भारतीय निर्वाचन आयोग की निष्पक्षता, पारदर्शिता और जवाबदेही पर उठते सवाल

प्रस्तावना

लोकतंत्र में चुनाव केवल सरकार चुनने की प्रक्रिया नहीं, बल्कि नागरिकों की राजनीतिक इच्छा, समान मताधिकार और संवैधानिक व्यवस्था में उनके विश्वास की अभिव्यक्ति हैं। इस पूरी प्रक्रिया की विश्वसनीयता का एक बड़ा आधार निर्वाचन आयोग है, जिसे स्वतंत्र, निष्पक्ष और पारदर्शी ढंग से चुनाव कराने की संवैधानिक जिम्मेदारी सौंपी गई है। निर्वाचन आयोग की निष्पक्षता इसलिए भी महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि चुनाव में प्रतिस्पर्धा करने वाले सभी राजनीतिक दलों और उम्मीदवारों को समान अवसर मिलना तथा प्रत्येक पात्र नागरिक के मताधिकार की रक्षा होना लोकतांत्रिक व्यवस्था की अनिवार्य शर्त है।

लेकिन पिछले कुछ वर्षों में निर्वाचन आयोग की भूमिका, निर्णय-प्रक्रिया और कार्यप्रणाली को लेकर विभिन्न विपक्षी दलों, नागरिक समूहों, स्वतंत्र पत्रकारों, तकनीकी विशेषज्ञों और नागरिकों के एक वर्ग ने अनेक सवाल उठाए हैं। इन सवालों का दायरा चुनाव की तारीखों की घोषणा से लेकर आदर्श आचार संहिता के अनुपालन, राजनीतिक दलों के प्रचार, चुनावी खर्च, मतदाता सूची के पुनरीक्षण, ईवीएम और वीवीपैट की विश्वसनीयता, मतदान के आँकड़ों, मतगणना की पारदर्शिता तथा चुनाव परिणामों के बाद शिकायतों के निस्तारण तक फैला हुआ है।

इनमें कुछ सवाल आयोग की स्वतंत्रता और सत्ताधारी दल के साथ उसके कथित व्यवहार से संबंधित हैं, तो कुछ चुनावी नियमों के समान अनुपालन, तकनीकी प्रक्रियाओं के स्वतंत्र सत्यापन, मतदाताओं के अधिकारों की सुरक्षा और चुनावी अभिलेखों की सार्वजनिक उपलब्धता से जुड़े हैं। कई मामलों में राजनीतिक दलों या अन्य पक्षों ने गंभीर आरोप लगाए हैं; वहीं कुछ मुद्दे चुनावी प्रक्रिया के नियमों, प्रशासनिक निर्णयों और उपलब्ध रिकॉर्ड की पारदर्शिता से संबंधित व्यापक संस्थागत प्रश्न हैं। इसलिए इन सभी को एक ही श्रेणी में रखकर देखना उचित नहीं होगा।

इस संकलन का उद्देश्य किसी आरोप को बिना जाँच सही ठहराना या किसी संस्था के विरुद्ध पूर्वनिर्धारित निष्कर्ष प्रस्तुत करना नहीं है। इसका उद्देश्य उन प्रमुख आरोपों, शिकायतों, आशंकाओं और सवालों को एक स्थान पर व्यवस्थित करना है, जिनके माध्यम से निर्वाचन आयोग की कार्यप्रणाली और चुनावी व्यवस्था की विश्वसनीयता पर बहस होती रही है। लोकतंत्र में संवैधानिक संस्थाओं के प्रति सम्मान का अर्थ उनसे सवाल न करना नहीं, बल्कि उनकी स्वतंत्रता, निष्पक्षता और जवाबदेही को मजबूत बनाए रखना है।

इसी दृष्टि से, नीचे प्रस्तुत सूची में चुनाव की घोषणा से लेकर मतदान, मतगणना और परिणामों के बाद तक के विभिन्न चरणों से संबंधित आरोपों और सवालों को संकलित किया गया है। प्रत्येक बिंदु की वास्तविक स्थिति का आकलन संबंधित दस्तावेजों, उपलब्ध साक्ष्यों, निर्वाचन आयोग के स्पष्टीकरण, स्वतंत्र जाँच और न्यायिक निर्णयों के आधार पर किया जाना चाहिए।

लोकतंत्र में केवल चुनाव होना पर्याप्त नहीं है; चुनाव का निष्पक्ष होना, निष्पक्ष दिखाई देना और उसकी निष्पक्षता पर उठने वाले सवालों का विश्वसनीय उत्तर मिलना भी उतना ही आवश्यक है।

  1. सत्ताधारी दल के प्रति झुकाव: विपक्ष का आरोप है कि चुनाव आयोग एक स्वतंत्र संवैधानिक संस्था के रूप में काम करने के बजाय केंद्र सरकार या सत्ताधारी दल के दबाव में फैसले लेता है।
  2. आदर्श आचार संहिता (MCC) का असमान पालन: आरोप लगाया जाता है कि आयोग विपक्षी नेताओं के भाषणों या बयानों पर त्वरित और सख्त कार्रवाई करता है, जबकि सत्ताधारी दल के नेताओं के कथित आपत्तिजनक या सांप्रदायिक बयानों पर नरमी बरतता है या कार्रवाई में देरी करता है।
  3. आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया: मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की चयन समिति में भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) को हटाकर केंद्रीय कैबिनेट मंत्री को शामिल करने वाले कानून पर सवाल उठाए गए, जिससे आयोग की निष्पक्षता प्रभावित होने की चिंता जताई गई।
  4. EVM में हैकिंग और गड़बड़ी के आरोप: विपक्षी दलों और कई तकनीकी विशेषज्ञों का मानना है कि ईवीएम में हेरफेर संभव है और इसे किसी खास दल के पक्ष में प्रोग्राम किया जा सकता है।
  5. 100% VVPAT पर्ची मिलान की मांग: जनता और विपक्षी दलों की मांग रही है कि ईवीएम से निकले सभी वीवीपैट पर्चियों का मिलान 100% किया जाए, जिसे आयोग द्वारा व्यावहारिक चुनौतियों के कारण अस्वीकार कर दिया गया।
  6. सोर्स कोड की अपारदर्शिता: तकनीकी विशेषज्ञों और मीडिया द्वारा ईवीएम के सॉफ्टवेयर और सोर्स कोड की सार्वजनिक रूप से स्वतंत्र ऑडिट न कराए जाने पर सवाल उठाए जाते हैं।
  7. नामों का बड़े पैमाने पर हटाया जाना: आरोप लगाए जाते हैं कि किसी विशेष समुदाय या विपक्षी दल के मतदाताओं के नाम चुनाव से ठीक पहले मतदाता सूची से मनमाने तरीके से हटा दिए जाते हैं।
  8. फर्जी और डुप्लीकेट वोटर्स: फर्जी/डुप्लीकेट मतदाताओं को जोड़े जाने तथा फॉर्म-6 (नए वोटर रजिस्ट्रेशन) और फॉर्म-7 (नाम हटाने) के दुरुपयोग के आरोप मीडिया और विपक्षी अध्ययन रिपोर्टों में लगाए गए हैं।
  9. लंबे और चरणबद्ध चुनाव: बहु-चरणीय (Multi-phase) चुनाव कार्यक्रमों की तारीख तय करने में सत्ताधारी दल की प्रचार सहूलियत के हिसाब से तारीखें तय करने के आरोप लगे हैं।
  10. वोटिंग डेटा जारी करने में देरी: चुनावों के दौरान कुल मतदान प्रतिशत (Voter Turnout) के अंतिम आंकड़े जारी करने में 3 से 4 दिन की देरी और शुरुआती तथा अंतिम आंकड़ों में अंतर पर मीडिया व नागरिक संस्थाओं ने पारदर्शिता की कमी के सवाल उठाए हैं।
  11. चुनावी बॉन्ड (Electoral Bonds): चुनावी फंडिंग की अपारदर्शिता को लेकर सुप्रीम कोर्ट के फैसले से पहले तक चुनाव आयोग की प्रभावी भूमिका न होने पर भी बहस हुई थी।
  12. अचानक ट्रेंड बदलना: विपक्षी दलों का अक्सर यह आरोप रहा है कि कुछ निर्वाचन क्षेत्रों में शुरुआती घंटों की गिनती में वे आगे चल रहे होते हैं, लेकिन अचानक या तो टीवी चैनलों पर आने वाले रुझान बदल जाते हैं या अंतिम नतीजों में उनकी हार दिखा दी जाती है।
  13. डेटा अपलोड करने में समय लगना: कई बार रिटर्निंग अधिकारियों द्वारा आयोग के पोर्टल पर राउंड-वाइज (Round-wise) डेटा को अपडेट करने में घंटों की देरी होने पर भी सवाल उठाए गए हैं, जिससे गिनती की पारदर्शिता पर संदेह व्यक्त किया जाता है।
  14. पोस्टल बैलेट को खारिज करना: सेना के जवानों और सरकारी कर्मचारियों के लिए इस्तेमाल होने वाले पोस्टल बैलेट की गिनती में नियमों के उल्लंघन और बड़ी संख्या में बिना वैध कारण के पोस्टल वोटों को रद्द (Reject) किए जाने के आरोप लगाए जाते हैं।
  15. शुरुआती रुझानों में पक्षपात: कई चुनावों में ऐसा देखा गया है कि पोस्टल बैलेट की गिनती में एक दल आगे होता है, लेकिन ईवीएम की गिनती शुरू होते ही तस्वीर पूरी तरह बदल जाती है, जिस पर विपक्षी दल सवाल खड़े करते हैं।
  16. डेटा का मिलान न होना: चुनाव के बाद मतदान केंद्रों पर मिलने वाले आधिकारिक रिकॉर्ड ‘फॉर्म 17सी’ (जो हर बूथ पर डाले गए कुल वोटों का हिसाब होता है) और चुनाव आयोग द्वारा अंत में जारी किए गए आंकड़ों के बीच भिन्नता या विसंगति (Discrepancy) होने के गंभीर आरोप लगाए जाते रहे हैं।
  17. पर्चियों की गिनती से इनकार: उम्मीदवारों द्वारा मांगे जाने पर बूथ-वार सभी वीवीपैट पर्चियों और ईवीएम के वोटों के अनिवार्य रूप से मिलान न कराए जाने को लेकर भी पारदर्शिता का अभाव बताया जाता है।
  18. काउंटिंग एजेंटों पर पाबंदियां: कई मौकों पर विपक्षी दलों के उम्मीदवारों और उनके काउंटिंग एजेंटों ने यह शिकायत की है कि उन्हें मतगणना कक्ष के भीतर से सही से देखने या प्रक्रिया पर नजर रखने की पूरी अनुमति नहीं दी जाती, या उन्हें फॉर्म 17सी की प्रतियां समय पर उपलब्ध नहीं कराई जातीं।
  19. स्थानीय अधिकारियों पर प्रभाव: मतगणना के दौरान कुछ स्थानों पर स्थानीय प्रशासनिक अधिकारियों या रिटर्निंग अफसरों पर सत्ताधारी पार्टी के दबाव में काम करने और नतीजों को प्रभावित करने के आरोप भी समय-समय पर लगाए गए हैं।
  20. चुनाव की घोषणा में देरी या समय-निर्धारण पर सवाल: आरोप लगाए जाते हैं कि चुनाव आयोग चुनाव कार्यक्रम घोषित करने में ऐसी तारीख या समय चुनता है, जिससे सत्ताधारी दल को सरकारी योजनाओं के प्रचार, उद्घाटन, यात्राओं या राजनीतिक सभाओं के लिए अतिरिक्त अवसर मिल सके। इसकी जाँच के लिए विभिन्न राज्यों में चुनाव कार्यक्रम तय करने के आधार और आयोग की निर्णय-प्रक्रिया में पारदर्शिता देखना आवश्यक है।
  21. चुनाव कार्यक्रम की असमानता: बहु-चरणीय चुनावों में किन राज्यों या निर्वाचन क्षेत्रों में कितने चरणों में मतदान होगा, इस निर्धारण पर सवाल उठते हैं। आलोचक पूछते हैं कि क्या सुरक्षा संबंधी वास्तविक आवश्यकताओं के अतिरिक्त राजनीतिक प्रचार की सुविधा भी निर्णय को प्रभावित करती है।
  22. आदर्श आचार संहिता लागू होने से पहले सरकारी संसाधनों का इस्तेमाल: चुनाव की घोषणा से ठीक पहले सरकारी योजनाओं की घोषणाओं, परियोजनाओं के उद्घाटन, विज्ञापनों, लाभ वितरण और सरकारी प्रचार पर सवाल उठते हैं। मुख्य प्रश्न यह है कि क्या सरकारी पद और सार्वजनिक धन का उपयोग किसी दल को चुनावी लाभ देने के लिए किया गया।
  23. चुनाव क्षेत्रों के चयन में प्रशासनिक निष्पक्षता: चुनाव कार्यक्रम तैयार करते समय सुरक्षा बलों की तैनाती, अधिकारियों के स्थानांतरण और प्रशासनिक व्यवस्था के निर्णयों के आधार सार्वजनिक किए जाने की माँग उठती है। सवाल यह है कि क्या सभी दलों और निर्वाचन क्षेत्रों के लिए समान मानदंड अपनाए जाते हैं।
  24. आदर्श आचार संहिता के उल्लंघन पर असमान कार्रवाई: शिकायतों के निस्तारण में देरी, नोटिस जारी करने के अलग-अलग मानदंड और उल्लंघन की गंभीरता के अनुरूप कार्रवाई न होने के आरोप लगाए जाते हैं। यह भी पूछा जाता है कि शिकायत मिलने से निर्णय तक कितना समय लगा और निर्णय के कारण सार्वजनिक किए गए या नहीं।
  25. सांप्रदायिक ध्रुवीकरण और नफरत भरे भाषणों पर कार्रवाई: धर्म, जाति, समुदाय या नागरिकों के समूहों के बारे में कथित भड़काऊ बयानों पर आयोग की कार्रवाई की समयबद्धता और एकरूपता पर सवाल उठते हैं। इसकी पड़ताल में संबंधित भाषण, शिकायत, आयोग का नोटिस, जवाब और अंतिम आदेश देखना चाहिए।
  26. सरकारी मशीनरी और सरकारी प्रचार का चुनावी इस्तेमाल: सरकारी विज्ञापनों, सरकारी वाहनों, अधिकारियों, सरकारी कार्यक्रमों और सार्वजनिक संस्थानों के इस्तेमाल को लेकर शिकायतें होती हैं। सवाल यह है कि सरकारी कामकाज और किसी राजनीतिक दल के चुनाव प्रचार के बीच निर्धारित सीमा का पालन हुआ या नहीं।
  27. सरकारी मीडिया में राजनीतिक दलों को असमान अवसर: दूरदर्शन, आकाशवाणी और सरकारी संचार माध्यमों पर राजनीतिक दलों की पहुँच, कवरेज और प्रचार संबंधी अवसरों की निष्पक्षता पर सवाल उठाए जाते हैं।
  28. सोशल मीडिया और डिजिटल प्रचार की निगरानी में असमानता: राजनीतिक विज्ञापनों, प्रायोजित पोस्ट, भ्रामक सामग्री, डीपफेक, बॉट नेटवर्क और डिजिटल प्रचार के खर्च का पता लगाने तथा नियमों को लागू करने में समानता पर सवाल उठते हैं। आयोग की कार्रवाई, विज्ञापन की पहचान और खर्च के हिसाब की जाँच जरूरी है।
  29. प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री और अन्य पदाधिकारियों की चुनावी सभाओं में सरकारी पद का लाभ: आरोपों में सरकारी उपलब्धियों के प्रचार, सरकारी कार्यक्रमों और राजनीतिक रैलियों के बीच सीमा धुंधली होने का मुद्दा भी शामिल है। हर मामले में भाषण और आयोजन की वास्तविक परिस्थितियों के आधार पर नियमों का परीक्षण किया जाना चाहिए।
  30. चुनाव प्रचार के खर्च की निगरानी में कमियाँ: उम्मीदवारों और राजनीतिक दलों के घोषित खर्च तथा वास्तविक खर्च के बीच अंतर होने के आरोप लगाए जाते हैं। बड़े विज्ञापनों, सोशल मीडिया प्रचार, परिवहन, रैलियों, तीसरे पक्ष के प्रचार और समर्थकों द्वारा किए गए खर्च का हिसाब कितना व्यापक है, यह एक महत्त्वपूर्ण सवाल है।
  31. नकदी, शराब, उपहार और अन्य प्रलोभनों के विरुद्ध कार्रवाई: मतदाताओं को प्रभावित करने के लिए कथित रूप से बाँटी जाने वाली नकदी, शराब, उपहार या अन्य लाभों पर निगरानी की प्रभावशीलता और जब्त सामग्री के अंतिम निस्तारण पर सवाल उठते हैं।
  32. चुनावी सर्वेक्षण और एग्जिट पोल के नियमों का पालन: मतदान से पहले सर्वेक्षणों के प्रसारण, मतदान के दौरान प्रचार और एग्जिट पोल पर लागू प्रतिबंधों के पालन की निगरानी तथा उल्लंघन पर कार्रवाई की समानता पर सवाल उठाए जाते हैं।
  33. विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) में पात्र मतदाताओं के छूटने का जोखिम: पुनरीक्षण के दौरान दस्तावेजों की माँग, गणना प्रपत्र जमा करने की समय-सीमा, अनुपस्थित या प्रवासी मतदाताओं की पहचान और नाम हटाने की प्रक्रिया पर सवाल उठते हैं। बिहार के SIR से जुड़े मामले में सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष बड़ी संख्या में प्रारूप सूची से बाहर हुए मतदाताओं का मुद्दा आया था; न्यायालय ने बाहर किए गए मतदाताओं की सूची और उनके नाम हटाने के कारण प्रकाशित करने सहित निर्देश दिए। Sci API +1
  34. नाम हटाने से पहले पर्याप्त सूचना और सुनवाई न मिलने की शिकायतें: मतदाताओं का आरोप हो सकता है कि उन्हें समय पर नोटिस नहीं मिला, अपनी पात्रता साबित करने का पर्याप्त अवसर नहीं मिला या अपील की प्रक्रिया व्यावहारिक रूप से कठिन रही। इसकी जाँच संबंधित नोटिस, आदेश और अपील के रिकॉर्ड से की जानी चाहिए।
  35. मतदाता सूची के पुनरीक्षण में मनमाने या अस्पष्ट मानदंड: नाम, पते, आयु, पारिवारिक संबंध या दस्तावेजों में अंतर के आधार पर मतदाताओं को चिह्नित करने के मानदंड स्पष्ट न होने पर सवाल उठते हैं। यह भी जाँचना चाहिए कि समान परिस्थिति वाले मतदाताओं के साथ समान व्यवहार हुआ या नहीं।
  36. प्रवासी, बेघर, बुजुर्ग और दिव्यांग मतदाताओं की व्यावहारिक कठिनाइयाँ: मतदान केंद्र तक पहुँच, आवश्यक दस्तावेज, सहायता, परिवहन और विशेष सुविधाओं की उपलब्धता में कमियाँ मताधिकार के वास्तविक उपयोग को प्रभावित कर सकती हैं।
  37. मतदान केंद्रों का असमान निर्धारण और मतदाताओं की पहुँच: मतदान केंद्र बहुत दूर होने, सुविधाओं की कमी, भीड़, कतार प्रबंधन और मतदान के लिए पर्याप्त समय या सहायता न मिलने की शिकायतों की जाँच की जानी चाहिए।
  38. मतदाता पहचान पत्र और मतदाता सूची में विसंगतियाँ: पहचान पत्र होने के बावजूद सूची में नाम न मिलना, गलत विवरण, एक से अधिक प्रविष्टियाँ या सुधार के लिए समय पर समाधान न मिलना मतदाताओं के अधिकार से जुड़ा प्रश्न है। निर्वाचन आयोग के अपने पोर्टल पर नाम खोजने, पंजीकरण, सुधार और विलोपन के लिए अलग-अलग प्रक्रियाएँ निर्धारित हैं।
  39. मतदान केंद्रों पर मतदाताओं को प्रभावित करने या रोकने की शिकायतें: किसी मतदाता को धमकाने, मतदान से रोकने, मतदान केंद्र के आसपास अनुचित प्रचार करने या किसी खास समूह को निशाना बनाने के आरोपों की निष्पक्ष जाँच और कार्रवाई आवश्यक है।
  40. मतदान केंद्रों पर अनियमितताओं की शिकायतों का निस्तारण: मतदान अधिकारी की भूमिका, मतदान एजेंटों की आपत्तियों, मॉक पोल के रिकॉर्ड, ईवीएम बदलने की प्रक्रिया और शिकायतों के लिखित निस्तारण से जुड़े रिकॉर्ड पर्याप्त रूप से उपलब्ध न होने पर सवाल उठते हैं।
  41. पुनर्मतदान की माँगों पर निर्णय की पारदर्शिता: बूथ कैप्चरिंग, हिंसा, मशीन की खराबी, मतदान प्रक्रिया में गंभीर बाधा या अन्य अनियमितताओं की शिकायत पर पुनर्मतदान कराने या माँग अस्वीकार करने के कारण स्पष्ट होने चाहिए।
  42. नामांकन पत्रों की जाँच में असमानता: उम्मीदवारों के नामांकन स्वीकार या खारिज करने, दस्तावेजों की कमियों पर आपत्ति और सुधार का अवसर देने में अलग-अलग मानदंड अपनाए जाने की शिकायतें होती हैं। इसकी जाँच नामांकन रिकॉर्ड, रिटर्निंग अधिकारी के आदेश और लागू कानूनी प्रावधानों के आधार पर होनी चाहिए।
  43. आपराधिक मामलों और संपत्ति संबंधी हलफनामों की जाँच: उम्मीदवारों द्वारा कथित रूप से गलत या अधूरी जानकारी देने पर कार्रवाई में देरी तथा समान मामलों में अलग-अलग व्यवहार के आरोप लगाए जाते हैं। आयोग की अपनी प्रक्रिया में गलत हलफनामे की शिकायत पर उपयुक्त न्यायालय में कार्रवाई का प्रावधान बताया गया है।
  44. उम्मीदवारों के नामांकन की अस्वीकृति के विरुद्ध शिकायतों का निस्तारण: नामांकन खारिज होने पर संबंधित उम्मीदवार को कारणों की पर्याप्त जानकारी, कानूनी उपचार और समय पर सुनवाई मिलती है या नहीं, यह एक महत्त्वपूर्ण प्रश्न है।
  45. चुनावी मुकाबले में धनबल और संसाधनों की असमानता: कानूनी खर्च सीमा होने के बावजूद राजनीतिक दलों की आर्थिक क्षमता, प्रचार संसाधनों और उम्मीदवारों तक उपलब्ध धन में भारी अंतर चुनावी प्रतिस्पर्धा को प्रभावित कर सकता है। प्रश्न यह है कि घोषित खर्च के अतिरिक्त होने वाले व्यय की निगरानी कितनी प्रभावी है।
  46. राजनीतिक दलों की वित्तीय रिपोर्टों की जाँच: चंदे, चुनावी खर्च, वार्षिक लेखा-परीक्षण और वित्तीय विवरणों में विसंगतियों पर आयोग की जाँच तथा कार्रवाई की प्रभावशीलता पर सवाल उठते हैं। आयोग राजनीतिक दलों की वित्तीय रिपोर्टें प्रकाशित करता है; इसलिए उनकी उपलब्धता के साथ उनकी जाँच और अनुपालन भी पड़ताल का विषय है।
  47. उम्मीदवारों और राजनीतिक दलों को चुनाव प्रचार की अनुमति देने में देरी: रैलियों, सभाओं, वाहनों, लाउडस्पीकरों और अन्य प्रचार गतिविधियों की अनुमति देने में देरी या असमान व्यवहार की शिकायतों की जाँच की जानी चाहिए।
  48. चुनाव पर्यवेक्षकों की नियुक्ति और शिकायतों पर उनकी कार्रवाई: चुनाव पर्यवेक्षक किसी शिकायत पर क्या कार्रवाई करते हैं, शिकायत का निस्तारण कितनी जल्दी होता है और उनके निष्कर्षों का रिकॉर्ड कितना सुलभ है—इन पर सवाल उठ सकते हैं।
  49. मतदान केंद्रों की वेबकास्टिंग और रिकॉर्ड की उपलब्धता: जहाँ वेबकास्टिंग या अन्य निगरानी व्यवस्था लागू है, वहाँ रिकॉर्ड सुरक्षित रखने, अनियमितताओं की शिकायत पर उसकी जाँच और नियमानुसार उपलब्धता के संबंध में पारदर्शिता का प्रश्न उठता है।
  50. मॉक पोल और ईवीएम बदलने की प्रक्रिया के रिकॉर्ड: मतदान शुरू होने से पहले मॉक पोल के परिणाम, मॉक पोल के डेटा को हटाने की पुष्टि, मशीन खराब होने पर उसके प्रतिस्थापन और संबंधित अभिलेखों के सत्यापन की प्रक्रिया पर सवाल उठाए जाते हैं।
  51. मतदान केंद्रों पर कब्जे, हिंसा और धमकी की शिकायतों पर कार्रवाई: गंभीर शिकायतों के बावजूद पुनर्मतदान न कराने, प्राथमिकी या जाँच में देरी अथवा घटनाओं की गंभीरता का उचित आकलन न होने के आरोपों की मामले-दर-मामले जाँच आवश्यक है।
  52. मतदान समाप्त होने के बाद ईवीएम के परिवहन और भंडारण की सुरक्षा: मशीनों को सील करने, स्ट्रॉन्ग रूम तक पहुँचाने, सुरक्षा व्यवस्था, सीसीटीवी निगरानी और उम्मीदवारों के प्रतिनिधियों की निगरानी संबंधी प्रक्रियाओं के पालन पर सवाल उठते हैं। किसी विशेष मामले में उल्लंघन का दावा हो तो उसके रिकॉर्ड की जाँच आवश्यक है।
  53. मतगणना से पहले ईवीएम की पहचान और सील का सत्यापन: मशीनों की संख्या, पहचान संख्या, सील और मतदान केंद्र के अभिलेखों का मिलान तथा किसी विसंगति पर कार्रवाई की पारदर्शिता महत्त्वपूर्ण है।
  54. मतगणना के दौरान डाक मतपत्रों के नियमों की एकरूपता: डाक मतपत्रों को स्वीकार या अस्वीकार करने के कारण, वैधता के मानदंडों का अनुपालन और उम्मीदवारों की आपत्तियों के निस्तारण पर सवाल उठ सकते हैं।
  55. मतगणना केंद्रों में उम्मीदवारों के प्रतिनिधियों की प्रभावी निगरानी: एजेंटों की पहुँच, उनके द्वारा आपत्ति दर्ज कराने, संबंधित रिकॉर्ड देखने और शिकायत पर लिखित निर्णय पाने की सुविधा पर्याप्त है या नहीं, इसकी जाँच आवश्यक है।
  56. मतगणना संबंधी शिकायतों पर त्वरित और लिखित निर्णय: राउंडवार आँकड़ों, मतपत्रों, ईवीएम या अन्य प्रक्रियागत अनियमितताओं पर उम्मीदवार की शिकायत का स्पष्ट, कारणयुक्त और समयबद्ध उत्तर मिलना चाहिए।
  57. चुनाव परिणामों के विस्तृत अभिलेखों की सार्वजनिक उपलब्धता: निर्वाचन क्षेत्रवार परिणामों के साथ बूथवार मतदान विवरण, मतगणना के प्रमाणित अभिलेख और संबंधित प्रपत्रों तक पहुँच की प्रक्रिया पर सवाल उठते हैं। 2024 में सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष मतदान केंद्रवार फॉर्म 17सी अपलोड करने की माँग का मुद्दा आया था; अदालत ने चुनाव के बीच अंतरिम राहत देने से इनकार किया था। इसे फॉर्म 17सी में अनियमितता सिद्ध होने के रूप में नहीं पढ़ा जाना चाहिए।
  58. मतगणना संबंधी शिकायतों और चुनाव याचिकाओं पर आयोग का रुख: परिणामों को चुनौती देने वाली शिकायतों पर आयोग की भूमिका, उपलब्ध अभिलेखों का संरक्षण और संबंधित कानूनी प्रक्रिया में सहयोग की पारदर्शिता जाँच का विषय है।
  59. चुनावी नियमों के उल्लंघन पर कार्रवाई का सार्वजनिक लेखा-जोखा: आयोग द्वारा प्राप्त शिकायतों, जारी नोटिसों, अंतिम आदेशों, दंडात्मक कार्रवाइयों और बंद किए गए मामलों का दलवार तथा उल्लंघनवार विवरण सार्वजनिक होना चाहिए, ताकि कार्रवाई की निष्पक्षता का स्वतंत्र आकलन हो सके।
  60. चुनाव प्रक्रिया की स्वतंत्र और व्यापक समीक्षा: चुनाव समाप्त होने के बाद सामने आने वाली शिकायतों, तकनीकी समस्याओं, मतदाता सूची की त्रुटियों और प्रशासनिक कमियों पर स्वतंत्र समीक्षा तथा सुधारों की स्थिति सार्वजनिक करने की व्यवस्था कितनी प्रभावी है, यह भी एक महत्त्वपूर्ण सवाल है।

अस्वीकरण (Disclaimer)

इस सूची में भारत के निर्वाचन आयोग (ECI) की कार्यप्रणाली, निष्पक्षता, पारदर्शिता और जवाबदेही को लेकर समय-समय पर विपक्षी राजनीतिक दलों, नागरिक समूहों, स्वतंत्र पत्रकारों, तकनीकी विशेषज्ञों तथा अन्य संबंधित पक्षों द्वारा उठाए गए आरोपों, आशंकाओं, शिकायतों और सवालों को संकलित किया गया है। इस सूची में शामिल प्रत्येक आरोप को स्वतः प्रमाणित तथ्य या न्यायिक रूप से सिद्ध निष्कर्ष नहीं माना जाना चाहिए। विभिन्न मामलों में आरोपों की सत्यता, उपलब्ध साक्ष्यों, निर्वाचन आयोग के स्पष्टीकरण, स्वतंत्र जाँच तथा न्यायिक निर्णयों के आधार पर अलग-अलग हो सकती है।

इस संकलन का उद्देश्य किसी निष्कर्ष को पहले से निर्धारित करना या किसी राजनीतिक दल के पक्ष अथवा विपक्ष में धारणा बनाना नहीं, बल्कि चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता, विश्वसनीयता, पारदर्शिता और संवैधानिक जवाबदेही से जुड़े सवालों को व्यवस्थित रूप से सामने रखना है, ताकि उन पर तथ्यपरक चर्चा, स्वतंत्र जाँच और आवश्यक संस्थागत सुधारों की संभावना पर विचार किया जा सके।

 

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