बनाती है या नागरिक को technology के सामने अपनी पात्रता साबित करने के लिए दौड़ाती है।

इस संदर्भ में 26 सितंबर को निर्वाचन आयोग द्वारा लिया गया निर्णय महत्वपूर्ण है। आयोग ने कहा कि unmapped और “logical discrepancy” वाले मामलों में BLO घर जाकर documents collect कर सकता है और उन्हें ECINET पर upload कर सकता है। जरूरत पड़ने पर ही hearing होगी। आयोग ने night shelters, labourers, poor और homeless लोगों के लिए help desks तथा special camps की व्यवस्था की भी बात कही। (Press Information Bureau⁠)

यह दिशा इस बहस का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।

 

ECINET और centralisation: technology पर भरोसा, लेकिन audit भी

आर. के. सिंह ने voter-roll management के digital centralisation को लेकर गंभीर सवाल उठाया है। उनका कहना है कि कानून में ERO की जो भूमिका है, उसे अत्यधिक centralised digital system से कमजोर नहीं किया जाना चाहिए। (Hindustan Times⁠)

निर्वाचन आयोग का जवाब है कि field officers को ECINET में उनके statutory powers के अनुरूप role-based access दिया गया है। साथ ही आयोग ने ECINET की independent technical review के लिए Senior Deputy Election Commissioner की अध्यक्षता में committee और IIT/IIIT के independent expert को शामिल करने की घोषणा की है। (Press Information Bureau⁠)

यह एक स्वागतयोग्य institutional safeguard हो सकता है—बशर्ते review वास्तव में स्वतंत्र हो और उसकी रिपोर्ट सार्वजनिक की जाए।

आज के डिजिटल चुनावी प्रशासन में सवाल केवल यह नहीं है कि software काम कर रहा है या नहीं।

सवाल यह है:

क्या software कानून के अनुसार काम कर रहा है?

और उससे भी बड़ा सवाल:

क्या किसी अधिकारी को system में वही अधिकार प्राप्त हैं जो कानून उसे देता है—न उससे कम, न अधिक?

यही ECINET audit का वास्तविक महत्व होगा।

 

EVM का प्रश्न अलग है

आर. के. सिंह ने EVM हटाकर ballot paper वापस लाने की मांग भी की है और electronic systems की hacking की संभावना का तर्क दिया है। (Hindustan Times⁠)

यह उनका policy position है। इसे SIR के प्रश्नों के साथ मिला देना उचित नहीं होगा।

SIR का मूल प्रश्न है कौन मतदाता सूची में है।

EVM का प्रश्न है मतदान के बाद vote recording और counting की विश्वसनीयता कैसे सुनिश्चित की जाती है।

दोनों महत्वपूर्ण हैं, लेकिन दोनों की जांच अलग तकनीकी और कानूनी कसौटियों से होनी चाहिए।

 

चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति पर बहस

सिंह ने Election Commissioners की नियुक्ति के लिए प्रधानमंत्री, Leader of Opposition और Supreme Court के एक judge को शामिल करने वाली व्यवस्था का सुझाव दिया है। (ThePrint⁠)

यह एक institutional reform proposal है।

यहां असली बहस किसी व्यक्ति के पक्ष या विरोध की नहीं होनी चाहिए। प्रश्न यह होना चाहिए कि Election Commission की institutional independence को किस appointment mechanism से अधिकतम सार्वजनिक विश्वास प्राप्त हो सकता है।

और इस बहस में 2023 के सुप्रीम कोर्ट के निर्णय तथा बाद में बने statutory framework—दोनों को साथ पढ़ना आवश्यक है।

 

सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न: क्या चुनाव आयोग पर सवाल पूछना लोकतंत्र-विरोधी है?

नहीं।

और इसका उल्टा भी सही है।

चुनाव आयोग पर सवाल उठाना लोकतंत्र-विरोधी नहीं है, लेकिन आयोग के खिलाफ लगाए गए प्रत्येक आरोप को बिना जांच के सत्य मान लेना भी लोकतांत्रिक प्रक्रिया नहीं है।

लोकतंत्र में संस्थाओं की मजबूती का अर्थ यह नहीं कि संस्थाओं से सवाल न पूछे जाएं।

बल्कि मजबूत संस्था वह है जो सवालों का दस्तावेजी, पारदर्शी और सत्यापन योग्य जवाब देने में सक्षम हो।

आर. के. सिंह का पत्र इसी कारण महत्वपूर्ण है। इसकी हर बात सही है या गलत—यह अलग-अलग बिंदुओं की जांच से तय होगा। लेकिन उन्होंने जो प्रश्न उठाए हैं, उनमें से कई ऐसे हैं जिनका उत्तर राजनीतिक भाषण से नहीं, बल्कि electoral data, statutory records, orders, appeal files और independent audit से मिलना चाहिए।

 

लोकतंत्र की सुरक्षा का सबसे व्यावहारिक रास्ता

आज आवश्यकता किसी एक व्यक्ति को नायक या खलनायक बनाने की नहीं है।

आवश्यकता है कि SIR से संबंधित कुछ मूलभूत आंकड़े सार्वजनिक किए जाएं:

  • कितने नाम हटाए गए?
  • किस कारण से हटाए गए?
  • कितने लोगों ने claims दाखिल किए?
  • कितने claims स्वीकार हुए?
  • कितने reject हुए?
  • कितनी appeals लंबित हैं?
  • कितनी appeals में ERO का मूल निर्णय बदला?
  • कितने deleted voters बाद में पुनः शामिल किए गए?
  • Form 7 objections किसने दाखिल किए?
  • appeals किस authority ने authorize कीं?
  • ECINET में deletion/addition किस स्तर पर किया गया?
  • कितने cases में field verification हुआ?
  • और कितने वास्तविक eligible voters प्रक्रिया से बाहर रह गए?

यदि इन सवालों के उत्तर सार्वजनिक और independently verifiable हैं, तो विवाद का बड़ा हिस्सा स्वतः स्पष्ट हो सकता है।

 

निष्कर्ष

SIR का उद्देश्य यदि electoral roll को अधिक शुद्ध बनाना है तो उस उद्देश्य पर बहस से अधिक महत्वपूर्ण है उस तक पहुंचने की प्रक्रिया।

एक मृत व्यक्ति का नाम हटाना electoral integrity है।

एक duplicate entry हटाना electoral integrity है।

लेकिन एक जीवित और eligible नागरिक का नाम गलत तरीके से हट जाना भी electoral integrity के लिए उतना ही गंभीर प्रश्न है।

क्योंकि मतदाता सूची केवल प्रशासनिक database नहीं है।

वह लोकतांत्रिक नागरिकता का operational record है।

इसीलिए आर. के. सिंह के पत्र को न तो अंतिम सत्य मानने की जरूरत है और न उसे केवल राजनीतिक बयान कहकर खारिज करने की। इसके बजाय उनके प्रत्येक कानूनी और तथ्यात्मक दावे को निर्वाचन आयोग के रिकॉर्ड के सामने रखकर जांचना चाहिए।

और निर्वाचन आयोग को भी यह समझना होगा कि चुनावी प्रक्रिया में public confidence स्वयं एक institutional asset है।

आज 30 सितंबर को SIR पूरा हो चुके राज्यों में online Form 6 से अतिरिक्त declaration हटाए जाने के बाद यह बहस और महत्वपूर्ण हो गई है। (Hindustan Times⁠)

आखिर लोकतंत्र में अंतिम प्रश्न यह नहीं है कि किसने किस पर आरोप लगाया।

अंतिम प्रश्न यह है:

क्या प्रत्येक पात्र नागरिक का नाम मतदाता सूची में सुरक्षित रखने और गलत तरीके से हटाए गए नाम को समय पर वापस जोड़ने की प्रक्रिया इतनी पारदर्शी है कि आम नागरिक ही नहीं, बल्कि कोई स्वतंत्र संस्था भी उसे जांचकर सत्यापित कर सके?

यदि उत्तर “हाँ” है, तो पारदर्शिता उस उत्तर को साबित कर सकती है।

और यदि कहीं कमी है, तो लोकतांत्रिक व्यवस्था की शक्ति इसी में है कि वह उसे स्वीकार करके सुधार सके।

मतदाता सूची की शुद्धता जरूरी है—लेकिन उससे भी जरूरी है मतदाता के अधिकार की सुरक्षा।

 
 
 

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