बिछड़ना भी प्रेम का हिस्सा है  (एक संस्मरण)

जिन्दगी के वे अनमोल पल, जो कभी-कभी याद आ जाते हैं!

 

क्या आपके जीवन में भी कोई ऐसा रिश्ता रहा है, जो साथ नहीं रहा, पर भीतर से बदल गया? इस हिंदी संस्मरण में मैं ऐसी ही एक कहानी साझा कर रहा हूँ, जिसे मैं आज भी कभी-कभी याद करता हूँ। (पात्रों के नाम बदले गए हैं।)

 

बात 2006 की है। समय करीब 1 बजे दोपहर, फरवरी का महीना, न सर्दी, न गर्मी। मैं जिला चिकित्सालय के कक्ष सं. 4 में मरीज देख रहा था।

 

दोपहर का समय था। अस्पताल की ओपीडी में सुबह जैसी भीड़ अब नहीं रह गई थी, लेकिन मरीजों का आना-जाना जारी था। मेज पर रखी फाइलों, पर्चों और दवाइयों के बीच मैं एक के बाद एक मरीज देख रहा था। तभी दरवाजे पर किसी के हल्के से खटखटाने की आवाज आई।

 

“आइए!”

 

दरवाजा खुला और एक युवती भीतर दाखिल हुई। उम्र लगभग उन्नीस-बीस वर्ष। हल्के आसमानी रंग का सलवार-सूट, कंधों पर करीने से रखा दुपट्टा, बड़ी-बड़ी आंखें और चेहरे पर एक अजीब-सी संजीदगी। उसके साथ कोई नहीं था।

 

“डॉक्टर साहब, क्या आपसे दो मिनट अकेले में बात हो सकती है?”

 

मैंने सामने रखी कुर्सी की ओर इशारा किया।

 

“जी, बैठिए। बताइए, क्या परेशानी है?”

 

वह बैठ तो गई, लेकिन कुछ क्षण तक चुप रही। ऐसा लग रहा था जैसे अपने शब्दों को व्यवस्थित करने की कोशिश कर रही हो।

 

“परेशानी शरीर की नहीं है, डॉक्टर साहब। परेशानी शायद मन की है।”

 

मैंने पहली बार उसकी आंखों में गौर से देखा। उनमें कोई शिकायत थी, कोई बेचैनी थी, या शायद कोई ऐसा सवाल, जिसका जवाब वह स्वयं भी नहीं जानती थी।

 

मैंने मुस्कराकर कहा, “मन की परेशानी का इलाज भी होता है, बस मरीज को अपनी बात कहने में संकोच नहीं करना चाहिए।”

 

वह पहली बार मुस्कराई।

 

“अगर मरीज अपनी बीमारी ही डॉक्टर को बता दे, तो आधी बीमारी तो वहीं खत्म हो जाती है, है न?”

 

“बिल्कुल!”

 

उस दिन उसने अपना नाम बताया—प्रज्ञा।

 

उसने अपनी कुछ व्यक्तिगत परेशानियां बताईं। बातचीत के दौरान मुझे महसूस हुआ कि वह जितनी सुंदर थी, उससे कहीं अधिक संवेदनशील और विचारशील थी। उसे किताबें पढ़ने का शौक था। उसे प्रकृति से प्रेम था। वह रिश्तों को औपचारिकता नहीं, बल्कि भावनाओं की सच्चाई से परखती थी।

 

कुछ देर बाद वह उठी और बोली, “डॉक्टर साहब, आपसे बात करके अच्छा लगा। कभी-कभी किसी अनजान व्यक्ति से बात करना अपनों से बात करने से ज्यादा आसान होता है।”

मैंने कहा, “शायद इसलिए कि अनजान व्यक्ति से हम अपनी छवि बचाने की चिंता नहीं करते।”

 

वह दरवाजे तक पहुंची, फिर पलटकर बोली, “मैं फिर आ सकती हूं?”

 

मैंने सहज भाव से कहा, “अस्पताल सबके लिए है।”

 

वह मुस्कराई और चली गई।

 

उस समय मुझे कहां मालूम था कि यह छोटी-सी मुलाकात मेरी स्मृतियों में एक ऐसी कहानी का पहला पन्ना बन जाएगी, जिसे मैं वर्षों बाद भी अपने मन में दोहराता रहूंगा।

 

पहली मुलाकात के बाद

 

उस दिन शाम को घर लौटने के बाद भी प्रज्ञा की बातें मुझे याद आती रहीं। यह कोई असाधारण घटना नहीं थी। अस्पताल में प्रतिदिन सैकड़ों लोग मिलते थे। उनके सुख-दुख सुनना मेरे पेशे का हिस्सा था। फिर भी उस युवती की आंखों में कुछ ऐसा था, जो बाकी चेहरों से अलग था।

 

मैंने स्वयं को समझाया कि यह महज एक सामान्य मुलाकात थी।

 

लेकिन जिन्दगी में कुछ मुलाकातें सामान्य होकर भी सामान्य नहीं रहतीं।

 

लगभग एक सप्ताह बाद, एक दिन सुबह अस्पताल पहुंचते समय मैंने उसे मुख्य द्वार के पास खड़े देखा। उसने मुझे देखते ही अभिवादन किया।

 

“नमस्कार, डॉक्टर साहब!”

 

“अरे, प्रज्ञा जी! आज यहां कैसे?”

 

“आपने कहा था कि अस्पताल सबके लिए है। सोचा, आज अस्पताल को बाहर से ही देख लूं!”

 

मैं हंस पड़ा।

 

“आपकी बातें भी आपकी तरह दिलचस्प हैं।”

 

उसने कहा, “और आप हमेशा इतने गंभीर रहते हैं या मरीजों के सामने ही ऐसे रहते हैं?”

 

“यह तो मरीजों की बीमारी पर निर्भर करता है।”

 

“और अगर मरीज का दिल बीमार हो?”

 

मैंने उसकी ओर देखा। वह मुस्करा रही थी, लेकिन उसकी आंखों में एक अनकहा प्रश्न था।

 

मैंने कहा, “तो फिर डॉक्टर को पहले यह समझना पड़ता है कि बीमारी सचमुच है भी या मरीज केवल बहाना बना रहा है।”

 

वह खिलखिलाकर हंस पड़ी।

 

उसकी हंसी में ऐसी सहजता थी कि कुछ क्षण के लिए अस्पताल का शोर भी अच्छा लगने लगा।

 

हमारी दूसरी मुलाकात बस इतनी ही थी, मगर उस दिन पहली बार मुझे लगा कि प्रज्ञा केवल औपचारिक बातचीत करने नहीं आई थी।

 

दूसरी मुलाकात: पुस्तकालय में

 

मार्च का पहला सप्ताह था। एक रविवार को मैं शहर के सार्वजनिक पुस्तकालय में कुछ किताबें देखने गया। चिकित्सा विज्ञान के अलावा मुझे सामाजिक चिंतन, दर्शन और साहित्य में भी रुचि थी।

पुस्तकालय के एक कोने में खड़ी युवती को देखकर मैं ठिठक गया।

 

वह प्रज्ञा थी।

 

उसके हाथ में एक पुस्तक थी। मुझे देखकर उसके चेहरे पर ऐसी खुशी आई, मानो किसी परिचित संसार से अचानक कोई अपना निकल आया हो।

 

“डॉक्टर साहब! आप यहां भी?”

 

“किताबें पढ़ने के लिए पुस्तकालय आता हूं। आप यहां क्या कर रही हैं?”

 

उसने पुस्तक का शीर्षक दिखाते हुए कहा, “मनुष्य को समझने की कोशिश कर रही हूं।”

 

मैंने हंसकर पूछा, “कोई खास मनुष्य?”

 

वह कुछ क्षण चुप रही। फिर बोली, “अभी तो पूरी मनुष्यता ही बहुत जटिल लगती है।”

 

हम पुस्तकालय से बाहर आए और पास के छोटे-से चायघर में बैठ गए। पहली बार हमने अस्पताल की चारदीवारी से बाहर बैठकर लंबी बातचीत की।

 

बातें किताबों से शुरू हुईं, समाज पर पहुंचीं और फिर जीवन तथा प्रेम तक चली गईं।

 

उसने पूछा, “आप प्रेम को क्या मानते हैं?”

 

मैंने कहा, “मेरे विचार से प्रेम किसी को अपना बना लेने का नाम नहीं है। प्रेम का अर्थ है किसी दूसरे व्यक्ति की स्वतंत्रता, गरिमा और खुशी को भी उतना ही महत्व देना, जितना हम अपनी खुशी को देते हैं।”

 

वह कुछ देर मेरी ओर देखती रही।

 

“और अगर वह व्यक्ति आपसे दूर चला जाए?”

 

“तो दुख होगा। शायद बहुत दुख होगा। लेकिन प्रेम के नाम पर उसे बांधकर रखना मुझे उचित नहीं लगता।”

 

उसने चाय का कप मेज पर रख दिया।

 

“आप जानते हैं, डॉक्टर साहब, आपकी यही बात मुझे अच्छी लगती है। आप जवाब देते समय यह नहीं सोचते कि सामने वाला क्या सुनना चाहता है।”

 

मैंने कहा, “और आपको क्या सुनना अच्छा लगता है?”

 

उसने मेरी आंखों में देखते हुए कहा, “सच।”

 

उस दिन पुस्तकालय से निकलते समय हम दोनों ने एक-दूसरे का फोन नंबर लिया। यह हमारी तीसरी मुलाकात थी। अब हमारे बीच अनजान लोगों वाली दूरी कुछ कम हो चुकी थी।

 

तीसरी मुलाकात: तालाब के किनारे

 

कुछ दिनों बाद प्रज्ञा का फोन आया।

 

“डॉक्टर साहब, रविवार को आपके पास समय है?”

 

“क्यों, कोई बीमारी हो गई?”

 

“हां, एक बीमारी है। उसका इलाज आपके पास ही है।”

 

“अच्छा! कौन-सी बीमारी?”

 

“आपसे बातें करने की आदत।”

 

मैं कुछ क्षण चुप रहा। फिर हम दोनों हंस पड़े।

 

रविवार को हम शहर के अंदर माहिल तालाब पर मिले। फरवरी की नरम धूप अब मार्च की सुनहरी धूप में बदलने लगी थी। नदी का पानी शांत था। दूर कुछ बच्चे खेल रहे थे और किनारे पेड़ों पर बैठे पक्षी अपनी भाषा में न जाने क्या बातचीत कर रहे थे।

 

हम एक पेड़ की छाया में बैठ गए।

 

प्रज्ञा ने अचानक पूछा, “क्या आपको कभी किसी से प्रेम हुआ है?”

 

मैंने कुछ क्षण सोचा।

 

“जीवन में आकर्षण कई बार हुआ होगा। लेकिन ऐसा प्रेम, जिसमें व्यक्ति दूसरे के सुख-दुख को अपने जीवन का हिस्सा मानने लगे, शायद बहुत कम लोगों को मिलता है।”

 

“और आपको मिला?”

 

मैंने उसकी ओर देखा।

 

“शायद मैं अभी उसे समझने की कोशिश कर रहा हूं।”

 

उसने नजरें झुका लीं।

 

कुछ देर बाद उसने धीरे से कहा, “मुझे डर लगता है।”

 

“किस बात से?”

 

“किसी से बहुत ज्यादा जुड़ जाने से। क्योंकि जितना गहरा जुड़ाव होता है, बिछड़ने का डर भी उतना ही गहरा होता है।”

 

मैंने कहा, “प्रज्ञा, जीवन में कोई रिश्ता पूरी तरह सुरक्षित नहीं होता। न मित्रता, न प्रेम, न परिवार। लेकिन केवल बिछड़ने के डर से किसी को चाहना ही छोड़ दें, तो शायद हम जीना ही छोड़ देंगे।”

 

उसने मेरा हाथ अपने हाथ में ले लिया।

 

वह स्पर्श बहुत सहज था, फिर भी मेरे भीतर जैसे कोई बंद दरवाजा खुल गया।

 

उसने कहा, “अगर कभी मैं आपसे बहुत ज्यादा प्रेम करने लगूं, तो?”

 

मैंने उसकी आंखों में देखते हुए उत्तर दिया, “तो मुझे यह जिम्मेदारी निभानी होगी कि आपके प्रेम को कभी आपकी कमजोरी न बनने दूं।”

 

उसकी आंखें नम हो गईं।

 

उस दिन पहली बार मुझे लगा कि हम दोनों के बीच कुछ ऐसा जन्म ले चुका है, जिसे केवल मित्रता कहकर टाला नहीं जा सकता।

 

चौथी मुलाकात: बारिश और वह छाता

 

अप्रैल की एक शाम अचानक मौसम बदल गया। मैं अस्पताल से निकल ही रहा था कि तेज हवा के साथ बारिश शुरू हो गई। मुख्य द्वार के पास प्रज्ञा खड़ी थी। उसके हाथ में छोटा-सा छाता था, जो उस बारिश के सामने लगभग बेकार था।

 

“आप यहां क्या कर रही हैं?” मैंने पूछा।

 

“आपसे मिलने आई थी। लेकिन लगता है, आज बादलों ने भी मुलाकात में हिस्सा लेने का फैसला कर लिया है।”

 

मैंने अपनी गाड़ी की ओर इशारा किया। वह मेरे साथ चल पड़ी।

 

रास्ते में बारिश इतनी तेज हो गई कि हमें सड़क किनारे एक चाय की दुकान पर रुकना पड़ा। दुकान के टीन के छप्पर पर गिरती बूंदें एक अजीब-सा संगीत पैदा कर रही थीं।

 

प्रज्ञा ने कहा, “अगर जिन्दगी में कभी ऐसा दिन आए कि हम दोनों के पास कुछ भी न हो—न घर, न पैसा, न कोई सहारा—तब क्या करेंगे?”

 

मैंने मुस्कराकर कहा, “पहले चाय पिएंगे। उसके बाद मिलकर कोई रास्ता निकालेंगे।”

 

वह हंसते-हंसते गंभीर हो गई।

 

“आप मजाक कर रहे हैं। मैं सच पूछ रही हूं।”

 

मैंने उसका हाथ थाम लिया।

 

“प्रज्ञा, मैं आपको कोई ऐसा वादा नहीं करना चाहता कि जीवन में कभी कठिनाई नहीं आएगी। कठिनाइयां आएंगी। कभी परिस्थितियां हमें तोड़ने की कोशिश करेंगी। लेकिन जब तक हम एक-दूसरे से सच बोलेंगे, एक-दूसरे का सम्मान करेंगे और साथ रहने का निर्णय स्वतंत्र मन से करेंगे, तब तक किसी भी समस्या का सामना करने की कोशिश कर सकते हैं।”

 

उसने मेरे हाथ पर अपनी उंगलियां कस दीं।

 

“और अगर दुनिया हमारे खिलाफ हो गई?”

 

“तो हम दुनिया से लड़ने से पहले यह देखेंगे कि कहीं हम स्वयं एक-दूसरे के खिलाफ तो नहीं हो गए।”

 

वह कुछ देर तक चुप रही। फिर बोली, “आपसे प्रेम करना आसान नहीं होगा।”

 

मैंने पूछा, “क्यों?”

 

“क्योंकि आप केवल प्रेम नहीं करते, प्रेम का अर्थ भी समझाते रहते हैं!”

 

मैं हंस पड़ा। वह भी हंसने लगी।

 

बारिश थमने तक हमारी चाय कई बार ठंडी और गर्म हुई। उस शाम हम दोनों ने महसूस किया कि प्रेम केवल रोमांटिक शब्दों में नहीं, बल्कि कठिन परिस्थितियों में एक-दूसरे के साथ खड़े रहने की इच्छा में भी बसता है।

 

पांचवीं मुलाकात: शहर का पुराना पार्क

 

मई की शुरुआत में हम शहर के एक पुराने पार्क में मिले। पेड़ों की छाया में बैठकर हम घंटों बातें करते रहे।

 

अब प्रज्ञा मुझसे अपने मन की छोटी-से-छोटी बात साझा करने लगी थी। कभी अपने बचपन की स्मृतियां, कभी परिवार की चिंताएं, कभी भविष्य को लेकर आशंकाएं।

 

उस दिन उसने मुझसे कहा, “आपसे मिलने के बाद मुझे पहली बार लगता है कि कोई मेरी बात केवल सुनता नहीं, समझने की कोशिश भी करता है।”

 

मैंने कहा, “शायद इसलिए कि मैं आपको बदलने के बजाय समझना चाहता हूं।”

 

उसने अचानक पूछा, “अगर मैं कभी गलत साबित हुई, तब भी?”

 

“तब भी। लेकिन समझने का अर्थ यह नहीं कि मैं आपकी हर बात से सहमत हो जाऊंगा। हम असहमत हो सकते हैं, बहस कर सकते हैं, एक-दूसरे की आलोचना कर सकते हैं। बस अपमान नहीं करेंगे।”

 

प्रज्ञा ने मुस्कराते हुए कहा, “आपके साथ प्रेम करना किसी पाठशाला में पढ़ने जैसा है।”

 

“और आप मेरी सबसे कठिन विद्यार्थी हैं।”

 

उसने मेरा हाथ पकड़कर कहा, “तो फिर यह पाठशाला कभी बंद मत कीजिएगा।”

 

मैंने उसके हाथ पर अपना दूसरा हाथ रख दिया।

 

“जब तक हम दोनों सीखना चाहेंगे, यह पाठशाला चलती रहेगी।”

 

उस दिन लौटते समय उसने पहली बार मेरे कंधे पर सिर रख दिया। वह कुछ क्षणों का मौन था, मगर उस मौन में जितनी निकटता थी, उतनी शायद सैकड़ों शब्दों में भी नहीं होती।

 

छठी मुलाकात: रेलवे स्टेशन का विदा-क्षण

 

जून के महीने में प्रज्ञा को कुछ दिनों के लिए अपने रिश्तेदारों के यहां जाना पड़ा। उसे विदा करने मैं रेलवे स्टेशन पहुंचा।

 

प्लेटफॉर्म पर काफी भीड़ थी। ट्रेन आने की घोषणा हो चुकी थी। वह बार-बार अपनी घड़ी देख रही थी, मगर उसके कदम आगे नहीं बढ़ रहे थे।

 

“आप वापस कब आएंगी?” मैंने पूछा।

 

“एक सप्ताह में।”

 

“केवल एक सप्ताह?”

 

उसने मेरी ओर देखा।

 

“आपको एक सप्ताह बहुत लंबा लग रहा है?”

 

मैंने हंसने की कोशिश की, लेकिन शायद मेरे चेहरे ने मेरी बेचैनी प्रकट कर दी थी।

 

उसने धीरे से कहा, “मुझे भी।”

 

ट्रेन प्लेटफॉर्म पर आ गई। लोग चढ़ने लगे। प्रज्ञा ने मेरा हाथ पकड़ लिया।

 

“एक बात पूछूं?”

 

“पूछिए।”

 

“क्या आप मुझसे प्रेम करते हैं?”

 

मैंने उसकी आंखों में देखते हुए कहा, “हां, प्रज्ञा। शायद उस दिन से, जब आपने अस्पताल में बैठकर कहा था कि परेशानी शरीर की नहीं, मन की है। उस दिन मैं नहीं जानता था कि यह भावना प्रेम में बदलेगी। आज जानता हूं कि आपकी अनुपस्थिति मुझे खलती है, आपकी खुशी मुझे खुश करती है और आपका दुख मुझे भीतर तक प्रभावित करता है।”

 

उसकी आंखों से आंसू बह निकले।

 

“मैं भी आपसे प्रेम करती हूं। बहुत ज्यादा।”

 

ट्रेन की सीटी सुनाई दी। वह डिब्बे में चढ़ गई, लेकिन दरवाजे पर खड़ी रही।

 

मैंने हाथ हिलाया।

 

उसने कहा, “एक वादा कीजिए।”

 

“कौन-सा?”

 

“कभी किसी परिस्थिति में अपने मन की बात मुझसे छिपाइएगा नहीं।”

 

मैंने उत्तर दिया, “और आप वादा कीजिए कि किसी गलतफहमी को अपने मन में जगह देने से पहले मुझसे पूछेंगी।”

 

उसने सिर हिलाया।

 

ट्रेन चल पड़ी। वह खिड़की के पास आ गई और तब तक हाथ हिलाती रही, जब तक वह भीड़ और धुएं के बीच दिखाई देना बंद नहीं हो गई।

 

उस दिन घर लौटते समय मुझे पहली बार प्रेम की एक नई अनुभूति हुई—किसी को पाकर खुशी होना प्रेम है, लेकिन उसके दूर जाने पर उसकी कमी महसूस करना भी प्रेम का ही हिस्सा है।

 

सातवीं मुलाकात: चांदनी रात और हमारे वादे

 

एक सप्ताह बाद प्रज्ञा लौट आई। हम शहर के एक शांत बगीचे में मिले। पूर्णिमा की रात थी। चांदनी पेड़ों की पत्तियों से छनकर जमीन पर बिखर रही थी।

 

वह मेरे पास बैठी और बोली, “आपने मुझे बहुत याद किया?”

 

मैंने कहा, “इतना कि कई बार फोन उठाकर आपको फोन करने का मन हुआ। फिर सोचा, शायद आप व्यस्त होंगी।”

 

“और मैंने?”

 

“आप बताइए।”

 

उसने मेरा हाथ पकड़ लिया।

 

“मैंने हर दिन सोचा कि काश, आप यहां होते।”

 

कुछ क्षण बाद उसने गंभीर होकर कहा, “अगर कभी ऐसा हुआ कि हमें एक-दूसरे से दूर रहने के लिए मजबूर होना पड़े, तो क्या हम अपने प्रेम को बचा पाएंगे?”

 

मैंने कहा, “प्रेम कोई वस्तु नहीं है, जिसे किसी तिजोरी में बंद करके सुरक्षित रखा जा सके। उसे हर दिन अपने व्यवहार से जीवित रखना पड़ता है।”

 

उसने पूछा, “और अगर एक दिन मैं आपसे कहूं कि मेरे बिना रह लीजिए?”

 

मैंने उसके हाथों को अपने हाथों में लेकर कहा, “मैं आपके बिना जीने की कोशिश जरूर करूंगा, क्योंकि जीवन किसी एक व्यक्ति पर समाप्त नहीं हो जाता। लेकिन मैं आपको भूल जाने का झूठा वादा नहीं करूंगा।”

वह मेरी ओर झुक आई।

 

“मैं चाहती हूं कि आप मुझे इतना चाहें कि मेरे बिना आपका मन न लगे, लेकिन इतना भी नहीं कि मेरे बिना आपका जीवन ही समाप्त हो जाए।”

 

मैंने कहा, “और मैं चाहता हूं कि हमारा प्रेम हमें कमजोर नहीं, बल्कि बेहतर इंसान बनाए।”

 

उस रात हमने एक-दूसरे के साथ रहने, सच बोलने और मुश्किल समय में एक-दूसरे का साथ देने के वादे किए।

 

हमने यह भी कहा कि यदि कभी जीवन हमें ऐसी परिस्थितियों में खड़ा कर दे, जहां एक-दूसरे की रक्षा करने के लिए कोई बड़ा त्याग करना पड़े, तो हम अपने प्रेम की गरिमा को सबसे ऊपर रखेंगे।

 

उसने हंसकर कहा, “आपके साथ मरने के वादे भी जीवन जीने की शर्तों के साथ आते हैं!”

 

मैंने उत्तर दिया, “क्योंकि मैं आपके साथ जीना चाहता हूं, केवल प्रेम की बातें करके मर जाना नहीं।”

 

वह मेरे सीने से लग गई।

 

उस क्षण लगा, जैसे संसार में हमारे अलावा कोई और है ही नहीं।

 

आठवीं मुलाकात: शहर से बाहर की यात्रा

 

कुछ सप्ताह बाद हम दोनों एक दिन के लिए शहर से बाहर घूमने गए। रास्ते में खेत थे, पेड़ थे, छोटे-छोटे गांव थे और दूर तक फैला खुला आकाश।

 

प्रज्ञा खिड़की से बाहर देखते हुए बोली, “क्या आपको कभी लगता है कि हम अपनी जिन्दगी का बहुत-सा समय दूसरों की अपेक्षाएं पूरी करने में बिता देते हैं?”

 

मैंने कहा, “हां। कभी परिवार के लिए, कभी समाज के लिए, कभी अपनी जिम्मेदारियों के लिए। लेकिन इन सबके बीच स्वयं से यह पूछना भी जरूरी है कि हम वास्तव में चाहते क्या हैं।”

 

“और आप क्या चाहते हैं?”

 

मैंने उसकी ओर देखा।

 

“मैं चाहता हूं कि जीवन के अंतिम दिनों में पीछे मुड़कर देखूं तो यह अफसोस न हो कि मैंने अपनी भावनाओं को केवल इसलिए दबा दिया क्योंकि मैं लोगों की राय से डरता था।”

 

वह चुप हो गई।

 

कुछ देर बाद बोली, “मैं भी चाहती हूं कि जीवन में कम-से-कम एक रिश्ता ऐसा हो, जिसमें मुझे अभिनय न करना पड़े। मैं जैसी हूं, वैसी ही स्वीकार की जाऊं।”

 

मैंने कहा, “तो फिर हम एक-दूसरे के सामने वैसे ही रहेंगे, जैसे वास्तव में हैं। न कोई झूठा आदर्श, न कोई बनावटी छवि।”

 

उस दिन हमने साथ में भोजन किया, गांव के एक छोटे बाजार में घूमे और लौटते समय रास्ते भर बातें करते रहे।

 

वापसी में प्रज्ञा ने अपना सिर मेरे कंधे पर रख दिया।

 

“जानते हैं, आज मैं बहुत खुश हूं।”

 

“क्यों?”

 

“क्योंकि आज मुझे लगा कि प्रेम केवल किसी को पाने का नाम नहीं है। प्रेम किसी के साथ साधारण-से दिन को भी असाधारण बना देने का नाम है।”

 

मैंने उसकी उंगलियां थाम लीं।

 

उस दिन की यात्रा छोटी थी, लेकिन उसकी स्मृति आज भी मेरे मन में एक लंबी, खूबसूरत सड़क की तरह फैली हुई है।

 

नौवीं मुलाकात: पहली नाराजगी

 

हर प्रेम कहानी में केवल मुस्कानें नहीं होतीं। हमारे बीच भी एक दिन ऐसी बात हुई, जिसने पहली बार हमारे रिश्ते की परीक्षा ली।

 

एक दिन प्रज्ञा ने मुझे फोन किया था। मैं अस्पताल के एक जरूरी काम में व्यस्त था और उसका फोन नहीं उठा सका। बाद में भी कई घंटों तक बात नहीं हो पाई।

 

शाम को जब मैंने फोन किया, तो उसकी आवाज में नाराजगी थी।

 

“आपके पास मेरे लिए समय ही नहीं है।”

 

मैंने समझाने की कोशिश की कि काम जरूरी था, लेकिन मेरी बात पूरी होने से पहले ही उसने फोन रख दिया।

 

अगले दिन हम मिले। वह मुझसे आंखें नहीं मिला रही थी।

 

मैंने पूछा, “प्रज्ञा, क्या तुम सचमुच सोचती हो कि मैं तुम्हें नजरअंदाज कर रहा था?”

 

उसने कहा, “मुझे नहीं मालूम। लेकिन जब किसी का इंतजार होता है और उसका फोन नहीं आता, तो मन में तरह-तरह के विचार आते हैं।”

 

मैंने उसकी बात सुनी। फिर कहा, “तुम्हारी नाराजगी समझ सकता हूं। लेकिन अगर तुम मेरे मन की बात जाने बिना ही मेरे इरादे तय कर लोगी, तो हम एक-दूसरे को कैसे समझ पाएंगे?”

 

वह चुप रही।

 

मैंने आगे कहा, “मुझे तुम्हारे फोन का जवाब न दे पाने का अफसोस है। लेकिन मैं यह भी चाहता हूं कि हम दोनों एक-दूसरे की परिस्थितियों को समझें। प्रेम का अर्थ चौबीस घंटे उपलब्ध रहना नहीं, बल्कि एक-दूसरे की जरूरत और मजबूरी दोनों को समझना है।”

 

उसकी आंखें भर आईं।

 

“मुझे डर लगा था कि कहीं मैं आपके लिए उतनी महत्वपूर्ण नहीं रह गई, जितना आप मेरे लिए हैं।”

 

मैंने उसका हाथ पकड़ लिया।

 

“तुम मेरे लिए महत्वपूर्ण हो। लेकिन मैं चाहता हूं कि हमारा रिश्ता डर पर नहीं, विश्वास पर टिका रहे।”

 

उसने धीरे से कहा, “मुझे माफ कर दीजिए।”

 

मैंने कहा, “माफी मुझे भी मांगनी चाहिए। मुझे तुम्हें पहले ही बता देना चाहिए था कि मैं व्यस्त हूं।”

 

हम दोनों मुस्कराए। उस दिन हमारा प्रेम थोड़ा और परिपक्व हुआ। हमने जाना कि रिश्ते केवल भावनाओं से नहीं चलते; संवाद, धैर्य और अपनी गलती स्वीकार करने का साहस भी जरूरी है।

 

दसवीं मुलाकात: वह जन्मदिन

 

प्रज्ञा का जन्मदिन था। मैंने उसे कोई महंगा उपहार नहीं दिया। मैं उसके लिए एक किताब और एक छोटा-सा पत्र लेकर पहुंचा।

 

उसने उपहार खोलकर देखा और कहा, “बस, इतनी-सी किताब?”

 

मैंने मुस्कराकर कहा, “किताब छोटी है, लेकिन इसके साथ एक लंबा पत्र भी है।”

 

उसने पत्र खोला। उसमें मैंने लिखा था—

‘प्रज्ञा, मैं नहीं जानता कि भविष्य हमारे लिए क्या लेकर आएगा। समय बदलता है, परिस्थितियां बदलती हैं और मनुष्य भी बदलते हैं। लेकिन मेरी इच्छा है कि हम एक-दूसरे को बदलने के बजाय एक-दूसरे के विकास में सहभागी बनें।

 

मैं चाहता हूं कि तुम मेरे साथ रहकर अपने सपनों को छोटा न करो। तुम्हारी अपनी पहचान हो, अपनी स्वतंत्रता हो और अपने विचार हों। यदि मेरा प्रेम तुम्हें तुम्हारी स्वतंत्रता से दूर ले जाए, तो वह प्रेम नहीं, स्वार्थ होगा।

मैं तुम्हारे जीवन का ऐसा हिस्सा बनना चाहता हूं, जिसकी उपस्थिति तुम्हें भयभीत नहीं, सुरक्षित महसूस कराए; जो तुम्हारी आवाज दबाए नहीं, बल्कि उसे सुनने का धैर्य रखे।’

 

पत्र पढ़ते-पढ़ते उसकी आंखों से आंसू बहने लगे।

 

“आपको पता है, मुझे आज तक किसी ने ऐसा उपहार नहीं दिया।”

 

मैंने पूछा, “क्या मैं तुम्हें खुश कर पाया?”

 

उसने कहा, “आप मुझे केवल खुश नहीं करते। आप मुझे अपने बारे में बेहतर सोचने के लिए प्रेरित करते हैं।”

 

उस दिन उसने मेरे माथे को चूम लिया।

 

मैं कुछ क्षण के लिए बिल्कुल चुप हो गया। मेरे जीवन में शायद ही किसी भावनात्मक क्षण ने मुझे इतना निःशब्द किया हो।

 

उसने हंसकर पूछा, “डॉक्टर साहब, आज आपके पास कोई इलाज नहीं है?”

 

मैंने कहा, “आज डॉक्टर खुद मरीज बन गया है।”

 

वह खिलखिलाकर हंस पड़ी।

 

ग्यारहवीं मुलाकात: वह अनकहा सच

 

समय बीतता रहा। हमारी मुलाकातें कभी किसी पार्क में होतीं, कभी पुस्तकालय में, कभी चाय की दुकान पर और कभी अस्पताल के बाहर कुछ मिनटों के लिए।

 

लेकिन एक दिन प्रज्ञा बहुत उदास थी।

 

हम शहर के उसी नदी किनारे पहुंचे, जहां कभी उसने पहली बार मेरा हाथ थामा था।

 

उसने काफी देर तक कुछ नहीं कहा। फिर बोली, “मुझे आपसे एक बात कहनी है।”

 

मैंने उसका हाथ पकड़कर कहा, “कहो।”

 

उसने बताया कि उसके जीवन में कुछ ऐसी पारिवारिक और व्यक्तिगत परिस्थितियां थीं, जिनके कारण हमारे भविष्य को लेकर कई कठिन प्रश्न खड़े हो सकते थे। वह नहीं चाहती थी कि भावनाओं के आवेग में हम ऐसे वादे कर बैठें, जिन्हें निभाना हमारे लिए या दूसरे लोगों के लिए पीड़ादायक हो।

 

उसकी आंखों में आंसू थे।

 

“मैं आपसे बहुत प्रेम करती हूं। लेकिन क्या केवल प्रेम होना ही साथ रहने के लिए पर्याप्त है?”

 

यह प्रश्न मेरे भीतर गूंजता रहा।

 

मैंने कुछ देर बाद कहा, “नहीं, प्रज्ञा। प्रेम बहुत महत्वपूर्ण है, लेकिन जीवन केवल प्रेम से नहीं चलता। जिम्मेदारियां, परिस्थितियां, दूसरे लोगों के अधिकार और हमारे निर्णयों के परिणाम भी होते हैं।”

 

वह मेरी ओर देखने लगी।

 

मैंने आगे कहा, “मैं तुम्हें पाने के लिए तुम्हारे जीवन को कठिन नहीं बनाना चाहता। मैं चाहता हूं कि हम अपने प्रेम के प्रति ईमानदार रहें और हर निर्णय सोच-समझकर लें। अगर साथ रहना संभव हुआ, तो पूरी गरिमा के साथ रहेंगे। अगर परिस्थितियां हमारे अनुकूल नहीं हुईं, तो भी एक-दूसरे को दोष देकर अपने प्रेम को अपमानित नहीं करेंगे।”

 

वह फूट-फूटकर रो पड़ी।

 

मैंने उसे अपने पास बैठने दिया। उस दिन मेरे पास उसे चुप कराने के लिए कोई सुंदर वाक्य नहीं था।

 

कभी-कभी प्रेम का सबसे सच्चा रूप किसी समस्या का समाधान देना नहीं, बल्कि दूसरे के दुख के साथ बिना किसी शर्त के उपस्थित रहना होता है।

 

हमने उस दिन कोई अंतिम निर्णय नहीं लिया। हमने केवल यह तय किया कि भय, दबाव या भावनात्मक आवेश में कोई कदम नहीं उठाएंगे।

 

जब हम लौटे, तब हमारे हाथ एक-दूसरे के हाथ में थे, लेकिन दोनों के मन में भविष्य को लेकर अनेक प्रश्न थे।

 

बारहवीं मुलाकात: आखिरी चिट्ठी

 

समय अपनी गति से चलता रहा। जिन्दगी ने हमें ऐसे मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया, जहां हमारी मुलाकातें पहले जैसी नियमित नहीं रह सकीं।

 

एक दिन प्रज्ञा ने मुझसे मिलने के लिए बुलाया। हम उसी पुराने पुस्तकालय के बाहर मिले, जहां कभी हमारी लंबी बातचीत शुरू हुई थी।

 

उसने मुझे एक लिफाफा दिया।

 

“इसे अभी मत पढ़िएगा। घर पहुंचकर पढ़िएगा।”

 

मैंने पूछा, “इसमें क्या है?”

 

उसने कहा, “कुछ ऐसी बातें, जिन्हें मैं सामने बैठकर कह नहीं पाऊंगी।”

 

उस दिन हमने बहुत कम बातें कीं। जाते समय उसने मेरा हाथ पकड़ लिया।

 

“आपने मुझसे वादा किया था कि कभी मेरी स्वतंत्रता को अपने प्रेम की कीमत नहीं बनने देंगे।”

 

मैंने कहा, “मुझे याद है।”

 

“तो आज भी वही वादा निभाइएगा।”

 

मेरे भीतर कुछ टूट-सा गया।

 

मैंने पूछा, “क्या यह हमारी आखिरी मुलाकात है?”

 

उसकी आंखें भर आईं।

 

“मैं नहीं जानती। लेकिन अगर कभी ऐसा हो जाए, तो मैं नहीं चाहती कि आप मेरी यादों को अपनी जिन्दगी की सजा बना लें।”

 

मैंने उसका हाथ थामे रखा।

 

“प्रज्ञा, मैं तुम्हें यह वादा नहीं कर सकता कि तुम्हारी याद नहीं आएगी। लेकिन यह वादा जरूर करता हूं कि तुम्हारी यादों के कारण जीवन से मुंह नहीं मोड़ूंगा।”

 

उसने मुझे गले लगा लिया।

 

वह आलिंगन लंबा था, मौन था और उन तमाम शब्दों से भरा हुआ था, जिन्हें हम दोनों कह नहीं पा रहे थे।

 

फिर वह धीरे-धीरे मुझसे दूर चली गई।

 

मैं देर तक वहीं खड़ा उसे जाते हुए देखता रहा।

 

घर पहुंचकर मैंने लिफाफा खोला। उसके भीतर एक पत्र था।

 

उसने लिखा था—

‘प्रिय डॉक्टर साहब,

पता नहीं, यह पत्र आपको किस दिन पढ़ने को मिलेगा। लेकिन मैं चाहती हूं कि जब भी पढ़ें, आपके चेहरे पर एक हल्की-सी मुस्कान जरूर आए।

आपसे मिलने के बाद मैंने जाना कि किसी के निकट होना और किसी पर अधिकार रखना दो अलग-अलग बातें हैं। आपने मुझे सिखाया कि प्रेम में किसी को बांधने से ज्यादा महत्वपूर्ण है उसे समझना।

मुझे नहीं पता कि भविष्य में हमारी राहें कहां मिलेंगी। मैं यह भी नहीं जानती कि समय हमारे लिए कौन-सा निर्णय लेकर आएगा। लेकिन इतना जानती हूं कि मेरी जिन्दगी में आपका होना एक सुंदर अनुभव रहा है।

अगर कभी आपको मेरी याद आए, तो केवल उन दिनों को याद मत कीजिएगा, जब हम उदास हुए थे। उस पहली मुलाकात को याद कीजिएगा, जब मैंने आपसे कहा था कि परेशानी मन की है। उस चाय को याद कीजिएगा, जो बारिश में ठंडी हो गई थी। उस नदी को याद कीजिएगा, जिसके किनारे आपने मेरा हाथ थामा था। उस चांदनी रात को याद कीजिएगा, जब हमने एक-दूसरे के साथ ईमानदार रहने का वादा किया था।

और सबसे ज्यादा उस हंसी को याद कीजिएगा, जो आपके साथ रहते हुए मेरे चेहरे पर आती थी।

यदि प्रेम का अर्थ केवल साथ रहना होता, तो शायद हमारी कहानी का अर्थ बहुत छोटा होता। मेरे लिए प्रेम का अर्थ है किसी व्यक्ति के जीवन में ऐसा अनुभव छोड़ जाना, जो उसे थोड़ा अधिक संवेदनशील, थोड़ा अधिक मानवीय और थोड़ा अधिक स्वतंत्र बना दे।

अपना खयाल रखिएगा।

आपकी,
प्रज्ञा।’

 

पत्र पढ़ने के बाद मैं बहुत देर तक खामोश बैठा रहा।

 

बाहर शाम ढल रही थी। खिड़की से आती हवा पर्दों को हिला रही थी। मेज पर रखी घड़ी की टिक-टिक सुनाई दे रही थी।

 

मैंने पत्र को सावधानी से मोड़ा और अपनी एक पुरानी डायरी में रख दिया।

 

मुझे नहीं पता था कि भविष्य में प्रज्ञा से फिर मुलाकात होगी या नहीं। लेकिन इतना जानता था कि वह अब मेरी स्मृतियों का एक अभिन्न हिस्सा बन चुकी थी।

 

आज, जब उन दिनों को याद करता हूं

 

आज इतने वर्षों बाद, जब कभी फरवरी की हल्की धूप में बैठता हूं, किसी पुराने पुस्तकालय के सामने से गुजरता हूं या बारिश की बूंदों को टीन की छत पर गिरते हुए सुनता हूं, तो अचानक प्रज्ञा याद आ जाती है।

 

उसकी बड़ी-बड़ी आंखें, उसकी खिलखिलाती हंसी, उसके सवाल, उसकी नाराजगी, उसका हाथ थामने का वह सहज अंदाज—सब कुछ जैसे कल की ही बात हो।

 

कभी-कभी मैं सोचता हूं कि क्या प्रज्ञा भी उन दिनों को याद करती होगी? क्या किसी पुस्तक के पन्नों के बीच रखा कोई सूखा फूल उसे हमारी पहली मुलाकात की याद दिलाता होगा? क्या किसी बारिश भरी शाम को उसे वह छोटी-सी चाय की दुकान याद आती होगी, जहां हमने एक-दूसरे के साथ खड़े रहने का वादा किया था?

 

इन प्रश्नों के उत्तर मेरे पास नहीं हैं।

 

लेकिन अब मुझे यह समझ में आता है कि जीवन में हर सुंदर कहानी का अंत किसी निश्चित परिणाम पर होना जरूरी नहीं है। कुछ कहानियां हमारे भीतर चलती रहती हैं। उनका कोई अंतिम अध्याय नहीं होता, केवल समय के साथ उनका अर्थ बदलता रहता है।

 

प्रज्ञा मेरे जीवन में कितने समय के लिए आई, यह अब उतना महत्वपूर्ण नहीं है। महत्वपूर्ण यह है कि उसके आने से मैंने प्रेम को थोड़ा बेहतर समझा।

 

मैंने जाना कि प्रेम केवल किसी को देखकर दिल का धड़कना नहीं है। प्रेम किसी की बात ध्यान से सुनना है। प्रेम किसी की स्वतंत्रता का सम्मान करना है। प्रेम अपनी गलती स्वीकार करना है। प्रेम दूसरे की आंखों में आंसू देखकर उन्हें पोंछने की कोशिश करना है। और कभी-कभी प्रेम यह स्वीकार करना भी है कि हम किसी को बहुत चाहने के बावजूद उसकी जिन्दगी के सारे प्रश्नों का उत्तर नहीं बन सकते।

 

हमने एक-दूसरे के साथ मर मिटने की बातें भी की थीं। उस उम्र में, उन भावनाओं के बीच, लगता था कि अगर दुनिया हमारे विरुद्ध हो गई तो हम सब कुछ छोड़कर एक-दूसरे के साथ खड़े हो जाएंगे।

 

आज उन वादों को याद करके मुस्कराता हूं।

 

अब लगता है कि किसी के लिए मर मिटने की घोषणा करना आसान है, लेकिन उसके साथ जीवन की साधारण कठिनाइयों को धैर्यपूर्वक जीना कहीं अधिक कठिन और महत्वपूर्ण है।

 

प्रेम की असली परीक्षा किसी चांदनी रात में किए गए वादों से नहीं, बल्कि उन दिनों में होती है जब मन उदास हो, परिस्थितियां प्रतिकूल हों, विचार अलग हों और फिर भी हम एक-दूसरे के प्रति सम्मान बनाए रखें।

मैं नहीं जानता कि मेरी और प्रज्ञा की कहानी का सही नाम क्या है। प्रेम कहानी, अधूरी कहानी, स्मृति या जीवन का एक खूबसूरत संयोग!

 

शायद नाम देना जरूरी भी नहीं है।

 

कुछ रिश्ते हमारे जीवन में स्थायी रूप से रहने के लिए नहीं, बल्कि हमें भीतर से बदल देने के लिए आते हैं। वे हमें बताते हैं कि हम कितना प्रेम कर सकते हैं, कितना दुख सह सकते हैं और किसी दूसरे मनुष्य की उपस्थिति हमारे भीतर कितनी रोशनी पैदा कर सकती है।

 

आज जब मैं अपनी जिन्दगी के उन दिनों को याद करता हूं, तो मन में कोई शिकायत नहीं उठती। केवल एक हल्की-सी कसक और एक गहरी कृतज्ञता का भाव पैदा होता है।

 

कृतज्ञता इस बात के लिए कि मेरी जिन्दगी में कभी प्रज्ञा नाम की एक युवती आई थी, जिसने मुझे कुछ समय के लिए ही सही, लेकिन जीवन को एक अलग नजरिए से देखने का अवसर दिया।

 

कभी-कभी मन करता है कि उससे फिर मुलाकात हो। किसी पुराने शहर की सड़क पर, किसी पुस्तकालय के कोने में, किसी पार्क की बेंच पर या फिर उसी तालाब के किनारे।

 

अगर वह कभी सामने आ जाए, तो शायद मैं उससे बहुत सारे सवाल नहीं पूछूंगा। न बीते समय का हिसाब मांगूंगा, न किसी पुराने वादे की याद दिलाऊंगा।

 

बस मुस्कराकर पूछूंगा—

‘प्रज्ञा, कैसी हो?’

और अगर वह भी मुस्कराकर कह दे, ‘मैं अच्छी हूं, डॉक्टर साहब। आप कैसे हैं?’

 

तो शायद मुझे लगेगा कि जिन्दगी ने एक बार फिर मुझे वही अनमोल पल लौटा दिए हैं, जिन्हें मैं इतने वर्षों से अपनी स्मृतियों में संभालकर रखे हुए हूं।

 

क्योंकि सच तो यह है कि जिन्दगी आगे बढ़ जाती है, समय गुजर जाता है, चेहरे बदल जाते हैं और रास्ते अलग हो जाते हैं।

 

लेकिन कुछ पल ऐसे होते हैं, जो हमारे भीतर हमेशा जीवित रहते हैं।

 

जिन्दगी के वे अनमोल पल, जो कभी-कभी याद आ जाते हैं!

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