विलंबित न्याय, अन्याय का ही एक रूप है
(Justice Delayed Is Justice Denied)
न्यायपालिका का मूल उद्देश्य केवल विवादों का निपटारा करना नहीं, बल्कि पीड़ित को समय पर न्याय दिलाना और अन्याय करने वाले को कानून के दायरे में जवाबदेह बनाना भी है। लेकिन जब न्याय मिलने में वर्षों या दशकों लग जाते हैं, तब न्याय का वास्तविक उद्देश्य ही कमजोर पड़ जाता है। इसीलिए एक प्रसिद्ध न्यायिक सिद्धांत है—“Justice Delayed is Justice Denied” अर्थात न्याय में देरी, न्याय से वंचित करने के समान है।
इस समस्या का एक बेहद गंभीर पहलू आर्थिक अपराधों और धन की धोखाधड़ी से जुड़े मुकदमों में दिखाई देता है। मान लीजिए, किसी व्यक्ति ने दूसरे व्यक्ति से धोखाधड़ी करके ₹10 लाख हड़प लिए। पीड़ित न्याय पाने के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाता है। मुकदमा शुरू होता है, लेकिन सुनवाई, तारीखों, गवाहियों, अपीलों और अन्य कानूनी प्रक्रियाओं के बीच फैसला आने में दस साल लग जाते हैं।
अब इस स्थिति के आर्थिक पक्ष पर विचार कीजिए। जिस व्यक्ति पर ₹10 लाख हड़पने का आरोप है, वह उस धनराशि को अपने पास रखकर उसका उपयोग कर सकता है, उससे ब्याज या निवेश का लाभ कमा सकता है और उसी आर्थिक संसाधन के सहारे वर्षों तक मुकदमा लड़ सकता है। दूसरी ओर, पीड़ित व्यक्ति अपने ही धन से वंचित रहता है। उसे अपने जीवन की आर्थिक आवश्यकताओं के लिए संघर्ष करना पड़ता है और न्याय पाने के लिए वकीलों की फीस, अदालत के खर्च तथा अन्य कानूनी व्यय भी उठाने पड़ते हैं।
विडंबना देखिए कि यदि दस साल बाद आरोपी बरी भी हो जाता है, तो संभव है कि वह अपने पास मौजूद धन का लाभ उठाते हुए पूरे समय मुकदमा लड़ता रहा हो। जबकि शिकायतकर्ता का मूल धन, उससे मिलने वाला संभावित लाभ और मुकदमे में खर्च हुई अतिरिक्त रकम—सब कुछ उसके हाथ से जा चुका होता है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या केवल अंतिम फैसला सुना देना ही न्याय है? क्या न्याय व्यवस्था ने पीड़ित के आर्थिक नुकसान और मुकदमे की लंबी अवधि से पैदा हुई असमानता पर भी विचार किया?
इसका अर्थ यह नहीं कि आरोप लगते ही किसी व्यक्ति को दोषी मान लिया जाए या उसकी संपत्ति मनमाने ढंग से जब्त कर ली जाए। कानून का एक अनिवार्य सिद्धांत है—जब तक अपराध सिद्ध न हो, आरोपी निर्दोष माना जाएगा। लेकिन निर्दोषता की इस धारणा का अर्थ यह भी नहीं होना चाहिए कि विवादित धन का इस्तेमाल करके कोई पक्ष न्यायिक प्रक्रिया के दौरान अनुचित आर्थिक लाभ उठाता रहे।
इसलिए आर्थिक अपराधों के मामलों में न्यायपालिका को मुकदमे की शुरुआत में ही प्रभावी अंतरिम व्यवस्था करने पर विचार करना चाहिए। जहां प्रथमदृष्टया धोखाधड़ी और धन के स्रोत या हस्तांतरण के पर्याप्त प्रमाण हों, वहां अदालत उचित कानूनी प्रक्रिया, सुनवाई और आवश्यक सुरक्षा उपायों के साथ विवादित धनराशि को सुरक्षित रखने, बैंक खाते में जमा कराने, न्यायालय में जमा कराने अथवा संपत्ति पर अस्थायी रोक लगाने का आदेश दे सकती है। जरूरत पड़ने पर धन के मूल्य में समय के साथ होने वाली कमी को रोकने के उपाय भी किए जाने चाहिए। यह व्यवस्था निष्पक्ष होनी चाहिए और आरोप गलत साबित होने की स्थिति में आरोपी के अधिकारों की भी रक्षा करनी चाहिए।
साथ ही, आर्थिक अपराधों के मुकदमों के लिए समयबद्ध सुनवाई, अनावश्यक स्थगन पर नियंत्रण और अपीलों के शीघ्र निस्तारण की व्यवस्था आवश्यक है।
न्याय का अर्थ केवल यह तय करना नहीं है कि कौन सही था और कौन गलत। न्याय का अर्थ यह भी है कि पीड़ित को इतना लंबा इंतजार और इतना आर्थिक नुकसान न उठाना पड़े कि फैसला आने तक न्याय पाने का उसका उद्देश्य ही समाप्त हो जाए।
यदि न्याय की प्रक्रिया आरोपी के लिए आर्थिक लाभ का अवसर और पीड़ित के लिए अंतहीन आर्थिक दंड बन जाए, तो व्यवस्था की निष्पक्षता पर सवाल उठना स्वाभाविक है। न्याय केवल होना ही नहीं चाहिए, बल्कि समय पर होता हुआ दिखाई भी देना चाहिए।
क्योंकि अंततः सवाल यही है—दस साल बाद मिला न्याय, क्या वास्तव में न्याय है, या केवल मुकदमे का अंत?
न्यायिक लंबित मामलों (Case Pendency) की समस्या से आपको अवगत नहीं करवा रहा हूँ, बल्कि उसके समाधान के लिए एक व्यावहारिक कार्ययोजना भी सुझा रहा हूँ। साथ ही, न्यायपालिका की जवाबदेही के साथ न्यायाधीशों की मानवीय संवेदनशीलता का प्रश्न भी उठा रहा हूँ।
मुकदमों का अंबार खत्म करने के लिए इच्छाशक्ति और कार्ययोजना जरूरी
न्यायपालिका यदि वास्तव में मुकदमों की लंबित संख्या (Case Pendency) कम करना चाहती है, तो उसे केवल रिक्त पद भरने, अदालतों की संख्या बढ़ाने और अतिरिक्त संसाधनों की मांग तक सीमित नहीं रहना चाहिए। इसके लिए एक स्पष्ट, समयबद्ध और जवाबदेह कार्ययोजना बनानी होगी।
उदाहरण के लिए, न्यायपालिका यह लक्ष्य निर्धारित करे कि प्रत्येक नए मुकदमे का निस्तारण अधिकतम छह महीने में किया जाएगा और इसी छह महीने की अवधि में पुराने लंबित मुकदमों की भी एक निश्चित संख्या का अनिवार्य रूप से निस्तारण होगा। छह महीने की अवधि केवल उदाहरण है; वास्तविक समय-सीमा मुकदमे की प्रकृति और जटिलता के अनुसार तय की जा सकती है। कुछ असाधारण मामलों को, उचित कारण दर्ज करते हुए, अधिक समय देने की छूट हो सकती है। लेकिन अपवाद को सामान्य नियम नहीं बनने देना चाहिए।
इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए प्रत्येक अदालत की कार्यक्षमता, उपलब्ध न्यायिक समय और लंबित मामलों की प्रकृति के आधार पर वार्षिक एवं मासिक लक्ष्य तय किए जा सकते हैं। साथ ही, नियमित समीक्षा और जवाबदेही की व्यवस्था भी होनी चाहिए।
यहां एक बात स्पष्ट करना जरूरी है कि हमारे न्यायाधीश न तो बेवकूफ हैं और न ही अयोग्य। उनमें कानूनी ज्ञान, अनुभव और निर्णय लेने की क्षमता की कमी मानना उचित नहीं होगा। लेकिन न्यायिक व्यवस्था में एक ऐसी संवेदनशीलता का अभाव अवश्य दिखाई देता है, जो आम नागरिक की वास्तविक परेशानियों को समझने के लिए जरूरी है। न्यायाधीशों को यह महसूस करना होगा कि उनके सामने आने वाली प्रत्येक फाइल के पीछे किसी व्यक्ति का जीवन, परिवार, मेहनत की कमाई, सम्मान और भविष्य जुड़ा होता है।
न्यायिक प्रक्रिया को केवल तारीखों, नियमों और फाइलों के नियमित निस्तारण का प्रशासनिक काम समझकर नहीं चलाया जा सकता। न्यायाधीशों को स्थापित ढर्रे से बाहर निकलकर यह समझना होगा कि अनावश्यक देरी भी किसी व्यक्ति के साथ अन्याय का कारण बन सकती है। न्यायिक दक्षता के साथ मानवीय संवेदनशीलता भी न्याय का अनिवार्य गुण है।
न्यायपालिका को यह संकल्प लेना होगा कि कोई भी नागरिक केवल इसलिए न्याय से वंचित न रह जाए कि उसके मुकदमे का फैसला सुनने तक उसके जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा बीत गया।
न्यायपालिका की सफलता का मूल्यांकन केवल उसके द्वारा दिए गए फैसलों की संख्या से नहीं, बल्कि इस बात से भी होना चाहिए कि कितने लोगों को समय पर राहत मिली और कितने नागरिकों को वर्षों तक न्याय के इंतजार में आर्थिक, सामाजिक और मानसिक पीड़ा नहीं झेलनी पड़ी।
यही न्यायिक व्यवस्था की वास्तविक जनपक्षधरता और संवैधानिक जिम्मेदारी की कसौटी होनी चाहिए।

