अमृतकाल की ज़मीनी हक़ीक़त : भूखा विज्ञान, महंगा प्रचार और मालामाल व्यवस्था
प्रस्तावना : देश की प्राथमिकताएं आखिर किसके लिए तय हो रही हैं?
किसी देश की वास्तविक आर्थिक स्थिति का आकलन केवल जीडीपी, शेयर बाजार, विदेशी निवेश या सरकारी विज्ञापनों से नहीं किया जा सकता। यह भी देखना जरूरी है कि उस देश में प्रतिभा का कितना सम्मान है, वैज्ञानिक अनुसंधान को कितने संसाधन मिलते हैं, खिलाड़ियों को किस तरह की सुविधाएं उपलब्ध हैं और सार्वजनिक पदों पर बैठे लोगों की जवाबदेही कितनी सुनिश्चित है। यदि वैज्ञानिक संस्थानों के शीर्ष पदों पर बैठे विशेषज्ञ संसाधनों की कमी से जूझ रहे हों, खिलाड़ियों को अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में पहुंचने के लिए अपनी संपत्ति गिरवी रखनी पड़े और दूसरी ओर प्रचार पर बेहिसाब खर्च तथा सत्ता के गलियारों में संपत्ति के असाधारण लेन-देन के आरोप सामने आएं, तो यह केवल आर्थिक असमानता नहीं, बल्कि शासन की प्राथमिकताओं पर गंभीर सवाल है।
वैज्ञानिक प्रतिभा की कीमत और प्रचार का बजट
देश के प्रतिष्ठित संस्थानों के प्रमुखों के वेतन की तुलना यदि सरकारी प्रचार-प्रसार पर होने वाले खर्च से की जाए तो एक असहज तस्वीर सामने आती है। उपलब्ध विवरणों के अनुसार, एम्स, आईआईटी और आईआईएम जैसे संस्थानों के निदेशकों तथा इसरो के अध्यक्ष का वार्षिक वेतन लगभग 27 से 30 लाख रुपये के दायरे में है। दूसरी ओर, प्रसार भारती के माध्यम से डीडी न्यूज के एक चर्चित कार्यक्रम के लिए सालाना लगभग 15 करोड़ रुपये के खर्च का दावा किया गया है।
यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है। किसी संस्थान के प्रमुख का वेतन और किसी कार्यक्रम का प्रोडक्शन अथवा कंसल्टेंसी बजट एक जैसी मदें नहीं हैं। इसलिए इनकी सीधी तुलना को अंतिम आर्थिक निष्कर्ष नहीं माना जा सकता। लेकिन सवाल फिर भी अपनी जगह कायम है कि सार्वजनिक धन से संचालित प्रसारण व्यवस्था में इतनी बड़ी राशि खर्च करने का औचित्य क्या है? क्या उस खर्च से नागरिकों को स्वतंत्र, निष्पक्ष और तथ्यपरक सूचना मिलती है, या उसका प्रमुख उद्देश्य सत्ता की छवि चमकाना है?
वैज्ञानिक अनुसंधान का परिणाम तत्काल दिखाई नहीं देता। एक नई दवा, अंतरिक्ष तकनीक या औद्योगिक नवाचार के पीछे वर्षों का परिश्रम और निवेश होता है। इसके विपरीत प्रचार का प्रभाव प्रतिदिन दिखाई देता है। यही अंतर शासन की प्राथमिकताओं को उजागर करता है। लोकतंत्र में सरकार की उपलब्धियों का प्रचार करने से अधिक महत्वपूर्ण नागरिकों के प्रति उसकी जवाबदेही है।
राजस्थान का 40 विला प्रकरण : निवेश या गंभीर हितों का टकराव?
इस पूरे मामले का सबसे गंभीर और जांच की मांग करने वाला पक्ष राजस्थान के वरिष्ठ आईएएस अधिकारी शिखर अग्रवाल और उनकी आईपीएस पत्नी विशाखा माथुर से जुड़ी संपत्ति खरीद का विवरण है।
सामने आए दस्तावेजों और मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, सितंबर 2023 में उदयपुर के अनंता रिसॉर्ट में इस अधिकारी दंपति ने कथित तौर पर 20 कॉटेज खरीदे। इसके बाद मार्च 2026 में अलवर के अजबगढ़ स्थित रिसॉर्ट में परिवार के सदस्यों के नाम पर 20 और विला खरीदे गए। इनमें पति-पत्नी, उनके दोनों बेटे तथा सास-ससुर के नाम शामिल बताए गए हैं।
बताई गई कुल खरीद कीमत लगभग 6.15 करोड़ रुपये है। यानी एक ही कारोबारी समूह की कंपनी से जुड़े रिसॉर्ट में एक ही परिवार ने ढाई वर्ष के भीतर 40 विला और कॉटेज खरीदे।
लेकिन इस मामले में सबसे असाधारण बात केवल संपत्ति खरीदना नहीं, बल्कि उसके साथ जुड़ा किराये का समझौता है।
रिपोर्ट के अनुसार, जिन संपत्तियों की बिक्री के दस्तावेज पंजीकृत हुए, उसी दिन संबंधित कंपनी के साथ उन्हें वापस किराये पर लेने के समझौते भी पंजीकृत किए गए। उदयपुर की 20 कॉटेज के लिए सालाना 80 लाख रुपये और अलवर के 20 विला के लिए सालाना एक करोड़ रुपये किराया निर्धारित किए जाने की बात सामने आई है।
इस तरह कुल 6.15 करोड़ रुपये के कथित निवेश पर सालाना 1.80 करोड़ रुपये किराया मिलने का दावा है। गणित के हिसाब से यह लगभग 29.3 प्रतिशत वार्षिक प्रतिफल है। यदि ये आंकड़े और समझौते सही हैं, तो यह सामान्य रियल एस्टेट निवेश से अलग और असाधारण वित्तीय व्यवस्था दिखाई देती है।
सवाल है कि कोई कंपनी अपनी संपत्तियां बेचकर उसी दिन उन्हें वापस किराये पर लेने के लिए इतना बड़ा किराया क्यों देगी? क्या इस व्यवस्था के पीछे कोई वैध व्यावसायिक कारण है? क्या सभी खरीदारों को ऐसी ही शर्तों पर संपत्ति खरीदने का अवसर उपलब्ध था? क्या इन समझौतों का स्वतंत्र वित्तीय और कानूनी परीक्षण हुआ है?
इन सवालों के जवाब संबंधित कंपनी और अधिकारियों को सार्वजनिक रूप से देने चाहिए।
पद, प्रभाव और हितों का टकराव
इस मामले की गंभीरता इसलिए भी बढ़ जाती है क्योंकि रिपोर्टों के अनुसार, शिखर अग्रवाल राजस्थान सरकार में उद्योग विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव और रीको सहित महत्वपूर्ण औद्योगिक संस्थाओं के अध्यक्ष पद पर रहे हैं। उनके कार्यक्षेत्र में उद्योग, निवेश, औद्योगिक विकास और सरकारी उपक्रम जैसे महत्वपूर्ण विषय आते हैं।
दूसरी ओर, उनकी पत्नी भी वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी हैं।
यहां किसी अधिकारी के निजी निवेश को अपने आप में अपराध नहीं माना जा सकता। अधिकारियों को भी कानून के दायरे में रहते हुए संपत्ति खरीदने और निवेश करने का अधिकार है। लेकिन जब किसी अधिकारी के परिवार का बड़े पैमाने पर निवेश ऐसी निजी कंपनी में हो, जिसका व्यावसायिक क्षेत्र उस अधिकारी के प्रशासनिक प्रभाव वाले विभागों से संबंधित हो सकता है, तब हितों के टकराव का सवाल उठना स्वाभाविक है।
क्या संबंधित अधिकारियों ने इस निवेश की जानकारी सक्षम प्राधिकारियों को दी थी? क्या किसी संभावित हितों के टकराव की घोषणा की गई थी? क्या संबंधित कंपनी को कभी सरकारी निर्णयों, औद्योगिक भूमि, निवेश स्वीकृतियों या अन्य प्रशासनिक सुविधाओं से लाभ मिला? इन सवालों की स्वतंत्र जांच आवश्यक है।
संपत्ति विवरण और जवाबदेही का प्रश्न
अखिल भारतीय सेवाओं के अधिकारियों के लिए अपनी अचल संपत्ति का वार्षिक विवरण प्रस्तुत करने की व्यवस्था है। इसका उद्देश्य अधिकारियों की निजी संपत्ति और उनके वैध आय-स्रोतों के बीच पारदर्शिता बनाए रखना है।
इस प्रकरण में मीडिया रिपोर्टों ने संपत्ति विवरण (IPR) में कथित विसंगतियों का सवाल उठाया है। दावा किया गया है कि अधिकारी दंपति के नाम पर मौजूद संपत्तियों और सार्वजनिक रूप से उपलब्ध संपत्ति विवरण में अंतर दिखाई देता है। पत्नी के संपत्ति विवरण में शून्य प्रविष्टि और पति के विवरण में सीमित संपत्तियां दर्ज होने की बात भी सामने आई है।
अधिकारी की ओर से यह स्पष्टीकरण दिए जाने की बात कही गई है कि जानकारी प्रस्तुत की गई थी, लेकिन संबंधित दस्तावेज गलत स्थान पर संलग्न हो गए। यदि ऐसा है, तो संबंधित विभाग को मूल रिकॉर्ड और संशोधित विवरण सार्वजनिक करके स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए।
क्योंकि आम नागरिक से लेकर सरकारी कर्मचारी तक, आय और संपत्ति के विवरण में विसंगति होने पर जवाबदेही अपेक्षित होती है। वरिष्ठ अधिकारियों के मामले में पारदर्शिता का मानक और भी ऊंचा होना चाहिए, कम नहीं।
असली सवाल : देश की प्राथमिकताएं कौन तय कर रहा है?
इस पूरे प्रकरण को केवल किसी एक अधिकारी परिवार, किसी एक कंपनी या किसी एक टीवी कार्यक्रम तक सीमित करके नहीं देखना चाहिए। यह सार्वजनिक संसाधनों के उपयोग और संस्थागत जवाबदेही से जुड़ा व्यापक प्रश्न है।
एक तरफ वैज्ञानिक संस्थानों को पर्याप्त संसाधन देने, खिलाड़ियों को आर्थिक सुरक्षा प्रदान करने और शिक्षा एवं स्वास्थ्य व्यवस्था मजबूत करने की आवश्यकता है। दूसरी तरफ यदि प्रचार पर भारी सार्वजनिक खर्च के आरोप सामने आते हैं और प्रशासनिक पदों पर बैठे प्रभावशाली लोगों के निजी वित्तीय लेन-देन में असामान्य परिस्थितियां दिखाई देती हैं, तो नागरिकों को जवाब मांगने का पूरा अधिकार है।
यह भी याद रखना चाहिए कि किसी आरोप का सामने आना अपराध सिद्ध हो जाना नहीं है। संबंधित अधिकारियों और कंपनी को अपना पक्ष रखने का पूरा अवसर मिलना चाहिए। लेकिन निष्पक्ष जांच के बिना केवल स्पष्टीकरण देकर ऐसे गंभीर सवालों को समाप्त भी नहीं किया जा सकता।
लोकतंत्र में पद प्रतिष्ठा का नहीं, सार्वजनिक जिम्मेदारी का माध्यम है। सरकारी अधिकारी नागरिकों के सेवक हैं, शासक वर्ग नहीं। सार्वजनिक धन किसी राजनीतिक दल, सरकार या अधिकारी की निजी संपत्ति नहीं, बल्कि नागरिकों के श्रम और करों से निर्मित सामूहिक संसाधन है।
अमृतकाल की असली बैलेंस शीट यही है कि देश अपनी प्रतिभा पर कितना खर्च कर रहा है, प्रचार पर कितना और सार्वजनिक पदों से जुड़े लोगों की जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए कितना गंभीर है।
देश को ऐसे वैज्ञानिक चाहिए जो नई खोज करें, ऐसे शिक्षक चाहिए जो अगली पीढ़ी तैयार करें, ऐसे खिलाड़ी चाहिए जो अंतरराष्ट्रीय मंच पर सम्मान दिलाएं और ऐसे प्रशासनिक अधिकारी चाहिए जिनकी निष्ठा किसी कंपनी, राजनीतिक सत्ता या निजी हित के बजाय संविधान और नागरिकों के प्रति हो।
विकास का अर्थ केवल चमकदार इमारतें, बड़े आयोजन और उपलब्धियों का प्रचार नहीं है। वास्तविक विकास वह है जिसमें आम नागरिक को बेहतर शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और सम्मानजनक जीवन मिले।
सवाल यह नहीं है कि अमृतकाल का प्रचार कितना भव्य है। सवाल यह है कि इस अमृतकाल में आम नागरिक, वैज्ञानिक, किसान, मजदूर और युवा कितना समृद्ध हुए हैं और सार्वजनिक व्यवस्था से जुड़े प्रभावशाली लोगों की जवाबदेही कितनी सुनिश्चित हुई है।
यही वह ज़मीनी हक़ीक़त, जिसे किसी विज्ञापन, भाषण या प्रचार अभियान से छिपाया नहीं जा सकता।

