भारत बनाम बांग्लादेश: आर्थिक विकास और जमीनी हकीकत

IMF के आंकड़े और आत्ममंथन का सवाल

अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) के अक्टूबर 2026 के विश्व आर्थिक परिदृश्य (World Economic Outlook) में एक ऐसा आंकड़ा सामने आया, जिसने में नई बहस छेड़ दी। IMF के अनुमानों के अनुसार, वर्ष 2026 में बांग्लादेश की प्रति व्यक्ति नाममात्र GDP 2,886 डॉलर, जबकि भारत की 2,849 डॉलर रहने का अनुमान है। यानी इस पैमाने पर बांग्लादेश भारत से 37 डॉलर आगे दिखाई देता है।

यह पहली बार नहीं है जब बांग्लादेश की प्रति व्यक्ति आय भारत से अधिक रही हो। वर्ष 2018 से 2024 के बीच भी कई मौकों पर ऐसा हुआ है। दोनों देशों के बीच यह अंतर कभी बढ़ता है तो कभी घटता है। लेकिन जब भी बांग्लादेश इस सूचकांक में भारत से आगे निकलता है, भारतीय समाज के एक हिस्से में असहजता और अविश्वास दिखाई देने लगता है।

स्थिति कुछ ऐसी बन जाती है, जैसे क्रिकेट विश्व कप के एलिमिनेशन मुकाबले में बांग्लादेश भारत को हरा दे। लोग इसे असंभव मानने लगें। सवाल उठता है कि वही बांग्लादेश, जिसके लोगों के लिए अमित शाह ने कभी ‘टरमाइट्स’ जैसी अपमानजनक टिप्पणी की थी; जहां 2024 में व्यापक जनआंदोलन के बाद सरकार गिर गई और राजनीतिक अस्थिरता पैदा हुई; जो IMF से ऋण ले रहा है, वह आर्थिक सूचकांक में भारत से आगे कैसे निकल सकता है? कुछ लोग तो इसे जॉर्ज सोरोस की साजिश तक बता देते हैं।

लेकिन किसी आंकड़े को केवल इसलिए खारिज नहीं किया जा सकता कि वह हमारी राजनीतिक धारणाओं के अनुकूल नहीं है। लोकतांत्रिक समाज में आंकड़ों से असहमति हो सकती है, लेकिन उनका जवाब भी तथ्यों और तर्कों से ही देना चाहिए।

दूसरे वैश्विक सूचकांक और असली सवाल

इसी बहस के बीच वैश्विक भूख सूचकांक (Global Hunger Index-GHI) के आंकड़े भी भारत की चिंता बढ़ाते हैं। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, 112 देशों की सूची में भारत 100वें स्थान पर है, जबकि बांग्लादेश 84वें स्थान पर है। यानी इस सूचकांक में बांग्लादेश भारत से 16 स्थान ऊपर है।

सवाल उठता है कि जिस बांग्लादेश को कभी भारत खाद्यान्न सहायता देता था, वह आज भूख और पोषण के मामले में भारत से बेहतर स्थिति में कैसे दिखाई दे सकता है? एक ओर भारत में लगभग 81 करोड़ लोगों को मुफ्त अनाज उपलब्ध कराने की योजना चल रही है, दूसरी ओर बच्चों में कुपोषण और बौनापन जैसी समस्याएं गंभीर बनी हुई हैं।

लैंगिक अंतर सूचकांक, प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक, जीवन प्रत्याशा और मानव विकास सूचकांक (HDI) जैसे दूसरे वैश्विक मानकों पर भी बांग्लादेश कई बार भारत के बराबर या उससे बेहतर स्थिति में दिखाई देता है।

हालांकि, असली सवाल यह नहीं है कि किसी एक सूचकांक में कौन ऊपर है और कौन नीचे। असली सवाल यह है कि भारत और बांग्लादेश कई महत्वपूर्ण विकास संकेतकों पर लगभग एक ही पायदान पर कैसे पहुंच गए?

जिस देश को दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बताया जा रहा है, जिसे विश्वगुरु बनाने के दावे किए जा रहे हैं और जो चीन को आर्थिक चुनौती देने की बात करता है, उसे अपने पड़ोसी बांग्लादेश के साथ प्रति व्यक्ति आय की तुलना करते समय असहज क्यों होना चाहिए? क्या हमें अपनी विकास नीतियों और उनकी प्राथमिकताओं पर गंभीरता से विचार नहीं करना चाहिए?

वियतनाम: निर्यात के मोर्चे पर भारत के लिए चेतावनी

भारत की आर्थिक चुनौतियों को समझने के लिए वियतनाम का उदाहरण भी महत्वपूर्ण है।

वर्ष 2014 में वियतनाम का कुल वस्तु निर्यात लगभग 50 अरब डॉलर था, जबकि भारत का निर्यात लगभग 321 अरब डॉलर था। यानी उस समय भारत का वस्तु निर्यात वियतनाम से छह गुने से भी अधिक था।

लेकिन अगले एक दशक में तस्वीर बदल गई। वर्ष 2025 तक वियतनाम का वस्तु निर्यात लगभग 475-500 अरब डॉलर के स्तर तक पहुंच गया, जबकि भारत का वस्तु निर्यात लगभग 441.8 अरब डॉलर रहा। इस तरह जिस देश का निर्यात कभी भारत के मुकाबले बहुत छोटा था, वह आज इस क्षेत्र में भारत से आगे निकलता दिखाई दे रहा है।

यह स्थिति ‘मेक इन इंडिया’ जैसे बड़े अभियानों के बावजूद भारत की विनिर्माण और निर्यात रणनीति पर सवाल खड़े करती है।

यह जरूर है कि यदि वस्तुओं के साथ सेवाओं के निर्यात को भी जोड़ दिया जाए तो भारत की स्थिति वियतनाम से काफी मजबूत दिखाई देती है। लेकिन आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के विस्तार से भविष्य में सेवा क्षेत्र के कई पारंपरिक रोजगारों पर भी दबाव पड़ सकता है। इसलिए केवल सेवा क्षेत्र की मौजूदा मजबूती पर निर्भर रहना दूरदर्शी आर्थिक रणनीति नहीं हो सकती।

प्रति व्यक्ति GDP का गणित: PPP और डॉलर का प्रभाव

यहां एक बुनियादी सवाल उठता है। जब भारत की अर्थव्यवस्था बांग्लादेश से लगभग आठ गुना बड़ी है, तो फिर प्रति व्यक्ति आय के मामले में बांग्लादेश आगे कैसे निकल जाता है?

इसका उत्तर समझने के लिए प्रति व्यक्ति GDP का अर्थ समझना जरूरी है। किसी देश की कुल GDP को उसकी कुल आबादी से विभाजित करने पर प्रति व्यक्ति GDP प्राप्त होती है। यह किसी व्यक्ति की वास्तविक कमाई या औसत वेतन नहीं, बल्कि देश में उत्पादित कुल आर्थिक मूल्य का प्रति व्यक्ति औसत हिस्सा है।

IMF के अनुमानों के अनुसार, 2026 में भारत की अर्थव्यवस्था लगभग 4.15 ट्रिलियन डॉलर और बांग्लादेश की लगभग 520 अरब डॉलर की हो सकती है। यानी भारत की अर्थव्यवस्था लगभग आठ गुना बड़ी है। लेकिन भारत की आबादी भी बांग्लादेश की तुलना में लगभग आठ गुना है। इसलिए कुल GDP का बड़ा होना अपने आप में प्रति व्यक्ति GDP अधिक होने की गारंटी नहीं देता।

इसके अतिरिक्त, नाममात्र GDP की गणना डॉलर में करने पर मुद्रा विनिमय दर का भी महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ता है।

वर्ष 2026 में रुपये पर डॉलर के मुकाबले भारी दबाव देखने को मिला है। रुपये की गिरावट के कारण डॉलर में व्यक्त भारत की GDP और प्रति व्यक्ति GDP का मूल्य कम दिखाई दे सकता है। उदाहरण के लिए, यदि किसी व्यक्ति की आय रुपये में पहले जितनी ही है, लेकिन रुपया डॉलर के मुकाबले कमजोर हो गया है, तो डॉलर में उसकी आय घट जाएगी।

दूसरी ओर, बांग्लादेश की मुद्रा और निर्यात से जुड़ी परिस्थितियां भी उसकी डॉलर में व्यक्त प्रति व्यक्ति GDP को प्रभावित करती हैं।

इसलिए यह समझना जरूरी है कि नाममात्र प्रति व्यक्ति GDP में अंतर केवल उत्पादन या वास्तविक आय में अंतर का परिणाम नहीं होता। मुद्रा विनिमय दर, महंगाई और आर्थिक संरचना भी इसमें भूमिका निभाते हैं।

क्रय शक्ति समता (Purchasing Power Parity-PPP) के आधार पर भारत की प्रति व्यक्ति GDP बांग्लादेश से अधिक है। PPP स्थानीय कीमतों और वस्तुओं तथा सेवाओं की खरीदने की क्षमता को ध्यान में रखता है। इसलिए नाममात्र GDP और PPP के आंकड़ों को एक ही अर्थ में नहीं देखना चाहिए।

IMF के अनुमानों में यह भी संकेत मिलता है कि आने वाले वर्षों में भारत फिर बांग्लादेश से नाममात्र प्रति व्यक्ति GDP के मामले में आगे निकल सकता है। लेकिन इससे वर्तमान आर्थिक चुनौतियां समाप्त नहीं हो जातीं।

विदेशी मुद्रा पर दबाव और आर्थिक संकेत

भारत की अर्थव्यवस्था में विदेशी मुद्रा के दबाव को समझने के लिए व्यापार घाटे, पूंजी के प्रवाह और रुपये की विनिमय दर पर नजर डालना जरूरी है।

लिबरलाइज्ड रेमिटेंस स्कीम (LRS) के माध्यम से भारतीय नागरिक विदेशों में शिक्षा, निवेश, यात्रा और अन्य अनुमत उद्देश्यों के लिए पैसा भेज सकते हैं। जब बड़ी मात्रा में पैसा विदेश जाता है, तो विदेशी मुद्रा की मांग बढ़ती है। इस संदर्भ में पूंजी के बाहरी प्रवाह को नियंत्रित करने और विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव कम करने की बहस महत्वपूर्ण हो जाती है।

विदेशी निवेश से जुड़े कुछ प्रतिबंधों और डॉलर भेजने पर नियंत्रण के प्रस्तावों को भी इसी व्यापक संदर्भ में देखा जाना चाहिए। हालांकि, किसी प्रस्ताव या नियामकीय कदम को लागू हो चुकी पाबंदी बताना उचित नहीं होगा।

अप्रैल से दिसंबर 2025 के बीच भारत का वस्तु व्यापार घाटा लगभग 250 अरब डॉलर तक पहुंचने की बात कही गई है। इसका अर्थ है कि भारत ने वस्तुओं के निर्यात से जितनी विदेशी मुद्रा अर्जित की, उससे कहीं अधिक विदेशी मुद्रा आयात पर खर्च की।

व्यापार घाटा अपने आप में किसी अर्थव्यवस्था की विफलता नहीं है, लेकिन यदि निर्यात लगातार कमजोर रहे और आयात पर निर्भरता बढ़ती जाए, तो विदेशी मुद्रा पर दबाव बढ़ सकता है। इससे रुपये की स्थिरता और आर्थिक सुरक्षा दोनों प्रभावित हो सकती हैं।

बांग्लादेश की गारमेंट इंडस्ट्री: श्रम को आर्थिक ताकत में बदलने का उदाहरण

बांग्लादेश की आर्थिक प्रगति को समझने के लिए उसके रेडीमेड गारमेंट्स उद्योग का अध्ययन करना जरूरी है।

1980 के दशक में बांग्लादेश के पास न तेल का बड़ा भंडार था, न कोई विशाल तकनीकी उद्योग और न ही विकसित औद्योगिक ढांचा। उसके पास अपेक्षाकृत सस्ता श्रम था। उसने इसी श्रम शक्ति को रेडीमेड गारमेंट्स उद्योग में संगठित किया और धीरे-धीरे वैश्विक कपड़ा बाजार में अपनी मजबूत जगह बना ली।

आज बांग्लादेश के गारमेंट निर्यात का मूल्य लगभग 36 अरब डॉलर से अधिक बताया जाता है। यह उसके कुल वस्तु निर्यात का बहुत बड़ा हिस्सा है। इस उद्योग में लगभग 45 लाख लोग काम करते हैं, जिनमें 57 प्रतिशत से अधिक महिलाएं हैं।

इसका सामाजिक प्रभाव भी महत्वपूर्ण है। लाखों महिलाओं को पहली बार नियमित वेतन और आर्थिक स्वतंत्रता मिली। परिवार की आय बढ़ी, लड़कियों की शिक्षा को प्रोत्साहन मिला, विवाह की उम्र में वृद्धि हुई और परिवार के आकार में कमी आई।

महिलाओं की कमाई का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बच्चों के पोषण, स्वास्थ्य और शिक्षा पर खर्च होने लगा। इस प्रकार गारमेंट उद्योग केवल निर्यात बढ़ाने का माध्यम नहीं रहा, बल्कि सामाजिक परिवर्तन का भी महत्वपूर्ण कारक बना।

दक्षिण-पूर्व एशिया के कई देशों ने इसी रास्ते से आर्थिक विकास किया है। उन्होंने श्रम-प्रधान विनिर्माण को बढ़ावा दिया, महिलाओं को रोजगार दिया, शिक्षा और कौशल विकास में निवेश किया और धीरे-धीरे अपनी अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाया।

भारत की टेक्सटाइल इंडस्ट्री और मैन्युफैक्चरिंग की सीमाएं

भारत भी कपड़ा उद्योग में पुराना और स्थापित खिलाड़ी रहा है। इसके बावजूद वित्त वर्ष 2025 में भारत का कुल टेक्सटाइल और अपैरल निर्यात लगभग 36 अरब डॉलर के आसपास रहा, जिसमें रेडीमेड अपैरल का हिस्सा लगभग 16 अरब डॉलर बताया गया है।

इसका अर्थ है कि बांग्लादेश अकेले रेडीमेड गारमेंट्स के निर्यात से लगभग उतनी विदेशी मुद्रा अर्जित कर रहा है, जितनी भारत अपने व्यापक टेक्सटाइल और अपैरल उद्योग से अर्जित करता है।

बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था का एक बड़े उद्योग पर अत्यधिक निर्भर होना निश्चित रूप से जोखिम पैदा करता है। लेकिन भारत की मैन्युफैक्चरिंग संरचना भी पूरी तरह संतुलित नहीं है।

भारत की औद्योगिक उत्पादन व्यवस्था में ऑटोमोबाइल उद्योग की महत्वपूर्ण भूमिका है। गाड़ियां, दोपहिया वाहन और ऑटो कंपोनेंट्स अर्थव्यवस्था में बड़ा योगदान देते हैं। लेकिन इस क्षेत्र की एक सीमा भी है।

गारमेंट उद्योग श्रम-प्रधान होता है। इसमें मशीनों के साथ बड़ी संख्या में मानव श्रम की जरूरत पड़ती है। इसके विपरीत, ऑटोमोबाइल उद्योग अपेक्षाकृत पूंजी-प्रधान है। इसमें महंगी मशीनें, स्वचालन और रोबोटिक्स की भूमिका लगातार बढ़ रही है।

इसका अर्थ है कि ऑटो उद्योग उत्पादन और आर्थिक मूल्य तो बढ़ा सकता है, लेकिन उतने अनुपात में रोजगार पैदा करना जरूरी नहीं है।

इसके अलावा, भारत में बनने वाले वाहनों का बड़ा हिस्सा घरेलू बाजार में खपता है, जबकि बांग्लादेश का गारमेंट उद्योग मुख्य रूप से निर्यात पर केंद्रित है। इसलिए दोनों की आर्थिक संरचना और रोजगार सृजन की क्षमता में महत्वपूर्ण अंतर है।

भारत को ऐसे विनिर्माण क्षेत्रों पर भी ध्यान देना होगा, जिनमें बड़ी संख्या में लोगों को रोजगार मिल सके और जिनके उत्पाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में प्रतिस्पर्धा कर सकें।

मजदूरी, अनौपचारिक रोजगार और बढ़ती असमानता

आर्थिक विकास का एक महत्वपूर्ण सवाल यह भी है कि उत्पादन से पैदा होने वाली संपत्ति का लाभ किसे मिल रहा है।

ILO के एक अध्ययन के अनुसार, भारतीय कारखानों में उत्पादन मूल्य में मजदूरी का हिस्सा 1981 में लगभग 28.5 प्रतिशत था, जो 2012-13 तक घटकर करीब 11 प्रतिशत रह गया।

इस प्रवृत्ति का अर्थ है कि उत्पादन और मुनाफे में वृद्धि के अनुपात में श्रमिकों की हिस्सेदारी नहीं बढ़ी। यदि उत्पादन का बड़ा लाभ पूंजी के मालिकों तक सीमित रह जाए और मजदूरों की वास्तविक आय पीछे छूट जाए, तो आर्थिक विकास का सामाजिक आधार कमजोर होता है।

भारत में संगठित विनिर्माण क्षेत्र की तुलना में अनौपचारिक रोजगार का दायरा बहुत बड़ा है। आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (PLFS) के आंकड़ों के अनुसार, गैर-कृषि रोजगार का एक बड़ा हिस्सा अनौपचारिक उद्यमों में है, जहां नियमित वेतन, सामाजिक सुरक्षा, भविष्य निधि और रोजगार की स्थिरता जैसी सुविधाएं सीमित हैं।

इसका नतीजा यह है कि देश में एक तरफ महंगी गाड़ियां, लग्जरी घर और महंगे उपभोक्ता उत्पादों का बाजार तेजी से बढ़ता दिखाई देता है, दूसरी तरफ बड़ी आबादी महंगाई, अस्थिर रोजगार और कम आय से जूझती रहती है।

रोल्स-रॉयस और फेरारी जैसी महंगी गाड़ियों की बिक्री किसी देश की व्यापक आर्थिक खुशहाली का प्रमाण नहीं हो सकती। यह केवल उस छोटे वर्ग की क्रय शक्ति दिखाती है, जिसके पास पर्याप्त संपत्ति और आय है।

प्रति व्यक्ति GDP की सबसे बड़ी सीमा भी यही है कि यह आय और संपत्ति के वितरण की वास्तविक तस्वीर नहीं दिखाती। देश के सबसे अमीर व्यक्ति की आय और सबसे गरीब व्यक्ति की आय को जोड़कर औसत निकाल दिया जाता है। इस औसत से यह पता नहीं चलता कि आर्थिक विकास का लाभ समाज के किन वर्गों तक पहुंचा है।

भारत में संपत्ति की असमानता गंभीर चिंता का विषय है। यदि आर्थिक विकास का लाभ कुछ प्रतिशत लोगों तक सीमित रहता है और आधी आबादी के पास पर्याप्त आय, पोषण और सामाजिक सुरक्षा नहीं होती, तो ऊंची GDP के बावजूद आम नागरिक का जीवन बेहतर नहीं हो सकता।

भूख, बौनापन और बच्चों के पोषण की चुनौती

आर्थिक विकास की असली परीक्षा इस बात से होती है कि देश के बच्चों को पर्याप्त भोजन, पोषण, स्वास्थ्य और शिक्षा मिल रही है या नहीं।

वैश्विक भूख सूचकांक (GHI) 2026 के उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, भारत का स्कोर 24.1 है, जो गंभीर श्रेणी में आता है, जबकि बांग्लादेश का स्कोर 19.2 बताया गया है। भारत की स्थिति इस मामले में चिंताजनक है।

बच्चों के पोषण से जुड़े आंकड़े भी गंभीर सवाल खड़े करते हैं। भारत में पांच वर्ष से कम उम्र के लगभग 29.3 प्रतिशत बच्चे बौनेपन (Stunting) से प्रभावित बताए गए हैं। बांग्लादेश में यह आंकड़ा लगभग 24 प्रतिशत है।

इसी तरह भारत में बच्चों के वेस्टिंग (Wasting) का अनुपात लगभग 19 प्रतिशत बताया गया है, जबकि बांग्लादेश में यह करीब 12.9 प्रतिशत है। कुपोषण के मामले में भी भारत की स्थिति बेहतर नहीं है।

हालांकि, पांच वर्ष से कम उम्र के बच्चों की मृत्यु दर जैसे कुछ संकेतकों में भारत की स्थिति बांग्लादेश से बेहतर बताई गई है। इसलिए किसी एक सूचकांक को पूरी तस्वीर नहीं मानना चाहिए। लेकिन बच्चों में बौनापन और कुपोषण की समस्या को नजरअंदाज भी नहीं किया जा सकता।

सरकार ने ग्लोबल हंगर इंडेक्स की पद्धति और निष्कर्षों पर सवाल उठाए हैं। किसी भी अंतरराष्ट्रीय सूचकांक की सीमाओं और पद्धति की समीक्षा होनी चाहिए। लेकिन यदि आंकड़े किसी गंभीर सामाजिक समस्या की ओर संकेत कर रहे हैं, तो उन्हें केवल देश की छवि खराब करने की साजिश बताकर खारिज करना समाधान नहीं है।

29.3 प्रतिशत बौनापन केवल एक सांख्यिकीय आंकड़ा नहीं है। इसका अर्थ है कि भारत में लगभग हर तीन में से एक बच्चा उम्र के अनुपात में अपेक्षित शारीरिक विकास हासिल नहीं कर पा रहा है। यह आने वाली पीढ़ी के स्वास्थ्य और क्षमता से जुड़ा सवाल है।

मुफ्त अनाज और वास्तविक पोषण के बीच का अंतर

प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना के तहत लगभग 81.35 करोड़ लोगों को हर महीने पांच किलो मुफ्त खाद्यान्न उपलब्ध कराया जा रहा है। यह एक बड़ी खाद्य सुरक्षा योजना है और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के लिए इसका महत्व असंदिग्ध है।

लेकिन यहां एक बुनियादी सवाल उठता है। एक ओर भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल होने का दावा करता है, दूसरी ओर लगभग 81 करोड़ लोगों को खाद्य सुरक्षा के लिए मुफ्त अनाज उपलब्ध कराने की जरूरत बनी हुई है। इन दोनों तथ्यों को एक साथ समझना होगा।

मुफ्त अनाज देना अपने आप में आर्थिक विफलता का प्रमाण नहीं है। किसी भी कल्याणकारी राज्य का दायित्व है कि वह अपने नागरिकों को भूख से बचाए। लेकिन सवाल यह है कि इतनी बड़ी खाद्य सहायता के बावजूद बच्चों में कुपोषण और बौनापन क्यों बना हुआ है?

इसका उत्तर यह है कि भूख और कुपोषण केवल पेट भरने से समाप्त नहीं होते। गेहूं और चावल से मुख्यतः कैलोरी मिलती है, लेकिन बच्चों के समुचित विकास के लिए प्रोटीन, वसा, आयरन, कैल्शियम, विटामिन और अन्य सूक्ष्म पोषक तत्व भी जरूरी हैं।

बच्चों का शारीरिक विकास मां के स्वास्थ्य, गर्भावस्था के दौरान पोषण, स्वच्छ पेयजल, साफ-सफाई, शौचालय, स्वास्थ्य सेवाओं और माता-पिता की शिक्षा से भी जुड़ा होता है।

इसलिए खाद्य सुरक्षा के साथ पोषण सुरक्षा को भी समान महत्व देना होगा। केवल अनाज का थैला देकर कुपोषण की समस्या समाप्त नहीं की जा सकती।

बांग्लादेश का अनुभव: महिलाओं की शिक्षा और सामाजिक विकास

बांग्लादेश में बच्चों के पोषण और शारीरिक विकास में हुए सुधार के पीछे कई सामाजिक और आर्थिक कारण माने जाते हैं। इनमें महिलाओं की शिक्षा, परिवार की आय, स्वास्थ्य सेवाओं का उपयोग, स्वच्छता और परिवार नियोजन की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।

विशेष रूप से लड़कियों की माध्यमिक शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए बांग्लादेश ने 1994 में ग्रामीण क्षेत्रों में छात्रवृत्ति योजना शुरू की थी। इसके तहत लड़कियों को स्कूल में नियमित उपस्थिति और पढ़ाई जारी रखने के लिए आर्थिक प्रोत्साहन दिया जाता था। विवाह को टालने की शर्त भी इस योजना का हिस्सा थी।

इसका सकारात्मक प्रभाव लड़कियों के स्कूल नामांकन पर पड़ा। धीरे-धीरे माध्यमिक शिक्षा में लड़कियों की भागीदारी बढ़ी और कई क्षेत्रों में उन्होंने लड़कों को भी पीछे छोड़ दिया।

शिक्षित महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी निर्णय बेहतर होते हैं। वे गर्भावस्था, बच्चों के पोषण, स्वच्छता और स्वास्थ्य सेवाओं के महत्व को अधिक समझ पाती हैं। इसका लाभ अगली पीढ़ी को मिलता है।

ORF के एक विश्लेषण में भी मां की शिक्षा और बच्चों के बौनेपन के बीच महत्वपूर्ण संबंध की ओर संकेत किया गया है। जिन महिलाओं को शिक्षा नहीं मिली, उनके बच्चों में बौनेपन का जोखिम अधिक पाया गया, जबकि माध्यमिक शिक्षा प्राप्त महिलाओं के बच्चों में यह जोखिम काफी कम था।

यहां बांग्लादेश का अनुभव भारत के लिए महत्वपूर्ण सबक देता है। लड़कियों की शिक्षा केवल सामाजिक न्याय का प्रश्न नहीं है, बल्कि यह स्वास्थ्य, पोषण, रोजगार और आर्थिक विकास की बुनियादी शर्त भी है।

शिक्षा और स्वास्थ्य पर सरकारी निवेश की प्राथमिकता

भारत के आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 के उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, शिक्षा पर सरकारी खर्च GDP के अनुपात में वित्त वर्ष 2020 के लगभग 2.9 प्रतिशत से घटकर वित्त वर्ष 2026 में करीब 2.7 प्रतिशत बताया गया है।

स्वास्थ्य पर सरकारी खर्च भी लंबे समय से अपेक्षाकृत कम रहा है। विभिन्न अनुमानों में यह GDP के लगभग 1.4 से 1.8 प्रतिशत के बीच दिखाई देता है।

यह स्थिति चिंताजनक है। किसी देश की वास्तविक आर्थिक ताकत केवल सड़कों, पुलों, कारखानों और बड़े निर्माण कार्यों से नहीं बनती। उसे स्वस्थ, शिक्षित और कुशल नागरिकों की भी जरूरत होती है।

बांग्लादेश ने लड़कियों की शिक्षा, श्रम-प्रधान उद्योगों में महिलाओं की भागीदारी और बुनियादी स्वास्थ्य सेवाओं पर ध्यान देकर सामाजिक विकास की दिशा में महत्वपूर्ण प्रगति की। भारत को भी इन क्षेत्रों में अपने निवेश और नीतिगत प्राथमिकताओं की समीक्षा करनी चाहिए।

मुफ्त खाद्यान्न की व्यवस्था जरूरी है, लेकिन नागरिकों को ऐसी परिस्थितियां उपलब्ध कराना उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है, जिनमें वे शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य और सम्मानजनक जीवन हासिल कर सकें।

निर्यात, मैन्युफैक्चरिंग और रोजगार का गिरता हिस्सा

भारत की आर्थिक चुनौतियों का एक महत्वपूर्ण पहलू श्रम-प्रधान निर्यात का कमजोर प्रदर्शन है।

एक समय भारत चमड़ा, टेक्सटाइल, फुटवियर और रेडीमेड गारमेंट्स जैसे क्षेत्रों में वैश्विक बाजार में महत्वपूर्ण स्थान रखता था। लेकिन इन क्षेत्रों में भारत अपनी संभावनाओं के अनुरूप विस्तार नहीं कर पाया।

उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, वैश्विक वस्तु निर्यात में भारत की हिस्सेदारी कुछ अवधियों में बढ़ी, लेकिन बाद में इसमें गिरावट भी दर्ज की गई। निर्यात से जुड़े रोजगार का हिस्सा भी घटने की प्रवृत्ति दिखाता है।

इसका सीधा असर उन उद्योगों पर पड़ता है, जिनमें बड़ी संख्या में कम और मध्यम कौशल वाले श्रमिकों को रोजगार मिल सकता है।

‘मेक इन इंडिया’ अभियान का एक बड़ा लक्ष्य विनिर्माण क्षेत्र का GDP में योगदान बढ़ाकर 25 प्रतिशत तक पहुंचाना था। इसके साथ बड़े पैमाने पर रोजगार सृजन का लक्ष्य भी रखा गया था।

लेकिन उपलब्ध राष्ट्रीय खातों के आंकड़ों में विनिर्माण का GDP में हिस्सा अपेक्षित स्तर तक नहीं पहुंच पाया। कुछ अनुमानों के अनुसार, यह 2013-14 के लगभग 16.7 प्रतिशत से घटकर 2023-24 में करीब 15.9 प्रतिशत रह गया।

कोविड महामारी के बाद यह उम्मीद की गई थी कि चीन पर निर्भरता कम करने के लिए वैश्विक कंपनियां ‘चाइना प्लस वन’ रणनीति अपनाएंगी और भारत को इसका बड़ा लाभ मिलेगा।

लेकिन वियतनाम, थाईलैंड, मलेशिया और कंबोडिया जैसे देशों ने इस अवसर का बेहतर उपयोग किया। भारत को अपेक्षित लाभ क्यों नहीं मिला, इस पर गंभीर आत्ममंथन की जरूरत है।

क्या हमारी नीतियों में स्थिरता की कमी है? क्या भूमि, श्रम, बिजली, परिवहन और लॉजिस्टिक्स की लागत अधिक है? क्या लालफीताशाही और प्रशासनिक जटिलताएं निवेश को हतोत्साहित करती हैं? क्या छोटे और मध्यम उद्योगों को पर्याप्त सहायता नहीं मिल रही?

इन सवालों का जवाब ढूंढ़े बिना केवल बड़े निवेश सम्मेलनों और घोषणाओं से औद्योगिक क्रांति नहीं लाई जा सकती।

क्या भारत आर्थिक प्रतिस्पर्धा में हार चुका है?

बिल्कुल नहीं।

भारत के पास विशाल घरेलू बाजार, युवा श्रमशक्ति, वैज्ञानिक क्षमता, उद्यमिता और तकनीकी संसाधन हैं। जब भारत ने किसी क्षेत्र में गंभीरता से काम किया है, तो उल्लेखनीय परिणाम भी हासिल किए हैं।

UNDP के आंकड़ों के अनुसार, 2005-06 से 2015-16 के बीच भारत ने लगभग 27 करोड़ लोगों को बहुआयामी गरीबी से बाहर निकालने में सफलता हासिल की थी। यह इस बात का प्रमाण है कि सही नीतियों और प्रभावी क्रियान्वयन के माध्यम से बड़े सामाजिक परिवर्तन संभव हैं।

इसलिए भारत के सामने चुनौती क्षमता की कमी नहीं, बल्कि विकास की प्राथमिकताओं और नीतियों की दिशा का सवाल है।

भारत को क्या करना चाहिए?

1. रोजगार पैदा करने वाली मैन्युफैक्चरिंग को प्राथमिकता

ऑटोमोबाइल उद्योग का विकास जरूरी है, लेकिन उसके साथ जूते, खिलौने, टेक्सटाइल, खाद्य प्रसंस्करण, इलेक्ट्रॉनिक्स और अन्य श्रम-प्रधान उद्योगों को भी बढ़ावा देना होगा। ऐसे उद्योगों की पहचान करनी होगी, जिनमें भारत वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धी बन सकता है और बड़ी संख्या में रोजगार पैदा कर सकता है।

2. लड़कियों की शिक्षा और महिलाओं के रोजगार पर विशेष ध्यान

बांग्लादेश का अनुभव बताता है कि लड़कियों की शिक्षा और महिलाओं को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाना कितना प्रभावी हो सकता है। छात्रवृत्ति, सुरक्षित परिवहन, बेहतर स्कूल, कौशल प्रशिक्षण और रोजगार के अवसर इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकते हैं।

3. कैलोरी नहीं, संपूर्ण पोषण सुनिश्चित करना

81 करोड़ लोगों को मुफ्त अनाज देना महत्वपूर्ण है, लेकिन इसके साथ दाल, अंडे, दूध और अन्य पौष्टिक खाद्य पदार्थों की उपलब्धता भी सुनिश्चित करनी होगी। गर्भवती महिलाओं और बच्चों के स्वास्थ्य, स्वच्छ पेयजल, स्वच्छता और सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करना होगा।

4. उत्पादन में श्रमिकों की हिस्सेदारी बढ़ाना

यदि उत्पादन और मुनाफे में लगातार वृद्धि हो रही है, लेकिन मजदूरी का हिस्सा घटता जा रहा है, तो आर्थिक विकास का लाभ व्यापक समाज तक नहीं पहुंचेगा। श्रमिकों को उचित वेतन, सामाजिक सुरक्षा, स्थायी रोजगार और कार्यस्थल पर सम्मान मिलना चाहिए। स्वचालन और तकनीकी बदलाव से होने वाले लाभ में भी श्रमिकों की हिस्सेदारी सुनिश्चित करने पर विचार करना होगा।

5. आंकड़ों की पारदर्शिता और आलोचना के प्रति सहिष्णुता

ग्लोबल हंगर इंडेक्स या किसी अन्य अंतरराष्ट्रीय सूचकांक की पद्धति में खामियां हो सकती हैं। उनका वैज्ञानिक परीक्षण और आलोचना होनी चाहिए। लेकिन हर असुविधाजनक आंकड़े को साजिश बताकर खारिज कर देना उचित नहीं है। सरकार को आलोचकों की बात सुननी चाहिए, स्वतंत्र संस्थाओं को काम करने देना चाहिए और आंकड़ों की पारदर्शिता सुनिश्चित करनी चाहिए।

निष्कर्ष: विकास का दावा नहीं, नागरिकों का जीवन महत्वपूर्ण है

आजादी के लगभग आठ दशक बाद भारत का बांग्लादेश जैसे पड़ोसी देश के साथ प्रति व्यक्ति आय, पोषण, महिला शिक्षा और निर्यात जैसे मानकों पर प्रतिस्पर्धा करना अपने आप में कोई शर्म की बात नहीं है। आर्थिक विकास की तुलना का उद्देश्य किसी देश को नीचा दिखाना नहीं, बल्कि अपनी कमजोरियों को पहचानना और बेहतर नीतियों से सीखना होना चाहिए।

बांग्लादेश की कुछ उपलब्धियों की सराहना करने का अर्थ भारत की उपलब्धियों को नकारना नहीं है। उसी तरह भारत की विशाल अर्थव्यवस्था और तकनीकी क्षमता का उल्लेख करने से गरीबी, बेरोजगारी, कुपोषण और असमानता की समस्याएं समाप्त नहीं हो जातीं।

सबसे पहले यह स्वीकार करना होगा कि पिछले एक दशक में हमारी आर्थिक नीतियों और उनके क्रियान्वयन में कुछ गंभीर कमियां रही हैं। विकास का मूल्यांकन केवल GDP की वृद्धि दर, शेयर बाजार की ऊंचाई, अरबपतियों की संख्या या बड़े-बड़े बुनियादी ढांचे से नहीं होना चाहिए।

वास्तविक विकास वह है जिसमें नागरिकों को सम्मानजनक रोजगार मिले, उनकी वास्तविक आय बढ़े, बच्चों को पर्याप्त पोषण और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिले, महिलाओं को समान अवसर मिलें तथा स्वास्थ्य सेवाएं सबकी पहुंच में हों।

सरकार का दायित्व केवल आर्थिक वृद्धि के आंकड़े प्रस्तुत करना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना भी है कि उस वृद्धि का लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे।

भारत के पास अभी भी अपनी आर्थिक और सामाजिक स्थिति बदलने की पूरी क्षमता है। जरूरत है सही प्राथमिकताएं तय करने, नीतिगत गलतियों को स्वीकार करने, आंकड़ों के प्रति ईमानदार रहने और सुधार की दिशा में ठोस कदम उठाने की।

समस्या यह नहीं है कि बांग्लादेश कुछ सूचकांकों में भारत से आगे क्यों है। असली समस्या यह है कि भारत अपनी कमजोरियों को स्वीकार करके उनसे सीखने के लिए कितना तैयार है।

क्योंकि किसी भी देश की महानता उसके प्रचार से नहीं, उसके नागरिकों के जीवन की गुणवत्ता से तय होती है।

आर्थिक विकास का मूल्यांकन केवल GDP से नहीं, बल्कि रोजगार, मजदूरी, पोषण, शिक्षा, स्वास्थ्य और आर्थिक असमानता से होना चाहिए।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *