Form 6 से ERO-NET तक: जब सॉफ्टवेयर और कानून आमने-सामने हों

चुनावी प्रक्रिया में उठ रहे सवालों का असली केंद्र केवल SIR नहीं, बल्कि वह डिजिटल व्यवस्था भी है जिसके माध्यम से मतदाता सूची तैयार, संशोधित और नियंत्रित की जा रही है।

23 सितंबर के बाद से चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर लगातार नए सवाल सामने आ रहे हैं। Form 6 में SIR से संबंधित अतिरिक्त declaration, ECINET और ERO-NET में केंद्रीकरण, Goa में Form 8 को लेकर सामने आया संकट, West Bengal में SIR tribunals का portal विवाद, Karnataka में bulk Form 7 applications और Gujarat में राजनीतिक दलों के कथित फर्जी चंदे का मामला—इन सबको अलग-अलग घटनाएँ मानकर देखना आसान है।

लेकिन इन घटनाओं के बीच एक साझा प्रश्न दिखाई देता है:

क्या चुनावी प्रशासन में इस्तेमाल होने वाला डिजिटल सॉफ्टवेयर कानून के अधीन काम कर रहा है, या कहीं-कहीं सॉफ्टवेयर की व्यवस्था ही अधिकारियों के वैधानिक अधिकारों को सीमित करने लगी है?

यही वह प्रश्न है जिसे अब केवल राजनीतिक दल नहीं, बल्कि चुनाव आयोग के भीतर दर्ज आपत्तियों और अदालतों की टिप्पणियों के संदर्भ में भी देखना पड़ रहा है।

Form 6 में बदलाव: आखिर आदेश किसने दिया?

विवाद की शुरुआत ऑनलाइन Form 6 से हुई। Form 6 वह वैधानिक प्रपत्र है जिसके माध्यम से कोई व्यक्ति मतदाता सूची में अपना नाम शामिल कराने के लिए आवेदन करता है।

Indian Express की रिपोर्ट के अनुसार, ECINET के ऑनलाइन Form 6 में SIR से संबंधित एक अतिरिक्त declaration जोड़ा गया था। इसमें आवेदक को यह बताना था कि उसका नाम पिछली intensive revision की मतदाता सूची में था या नहीं; यदि नहीं था तो क्या माता-पिता अथवा दादा-दादी का नाम उस सूची में था। रिपोर्ट के अनुसार, यह section तकनीकी रूप से mandatory के रूप में चिह्नित नहीं था, लेकिन उसका उत्तर दिए बिना आवेदन आगे नहीं बढ़ पा रहा था। (The Indian Express)

यहीं से मामला गंभीर हुआ।

रिपोर्ट के अनुसार, Election Commissioners विवेक जोशी और सुखबीर सिंह संधू ने इस बदलाव पर आपत्ति दर्ज की। उनका तर्क था कि Form 6 Registration of Electors Rules, 1960 में निर्धारित statutory form है और उसमें बदलाव के लिए सक्षम प्राधिकारी की स्वीकृति आवश्यक है। Indian Express के अनुसार, मई में दर्ज आपत्तियों में Form 6 को बिना संबंधित नियमों में बदलाव के संशोधित करने पर सवाल उठाया गया था। (The Indian Express)

इसके बाद एक बुनियादी प्रश्न सामने आया:

यदि Form 6 वैधानिक नियमों से निर्धारित है, तो उसके online version में अतिरिक्त declaration डालने का आदेश किसने दिया?

और इससे जुड़ा दूसरा प्रश्न:

उस बदलाव को ECINET पर technically implement किसने किया और किस अधिकारी ने उसे approve किया?

1 अक्टूबर को नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने इसी प्रश्न को सार्वजनिक रूप से उठाया। उन्होंने पूछा कि ECI में किसने TCS को Form 6 बदलने का निर्देश दिया, TCS में किसने उस बदलाव को approve किया और क्या किसी तरह का दबाव था। यह राहुल गांधी का राजनीतिक आरोप और प्रश्न है; इसकी स्वतंत्र पुष्टि अभी सार्वजनिक रिकॉर्ड से नहीं हुई है। (National Herald)

यहाँ एक महत्वपूर्ण तथ्य भी सामने रखना चाहिए।

Election Commission ने 30 सितंबर को SIR पूरा हो चुके राज्यों में Form 6 से अतिरिक्त SIR declaration हटाने का निर्णय लिया। जहाँ SIR अभी चल रहा है, वहाँ उसकी स्थिति अलग रखी गई है। आयोग के अनुसार, 26 सितंबर की पूर्ण आयोग बैठक के बाद यह निर्णय लिया गया। (The Economic Times)

इसलिए आज की स्थिति में प्रश्न केवल यह नहीं है कि declaration हटाया गया या नहीं। बड़ा प्रश्न यह है:

वह declaration जोड़ा किस वैधानिक और प्रशासनिक प्रक्रिया के तहत गया था?

जब दो चुनाव आयुक्त पहले ही उसकी वैधानिकता पर आपत्ति दर्ज कर चुके थे, तब उस आपत्ति के बावजूद online system में वह बदलाव कैसे बना रहा?

यही वह प्रश्न है जिसका स्पष्ट documentary answer सार्वजनिक होना चाहिए।

क्या Form 6 में बदलाव केवल तकनीकी मामला था?

नहीं। यही इस विवाद की असली गंभीरता है।

यदि किसी नागरिक को नया वोटर बनने के लिए अपने माता-पिता या दादा-दादी के पुराने electoral-roll record से संबंध स्थापित करना पड़े, तो इसका प्रभाव विशेष रूप से उन परिवारों पर पड़ सकता है जिनके पुराने रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं हैं।

यहाँ एक बात स्पष्ट रहनी चाहिए। यह कहना कि इस अतिरिक्त declaration के कारण बड़े पैमाने पर वोट काट दिए गए—एक व्यापक राजनीतिक आरोप है, जिसे प्रत्येक राज्य और प्रत्येक deletion के official records से अलग-अलग सत्यापित करना होगा।

लेकिन यह सवाल पूरी तरह वैध है कि:

क्या किसी नए मतदाता का वैधानिक अधिकार उसके माता-पिता या दादा-दादी की पुरानी electoral-roll स्थिति से जोड़ा जा सकता है?

और यदि ऐसा करने की आवश्यकता नहीं थी, तो यह declaration जोड़ा ही क्यों गया?

Goa ने एक और बड़ी समस्या सामने रख दी

Form 6 विवाद से कहीं अधिक महत्वपूर्ण एक दूसरा उदाहरण Goa से सामने आया है।

Bombay High Court के सामने Santa Cruz के एक परिवार के छह सदस्यों का मामला आया। परिवार ने पता बदलने के लिए Form 8 के माध्यम से आवेदन किया था। लेकिन SIR के दौरान software व्यवस्था के कारण उनका Form 8 process नहीं हो पाया और बाद में उनके नाम electoral roll से हट गए। ECI की ओर से अदालत में कहा गया कि SIR के दौरान system Form 8 process करने की अनुमति नहीं देता था। (The Times of India)

यहीं अदालत ने मूल प्रश्न पकड़ लिया।

यदि कानून किसी ERO को किसी मतदाता का record बदलने, जोड़ने या हटाने का अधिकार देता है, लेकिन software उसे ऐसा करने नहीं देता, तो प्राथमिकता किसकी होगी?

कानून की या software की?

Bombay High Court ने इसी संदर्भ में अत्यंत गंभीर सवाल उठाए। अदालत ने कहा कि कानून के अनुसार काम होना चाहिए और ERO के पास software को उस आदेश के अनुरूप इस्तेमाल करने की क्षमता होनी चाहिए। अदालत ने यह भी पूछा कि किसी व्यक्ति का नाम बिना सुनवाई के हटाने का अधिकार आयोग को किस प्रावधान से मिलता है। (The Times of India)

यह केवल Goa के छह मतदाताओं का मामला नहीं रह जाता।

Indian Express की रिपोर्ट के अनुसार, Goa में ऐसे 97 eligible voters का मामला सामने आया जिन्हें final roll में शामिल करने के लिए ECI से संपर्क किया गया था, लेकिन centralised ECINET व्यवस्था में ground-level ERO के स्तर पर उन्हें फिर से शामिल करने का पर्याप्त mechanism नहीं था। (The Indian Express)

यही वह बिंदु है जहाँ चुनावी प्रशासन का पूरा digital architecture सवालों के घेरे में आता है।

यदि ERO कानूनन निर्णय लेने वाला अधिकारी है, तो क्या उसे software के command का पालन करने वाला operator बना दिया जाना चाहिए?

अदालत का सबसे महत्वपूर्ण संदेश: “कानून पहले, software बाद में”

Goa मामले में Bombay High Court की टिप्पणी इस पूरे विवाद का केंद्रीय बिंदु बन सकती है।

अदालत ने सवाल उठाया कि SIR की प्रक्रिया के नाम पर क्या ऐसा administrative system बनाया जा सकता है जिसमें सामान्य statutory procedures प्रभावहीन हो जाएँ।

अदालत के सामने ECI की ओर से यह बताया गया कि software Form 8 को process करने की अनुमति नहीं देता था। इस पर अदालत ने मूलतः यही सवाल उठाया कि यदि software कानूनन उपलब्ध प्रक्रिया को रोकता है, तो software को बदलना चाहिए, कानून को नहीं। (The Times of India)

लोकतांत्रिक व्यवस्था में यह सिद्धांत बहुत सामान्य है:

Software प्रशासन का उपकरण है; software स्वयं कानून नहीं है।

यदि कानून ERO को अधिकार देता है, तो software को उस अधिकार को लागू करने में सक्षम बनाना होगा।

यही सवाल अब ECINET और ERO-NET के संदर्भ में भी महत्वपूर्ण हो गया है।

West Bengal: जब tribunal और portal आमने-सामने आ गए

West Bengal से सामने आया नया विवाद इसी प्रश्न को और आगे ले जाता है।

Times of India की रिपोर्ट के अनुसार, SIR से जुड़े appellate tribunals के 13 judges ने 21 सितंबर को शुरू किए गए नए portal पर Aadhaar credentials से login करने पर आपत्ति जताई। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि portal केवल 13 निर्धारित documents तक ही सीमित क्यों है, जबकि tribunal किसी मामले में अन्य प्रासंगिक दस्तावेज को भी स्वीकार कर सकता है। (The Times of India)

रिपोर्ट के अनुसार, judges ने ECI को पत्र लिखकर कहा कि वे अपने judicial orders upload नहीं कर पा रहे हैं और इस कारण 21 सितंबर से adjudication प्रभावित हुई है। उन्होंने यह भी कहा कि Supreme Court द्वारा निर्धारित documents की सूची को portal की तकनीकी सीमा के माध्यम से exhaustive नहीं बनाया जा सकता। (The Times of India)

यहाँ भी मूल सवाल वही है:

क्या portal judicial authority की सीमा तय करेगा?

यदि tribunal किसी document को कानून और मामले की परिस्थितियों के आधार पर स्वीकार करना चाहता है, तो क्या software उसे रोक सकता है?

यदि उत्तर “नहीं” है, तो software design को judicial authority के अनुरूप होना चाहिए।

Karnataka: Form 7 पर गंभीर आरोप

Karnataka के Belagavi से bulk Form 7 applications को लेकर भी विवाद सामने आया है।

रिपोर्टों में एक BLO के हवाले से कहा गया कि कुछ लोग बड़ी संख्या में Form 7 लेकर आए और स्वयं को स्थानीय प्रशासन से जुड़ा बताया। BLO ने कथित रूप से इन applications पर हस्ताक्षर करने से इनकार किया। इसके बाद एक व्यक्ति से telephone पर बात कराई गई जिसने स्वयं को ERO बताया और हस्ताक्षर करने को कहा।

यहाँ यह अंतर बनाए रखना जरूरी है कि यह BLO द्वारा बताया गया घटनाक्रम और उससे जुड़े राजनीतिक आरोप हैं; इससे अपने आप यह सिद्ध नहीं होता कि कोई संगठित रूप से किसी विशेष समुदाय के वोट काट रहा था।

लेकिन यदि bulk Form 7 applications दाखिल किए जाते हैं, तो उनकी verification प्रक्रिया पारदर्शी होनी चाहिए।

Form 7 किसी व्यक्ति का नाम हटाने की प्रक्रिया शुरू कर सकता है। इसलिए सवाल यह है:

क्या बड़ी संख्या में objections की स्वतंत्र verification होती है?

क्या BLO को वास्तविक स्थानीय जानकारी के आधार पर आपत्ति दर्ज करने या अस्वीकार करने का पर्याप्त अधिकार है?

और सबसे महत्वपूर्ण:

यदि किसी ने गलत सूचना देकर किसी मतदाता का नाम हटाने का प्रयास किया, तो उसके खिलाफ कार्रवाई कितनी हुई?

ये प्रश्न किसी एक पार्टी के पक्ष या विपक्ष के नहीं हैं। ये electoral integrity से जुड़े प्रश्न हैं।

गुजरात: ₹1,870 करोड़ के कथित bogus donations

अब गुजरात का मामला।

Gujarat Police ने Income Tax Department की शिकायतों के आधार पर तीन Registered Unrecognised Political Parties के खिलाफ FIR दर्ज की है। Indian Express के अनुसार, आरोप लगभग ₹1,870 करोड़ के कथित bogus donations और लगभग ₹560 करोड़ के राजस्व नुकसान से जुड़े हैं। FIR में Bharatiya National Janata Dal, Swatantrata Abhivyakti Party और Garib Kalyan Party को आरोपी बनाया गया है। (The Indian Express)

पुलिस के अनुसार, Income Tax investigation में आरोप है कि donations के माध्यम से taxpayers को tax deduction दिलाई गई और बाद में commission काटकर रकम वापस पहुंचाई गई। FIR में यह भी आरोप है कि financial documents और contribution reports Election Commission के समक्ष प्रस्तुत किए गए। (The Indian Express)

यहाँ फिर वही सावधानी आवश्यक है:

यह अभी FIR और investigation का मामला है, न्यायालय द्वारा सिद्ध अपराध नहीं।

लेकिन इससे चुनाव आयोग के लिए एक वैध institutional question अवश्य उठता है:

यदि किसी राजनीतिक दल के financial records में इतनी बड़ी मात्रा में कथित असंगतियाँ मौजूद थीं, तो regulatory system में उन्हें पहले detect करने के लिए क्या mechanisms हैं?

क्या political parties की financial reporting केवल documents जमा करने तक सीमित है?

या data analytics, tax authorities और Election Commission के बीच ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए जो असामान्य transactions को स्वतः चिन्हित करे?

Electoral Bonds का संदर्भ

राजनीतिक चंदे के संदर्भ में Electoral Bonds का मामला भी याद रखना जरूरी है।

Supreme Court ने फरवरी 2024 में Electoral Bond Scheme और उससे जुड़े कुछ statutory amendments को unconstitutional घोषित किया था। संविधान पीठ ने कहा था कि political funding की जानकारी मतदाता के right to information का हिस्सा है और anonymous political contributions उस अधिकार को प्रभावित करते हैं। (Indian Kanoon)

लेकिन Electoral Bonds और वर्तमान Form 6/SIR विवाद को सीधे जोड़कर यह कहना कि दोनों किसी एक व्यापक conspiracy का हिस्सा हैं, उपलब्ध प्रमाण से स्थापित नहीं होता।

Editorial का काम हर अलग घटना को एक ही निष्कर्ष तक पहुँचाना नहीं, बल्कि यह पूछना है कि क्या institutions में पर्याप्त transparency और accountability मौजूद है?

सबसे बड़ा सवाल: आदेश की chain सार्वजनिक क्यों नहीं होनी चाहिए?

Form 6 विवाद में अब तक सबसे बुनियादी सवाल यही है:

किसने निर्णय लिया?

यदि ECI ने निर्णय लिया था—तो आदेश किस तारीख को हुआ?

यदि किसी committee ने निर्णय लिया था—तो उसकी minutes क्या हैं?

यदि IT division ने implementation किया—तो file noting क्या है?

यदि TCS ने technical implementation किया—तो work order या change request किस अधिकारी से आया?

किसने testing की?

किसने user acceptance testing की?

किसने production deployment को approve किया?

और यदि दो Election Commissioners ने पहले ही आपत्ति दर्ज की थी, तो उस objection का final disposal किस प्रकार हुआ?

ये प्रश्न किसी राजनीतिक दल के नहीं हैं।

ये audit trail के प्रश्न हैं।

किसी भी बड़े digital public system में change management का रिकॉर्ड होना चाहिए। चुनावी database तो देश की लोकतांत्रिक संरचना के सबसे संवेदनशील databases में से एक है।

इसलिए Form 6 में हुए बदलाव की पूरी administrative और technical audit trail सार्वजनिक या कम-से-कम स्वतंत्र संवैधानिक scrutiny के लिए उपलब्ध कराना transparency की दृष्टि से महत्वपूर्ण होगा।

क्या दो चुनाव आयुक्तों की आपत्तियाँ institutional crisis हैं?

Indian Express और अन्य रिपोर्टों में पिछले महीनों के दौरान दो Election Commissioners द्वारा कई मामलों पर objections दर्ज किए जाने की बात सामने आई है। इनमें Form 6, electoral-roll database access और IT-related governance जैसे मुद्दे शामिल बताए गए हैं। (The New Indian Express)

Election Commission की ओर से इसके विपरीत यह कहा गया है कि आयोग के निर्णयों में institutional प्रक्रिया का पालन हुआ है और SIR से जुड़े निर्णयों को लेकर तीनों आयुक्तों की सहमति थी। (India Today)

इसलिए इस समय दो बातें साथ-साथ दर्ज की जानी चाहिए:

एक ओर internal objections की रिपोर्टें हैं।

दूसरी ओर Election Commission का official position है कि निर्णय वैध institutional process के तहत हुए।

अब निर्णायक चीज होगी—मूल documents।

किसने क्या लिखा?

कब लिखा?

किसने किस objection का क्या उत्तर दिया?

किस आदेश को किस authority ने approve किया?

यही दस्तावेज तय करेंगे कि विवाद कितना प्रशासनिक है और कितना राजनीतिक।

लोकतंत्र में चुनाव आयोग जवाबदेही से ऊपर नहीं

Election Commission की स्वतंत्रता आवश्यक है। लेकिन independence का अर्थ accountability से मुक्ति नहीं है।

बल्कि चुनाव आयोग जितना संवेदनशील constitutional institution है, उसकी transparency उतनी ही अधिक होनी चाहिए।

मतदाता को यह जानने का अधिकार है कि उसका नाम electoral roll में क्यों है।

उसे यह जानने का अधिकार है कि उसका नाम क्यों हटाया गया।

उसे यह जानने का अधिकार है कि उसकी correction application किस कारण reject हुई।

और उसे यह भी जानने का अधिकार है कि जिस software के कारण उसका आवेदन process नहीं हुआ, वह software किस authority ने बनाया, बदला और approve किया।

यहाँ किसी राजनीतिक दल की जीत या हार का प्रश्न नहीं है।

यह उस नागरिक के अधिकार का प्रश्न है जो मतदान केंद्र तक पहुँचकर अपना वोट डालना चाहता है।

निष्कर्ष: असली बहस SIR बनाम anti-SIR नहीं होनी चाहिए

SIR के पक्ष और विपक्ष में राजनीतिक बहस चलती रहेगी। अलग-अलग दल इसके उद्देश्य, methodology और consequences पर अपने-अपने तर्क देते रहेंगे।

लेकिन उससे ऊपर एक institutional question है।

क्या भारत की electoral machinery में technology कानून को लागू कर रही है, या technology स्वयं प्रक्रिया निर्धारित करने लगी है?

Goa में High Court के सामने यही सवाल उभरा।

West Bengal में tribunal judges और portal के बीच इसी प्रकार का तनाव सामने आया।

Form 6 में दो Election Commissioners की reported objections ने statutory authority और online implementation का प्रश्न उठाया।

Karnataka में bulk Form 7 applications ने deletion verification की प्रक्रिया पर सवाल खड़े किए।

Gujarat में कथित bogus political donations ने political-finance monitoring की क्षमता पर सवाल खड़े किए।

इन घटनाओं में से प्रत्येक की अपनी अलग सच्चाई है। सभी को जोड़कर किसी एक व्यापक षड्यंत्र का निष्कर्ष निकालना अभी उचित नहीं होगा।

लेकिन इन सबको अलग-अलग करके भी नहीं देखा जा सकता।

क्योंकि इन सभी के केंद्र में एक ही institutional principle है:

चुनाव में अंतिम authority software नहीं, कानून होना चाहिए।

और इसलिए Form 6 विवाद का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह नहीं है कि declaration अब हट गया या नहीं।

सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न है:

उसे जोड़ा किसने था?

किस वैधानिक authority के आधार पर जोड़ा था?

किस अधिकारी ने आदेश दिया था?

TCS ने किसके निर्देश पर उसे implement किया?

किसने उसकी testing और approval की?

और जब दो Election Commissioners ने उसकी वैधता पर आपत्ति की, तब उसे हटाने में इतने महीने क्यों लगे?

इन सवालों के जवाब किसी राजनीतिक बयान से नहीं, बल्कि file notings, orders, minutes, technical change logs और audit trail से मिलने चाहिए।

यही transparency चुनाव आयोग की विश्वसनीयता को मजबूत करेगी।

क्योंकि लोकतंत्र में मतदाता से केवल यह अपेक्षा नहीं की जा सकती कि वह चुनाव आयोग पर विश्वास करे।

लोकतंत्र में संस्थाओं को ऐसा काम करना चाहिए कि नागरिक के पास विश्वास करने के पर्याप्त कारण भी हों।

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